प्रेम का रंगीन पर्व होली
March 2, 2026🙏🌹होली की शुभकामना:युद्ध से त्रस्त जगत को प्रेम का संदेश देने के लिए होली जैसा पर्व बहुत सामर्थ्य रखता है। लेकिन अस्तित्व के पर्व को किसी संप्रदाय का पर्व मानकर कुछ लोग उससे वंचित रह जाते हैं। प्रेम का संदेश किसी भी पर्व के द्वारा दिया गया हो, आज उन सबको विविध रंगों में देखने की दृष्टि चाहिए-एक विश्लेषण🙏🌹
संवाद
'प्रेम का रंगीन पर्व होली'
किसी भी धर्म का कोई पर्व हो, मुख्य संदेश उसका प्रेम होता है। किंतु इस जगत में धर्म के नाम पर ही सबसे ज्यादा युद्ध लड़ा गया है। युद्ध लड़ाती है 'राजनीति' और बदनाम होता है "धर्म"।
होली जो हिंदू धर्म का मुख्य पर्व है,उसका भी मूल संदेश प्रेम है। लेकिन प्रेम ठीक प्रह्लाद की तरह बहुत कोमल और नाजुक होता है। फिर भी अंततः वही जीतता है। कारण यह है कि परमात्मा की शक्ति उसे ही बचाना चाहती है। होलिका जल जाती है और हिरण्यकश्यप मारा जाता है। इस खुशी में रंगों का पर्व होली मनाया जाता है।
संदेश साफ है कि परमात्मा की सृष्टि रंगबिरंगी हैं और जो सारे रंगों को स्वीकार करता है, वही परमात्मा और उसकी सृष्टि को प्रिय है। प्रेम सतरंगा है, उसमें सभी रंग स्वीकार हैं क्योंकि विविधता से ही जीवन रंगीन होता है जबकि रंगहीन जीवन किसी को पसंद नहीं-
'इसक अल्लह की जाति है, इसक अल्लह का अंग
इसक अल्लह औजूद है , इसक अल्लह का रंग।'
इसक अर्थात् प्रेम। प्रेम ही परमात्मा का संदेश है तभी तो यीशु ने कहा कि प्रेम ही परमात्मा है। हिंदू धर्म में इस बात को बहुत गहराई से सबसे पहले समझा गया और उसे होली जैसी परंपरा से सुरक्षित रखते हुए सब तक पहुंचाया गया-
'होली के दिन दिल खिल जाते हैं रंगों में रंग मिल जाते हैं
गिले शिकवे भूल के दोस्तों दुश्मन भी गले मिल जाते हैं।'
यह तो राजनीति है कि कोई हरा रंग पकड़ लेता है तो कोई भगवा, कोई नीला रंग तो कोई पीला रंग, कोई उजला रंग तो कोई काला रंग। लेकिन प्रेम करने वाला परमात्मा इतना उदार हैं कि एक रंग मांगो तो अनेक रंग से जीवन को भर देता है-
'एक रंग मांगा था तुमने सुरधनु का उपहार दे दिया
एक रूप मांगा था तुमने यह सारा संसार दे दिया।'
रविंद्रनाथ टैगोर कहते हैं कि परमात्मा जीवन और जगत को बहुत प्रेम करता है तभी तो बार-बार युद्ध के द्वारा दुनिया को मिटाने का प्रयास किया जाता है लेकिन परमात्मा बार-बार नई सृष्टि करके उसे आबाद रखता है। प्रह्लाद जैसे आज भी आस्तिक हैं जो प्रेम के द्वारा इस सृष्टि को सुंदर बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं जिस पर नास्तिक बार-बार आक्रमण कर रहे हैं। होली जैसा पर्व उस प्रह्लाद को शक्ति देता है जिसे परमात्मा का सारा रंग स्वीकार है, बशर्ते प्रेम से सारे रंगों में घुलमिल जाइए और सबको गले लगाइए-
'न हारा है इश्क,न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है,हवा चल रही है।
मेरे राहबर मुझको गुमराह कर दे
सुना है कि मंजिल करीब आ रही है।।'
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹