🙏राष्ट्रीय विज्ञान दिवस की शुभकामना:विज्ञान अंधा है धर्म के बिना और धर्म लंगड़ा है विज्ञान के बिना। वे एक दूसरे के पूरक हैं,परस्पर विरोधी नहीं: एक विश्लेषण 🙏


संवाद


'विज्ञान और धर्म एक दूसरे के पूरक हैं'


राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पर आज विचार का प्रश्न यह है कि समाज की उत्कृष्टतम प्रतिभा विज्ञान के प्रति उत्सुक हैं जबकि पूजा स्थलों और धार्मिक जुलूसों में जाने वाले निम्न प्रतिभा के लोग होते हैं। ऐसा क्यों हुआ?


मध्यकाल में यूरोप में पोप और वैज्ञानिकों के बीच एक संघर्ष चला। जैसे-जैसे वैज्ञानिक खोजें आगे बढ़ती गईं वैसे-वैसे धर्म-सत्ता की बातें गलत साबित होती गईं। उदाहरण के तौर पर बाइबल में लिखा था कि पृथ्वी इस जगत का केंद्र है किंतु सौरकेंद्रित सिद्धांत ने साबित कर दिया कि पृथ्वी नहीं बल्कि सूर्य केंद्र में है। लेकिन धर्मसत्ता और राजसत्ता ने उस वैज्ञानिक को माफी मांगने के लिए मजबूर कर दिया। उस वैज्ञानिक ने कहा कि आपकी शक्ति के आगे मैं माफी मांगने के लिए मजबूर हूं किंतु मेरे माफी मांगने से तथ्य और सत्य बदल नहीं जाता।जैसे-जैसे निरीक्षण,प्रयोग और अनुभव बढ़ता गया वैसे-वैसे धार्मिक अंधविश्वास का पता चलता गया और विज्ञान पर लोगों का विश्वास बढ़ता गया।


           आज विज्ञान के आविष्कारों ने जगत को ग्लोबल विलेज में बदल दिया है और सुविधाओं से संसार को समृद्ध कर दिया है। लेकिन समृद्धि जितनी बढ़ती गई उतनी ही समृद्ध देशों में शांति घटती गई। परिणामस्वरुप दो विश्वयुद्ध हुए और विज्ञान का सबसे बड़ा आविष्कार एटम बम का परिणाम हिरोशिमा और नागासाकी के रूप में आया। दूसरे शब्दों में कहें तो विज्ञान की दी हुई शक्ति ने जगत को अशांति और हिंसा से भर दिया।


             विज्ञान के चरम शिखर पर गए हुए वैज्ञानिकों ने भी महसूस करना शुरू किया कि पदार्थ के सत्य को जानने से समृद्धि बढ़ सकती हैं किंतु चेतना के सत्य को जाने बिना शांति नहीं बढ़ सकती। अतः कई महान वैज्ञानिक अपने जीवन के अंतिम काल में धार्मिकता की ओर बढ़ने लगे। आज अमेरिका,रूस,चीन,इजरायल,ईरान जैसे शक्तिशाली देशों की युद्धपिपासा को देखकर विज्ञान वरदान कम अभिशाप ज्यादा साबित हो रहा है।


            आज एआई के युग में बढ़ते यंत्रीकरण के कारण फिर से धर्म और नैतिकता की बात भी प्रमुखता से उठने लगी है। क्योंकि


'मंगल पर पहुंच चुके हैं विज्ञान के पांव


देखना यह है कि इंसान कहां तक पहुंचे?


अमंगल की दास्तां है जहां तक पहुंचे


मेरी आरजू है कि मंगल भी वहां तक पहुंचे।'


              दूसरे शब्दों में कहें तो पदार्थ के सत्य को जानकर समृद्धि तो बढ़ गई किंतु चेतना के सत्य को जाने बिना शांति नहीं बढ़ सकती। एक पूर्ण जगत समृद्ध भी होना चाहिए और शांत भी। इसलिए विज्ञान के युग में आज धर्म की बात फिर से प्रमुख होने लगी है। वस्तुत: विज्ञान धर्म के बिना अंधा है और धर्म विज्ञान के बिना लंगड़ा है। आज सारे वैज्ञानिक आविष्कारों के बावजूद जीवन-जगतरूपी जंगल में आग लगी हुई है और जब तक विज्ञान और धर्म दोनों साथ में नहीं आते इस आग से बचा नहीं जा सकता।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹