पर्व की प्रकृति और संस्कृति
March 5, 2026/start
🙏होली जैसे पर्व की आध्यात्मिकता और वैज्ञानिकता को भूलकर लोग पर्व को विकृत बना रहे हैं ,जरूरत है उसे सुसंस्कृत स्वरूप देने की🙏
संवाद
'पर्व की प्रकृति और संस्कृति'
सनातन धर्म की रक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपाय है कि पर्व को उसके असली स्वरूप में प्रतिष्ठित किया जाए। होली जैसे महत्वपूर्ण पर्व को जिस प्रकार से विकृत किया गया है,उससे सनातन धर्म को गहराई से समझने वाले बहुत ही दुखित और पीड़ित है। ब्रज की प्रसिद्ध होली का कुछ आपत्तिजनक वीडियो सामने में आ रहा था जिसमें रंग डालने वाले का प्रेम की जगह वासनात्मक दृष्टि उभर कर आ रही थी। संवादों में अश्लीलता की फुहार और हावभाव में विकृति की हुंकार स्पष्ट रूप से बता देती है कि भारतीय संस्कृति से इनका दूर-दूर का नाता नहीं है।
होलिका दहन की शाम घर से 20 किलोमीटर दूर त्रिपुरा सुंदरी मां के दर्शन के लिए जब जा रहा था तो हर मोड़ और चौराहे पर लकड़ियों के गट्ठर रखे हुए थे। परंपरा के नाम पर होलिका को जलाने की जगह हम लकड़ियों को जलाकर एक तरफ हवाओं को प्रदूषित कर देते हैं तो दूसरी तरफ इस पर्व की मूल अवधारणा को विस्मृत कर देते हैं। होलिका तो क्षुद्र मनोवृतियों की प्रतीक है जो हमारी दिव्यता को प्रकट नहीं होने देती। प्रह्लाद जैसे शुद्ध सात्विक को अपनी गोद में लेकर जलाने के उद्देश्य से जब वह आग में बैठी तो वह स्वयं जल गई। साधारण आग सब कुछ जला देती हैं चाहे वह अच्छा हो या बुरा। किंतु यह विवेकाग्नि थी जिसमें आस्तिकता बच जाती है और नास्तिकता जल जाती है। वैदिक परंपरा में होलिका दहन हेतु सूखी लकड़ियों को इकट्ठा करके जलाया जाने लगा ताकि खेतों की सफाई हो सके। आज जब जंगल कट चुके हैं और पेड़ों की भारी कमी के कारण हवा में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है तब होलिका दहन की परंपरा में समयानुकूल पर्यावरण की दृष्टि से परिवर्तन किया जाना चाहिए। लेकिन वह समयानुकूल परिवर्तन तो कहीं दिखाई नहीं देता, इसके विपरीत हिंदू धर्म के पुनरुत्थान के नाम पर उस परंपरा को उसी रूप में और भी जोर-शोर से मनाया जा रहा है। होलिका दहन के कार्यक्रम को भव्य बनाने के लिए ज्यादा से ज्यादा लकड़ियों को जुटाकर जलाया जाता है और उसके चारों तरफ श्रद्धापूर्वक पूजा का आयोजन भी कराया जाता है।
परंपरा में जो हीरा है उसको बचा लिया जाना चाहिए और जो कोयला है उसको जला दिया जाना चाहिए। किंतु परंपरा का अंधानुकरण करने वाले लोग सब कुछ जला दे रहे हैं और अपने आप को सनातन धर्म का रक्षक भी बता रहे हैं। पर्व की वैज्ञानिकता और आध्यात्मिकता को यदि नहीं बचाया गया तो हमारे पर्व उपहास के विषय बन जाएंगे और पर्यावरण प्रदूषक समझे जाएंगे।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹