🙏'नई किरण नशा मुक्ति अभियान' तभी सफल हो सकता है जब मन को पदार्थगत नशा और व्यवहारगत नशा से ऊपर उठाया जाए और ज्ञान-ध्यान के नशे की ओर मोड़ा जाए-एक विश्लेषण🙏


संवाद


'मन को उच्चतर नशे की ओर मोड़ा जाए'


शिक्षा जगत में 'नई किरण नशा मुक्ति अभियान' का उद्देश्य है कि युवा पीढ़ी को नशे से बचाया जा सके और स्वस्थ मानव समाज का निर्माण किया जा सके। लेकिन इस अभियान पर जितना शक्ति,समय और संसाधन लगाया जा रहा है, उतना अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही है। इसका मतलब है कि कारण का सही पहचान न हो तो निदान संभव नहीं है।


एक तरफ बांसवाड़ा जैसे आदिवासी अंचल में गरीबी और अशिक्षा के कारण नशे की गिरफ्त में समाज जकड़ा हुआ है तो दूसरी तरफ बेंगलुरु जैसे समृद्ध और शिक्षित युवा पीढ़ी के बीच भी ऑफिस की थकान और तनाव को मिटाने के लिए नशा का आश्रय लिया जा रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो विपन्नता में और संपन्नता में नशा करने वाले नशा कर रहे हैं।


            अब ऐसे में भारतीय संस्कृति का पहला विषय दर्शन कहता है कि नशा का संबंध गरीबी और अमीरी से ज्यादा मन की सोच से है। मन नशे के बंधन में भी डालता है और मन के द्वारा ही नशे से मुक्त भी हुआ जा सकता है-


'मन एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयो:'


अर्थात् उपनिषद का ऋषि कहता है कि मन मनुष्य के बंधन का भी कारण है और मुक्ति का भी।


            इस मन के परिवर्तन का सबसे सशक्त माध्यम शिक्षा है। आध्यात्मिक और वैज्ञानिक शिक्षा से मन मुक्ति की ओर अग्रसर होता है।


           किंतु शिक्षा की स्थिति आज इतनी खराब है कि सरकारी शिक्षकों को गैर शैक्षिक कार्यों में झोंक दिया गया है और निजी शिक्षा पूर्णत: व्यावसायिक हो चुकी है। ऐसे में आध्यात्मिक और वैज्ञानिक शिक्षा की तो बात दूर हैं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा बहुत कम को उपलब्ध हो रही है।


             भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरुकुल में पहुंचकर कुछ लोग अच्छी शिक्षा प्राप्त कर लेते थे और बुद्ध जैसे कुछ गुरु अपने शिष्यों को जनसामान्य के बीच भेज कर मन के सम्यक निर्माण का उपाय करते थे। आज भी नशा मुक्ति अभियान में शिक्षालयों के साथ महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह ब्रह्माकुमारी जैसी संस्थाओं द्वारा किया जा रहा है।


            मूल बात यह समझना है कि मन को एक आधार चाहिए क्योंकि मानव के पास सबसे शक्तिशाली मन है। उस मन को यदि आध्यात्मिक आधार नहीं मिलता तो नशा वगैरह का भौतिक आधार जकड़ लेता है। पान,बीड़ी, सिगरेट,तंबाकू,ड्रग्स वगैरह के पदार्थगत नशे से समाज जूझ ही रहा था कि अब मोबाइल,गेम,रील इत्यादि के व्यवहारगत नशे ने उससे भी ज्यादा समाज को जकड़ लिया है।


     नशा का मतलब है-एक आदत, जिसके बिना मन बेचैन होने लगता है। पदार्थगत नशा और व्यवहारगत नशा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्रतिकूल बना देते हैं। लेकिन सभी नशा बुरा ही हो यह अनिवार्य नहीं, किसी को पढ़ने का नशा हो,प्रभु सुमिरन का नशा हो और ध्यान करने का नशा हो तो उसका जीवन ऊंचाइयां ले लेता है। इसीलिए तो शास्त्रों में महात्मा के लक्षण में कहा गया है-'व्यसनं श्रुतौ'अर्थात् श्रुतियों या वेदों में व्यसन.


           अब्दुल कलाम साहब को पढ़ने-पढ़ाने का नशा था तो रहस्यदर्शी ओशो को ज्ञान बांटने और ध्यान कराने का नशा था। दूसरे शब्दों में कहें तो पदार्थगत और व्यवहारगत नशे की जगह मन को आत्मगत नशा की ओर मोड़ा जाए तो मन को एक आधार भी मिल जाएगा और जीवन को एक ऊंचाई भी।


             लेकिन इसके लिए शिक्षा जगत में आमूलचूल परिवर्तन करना होगा और समाज के वातावरण को भी बदलना होगा। शिक्षक क्लास में विद्यार्थियों को विषय-ज्ञान की ओर उन्मुख करे और क्लास के बाहर विद्यार्थियों के जीवन से जुड़कर उसके आत्मिक-ज्ञान का विकास करे। लेकिन इसके लिए पढ़नेवाले और पढ़ानेवाले का संबंध अहर्निश हो,सतत हो तथा गहरा हो। चुनाव-अनिवार्य (election urgent)की तरह क्लास- अनिवार्य (class urgent)का सरकार प्रावधान बनाए और समाज उस प्रावधान को लागू करवाने में सहयोग करे तब नशा मुक्त स्वस्थ समाज का निर्माण हो पाएगा।


इसके साथ समाज के सभी धर्मों के संत शिक्षालयों द्वारा प्रारंभ किए गए आध्यात्मिक ज्ञान को बाहर के परिवेश में परिपक्व बनाएंगे तो निश्चितरुपेण भारत पदार्थगत और व्यवहारगत नशे को छोड़कर ज्ञान-ध्यान के नशे की ओर उन्मुख हो पाएगा। तब भारत अपने प्राचीन ज्ञान-ध्यान के वैभव को पुन: प्राप्त कर पाएगा।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹