🙏तहजीब का नगर लखनऊ निर्ममता के लिए आज चर्चा में है। पुत्र ने पिता की हत्या कर शव के कई टुकड़े कर डाले जिससे पिता-पुत्र संबंध के साथ सारे संबंध छिन्न-भिन्न हो गए हैं-एक विश्लेषण 🙏


संवाद


'पितृहंता पुत्र की मनोदशा'


पिता पुत्र के संबंध से आस्तिकता और नास्तिकता निर्धारित होती है, ऐसा भारतीय ज्ञान परंपरा मानती है। यदि पिता प्रेम से भरा हो तो बच्चे का परमपिता के प्रति आस्था दृढ़ हो जाती है जो उसे आस्तिक बना देती है। यदि पिता प्रेम से नहीं भरा हो तो पुत्र के नास्तिक होने की संभावना ज्यादा हो जाती है,वह परमपिता के प्रति आस्था नहीं कर सकता। क्योंकि पिता की साक्षात् छवि से ही अदृश्य परमपिता की छवि निर्मित होती है। हिरण्यकश्यप जैसे नास्तिक के घर में प्रहलाद जैसा आस्तिक का पैदा होना पूर्णतया अपवाद है।


                 लखनऊ के अक्षत के द्वारा अपने पिता मानवेंद्र की गोली मारकर हत्या और उसके बाद निर्मम तरीके से अंगों को काटकर ठिकाने लगाने का कृत्य सामान्य नहीं है। इसमें संबंध से ज्यादा पुत्र की व्यक्तिगत सोच और सनक ने रिश्ते को कलंकित किया है। उसको समझे बिना इस घटना से सही सबक नहीं लिया जा सकता।


        माता-पिता, पुत्र-पुत्री के रिश्ते में नजदीकी और दूरी के कई प्रसिद्ध उदाहरण मिलते हैं। श्रवण कुमार से लेकर अक्षत कुमार तक खट्टे-मीठे उदाहरण भरे पड़े हैं। अपने अंधे और अशक्त माता-पिता के प्रति कर्तव्य निभाने वाले श्रवण कुमार आज भी खूब हैं तथा पिता की संपत्ति को हड़प कर पिता को ठिकाने लगाने वाले औरंगज़ेब व अक्षत भी कई हैं।


           मां बाप का परस्पर संबंध भी बच्चों के जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव डालता है। यदि मां बाप में प्रेम का संबंध है तो बच्चों का जीवन स्वर्ग हो जाता है, अन्यथा घर बच्चों के लिए नर्क बन जाता है। मानवेंद्र और अक्षत के संबंध में यह सुनने में आ रहा है कि मानवेंद्र की शादी लव मैरिज थी फिर भी पति-पत्नी के बीच अनबन और तनाव चल रहा था। पत्नी ने आत्महत्या कर ली और बच्चों से मां का साया छिन गया। अक्षत का भी किसी के साथ प्रेम संबंध चल रहा था जिस पर वह अनाप-शनाप पैसा लूटा रहा था।


                  मानवेंद्र जी ने बच्चों की खातिर दूसरी शादी नहीं की और अक्षत को अपनी पहचान बनाने के लिए प्रेरित करते थे तथा पिता होने के नाते जोर-आजमाईश भी करते थे। करोड़ों की उनकी संपत्ति और व्यवसाय यह स्पष्ट करता है कि अक्षत के लिए तो रोटी कपड़ा मकान का संकट नहीं था बल्कि पहचान का संकट था। किंतु युवावस्था,संपत्ति,शक्ति और अविवेक ने मिलजुलकर उसे कातिल और कलंकित पुत्र बना दिया। संस्कृत के ऋषि कहते हैं-


यौवनं धनसम्पत्तिः प्रभुत्वमविवेकिता।


एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम्॥"


इसका अर्थ है कि जवानी,धन-संपत्ति,शक्ति और विवेकहीनता—इनमें से कोई एक भी विनाश या अनर्थ लाने के लिए पर्याप्त है, फिर जहाँ ये चारों एक साथ हों, तो उसका क्या कहना! 


           अभाववाले घर के संस्कृतप्रेमी हमारे साथियों की युवावस्था अपने माता-पिता के सपनों को पूरा करने हेतु तपस्या के लिए थी जिसकी बदौलत उन लोगों ने संपत्ति, शक्ति सब कुछ अपने विवेक व संस्कारों की बदौलत अर्जित कर लिया। अक्षत के जो संस्कार थे,वे बुरी संगति से विकृत हो गए जिसका परिणाम भयावह रूप में समाज के सामने आया है। काम,क्रोध,लोभ,मोह बीज रूप में मन में रहता है किंतु पारिवारिक संस्कार और सत्संगति से काम ब्रह्मचर्य की ओर उन्मुख हो जाता है,क्रोध करुणा बनने लगता है, लोभ दान में उत्सुक हो जाता है तथा मोह त्याग बन जाता है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹