सिविल-सेवा और शिक्षा-सेवा
March 10, 2026🙏अंग्रेजों द्वारा स्थापित सिविल-सेवा परीक्षा की जितनी सामाजिक प्रतिष्ठा आज भी बनी हुई है उतनी सामाजिक प्रतिष्ठा भारतीय ज्ञान परंपरा में कभी शिक्षा-सेवा की होती थी। आज शिक्षा 'खासकर सरकारी शिक्षा' सबसे उपेक्षित विषय है और सिविल सेवा सबसे प्रतिष्ठित; तभी तो डॉक्टर,इंजीनियर सभी सिविल सेवक बनने को उत्सुक है-एक विश्लेषण🙏
संवाद
'सिविल-सेवा और शिक्षा-सेवा'
यूपीएससी का परीक्षा परिणाम आते ही अंधेरे में पल रही कई प्रतिभाएं पूर्ण प्रकाश में आ जाती हैं। अखिल भारतीय सेवा का ढांचा अंग्रेजों ने खड़ा किया था और आईसीएस में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की सफलता सर्वाधिक उल्लेखित ऐतिहासिक तथ्य है। आज भी सिविल सेवा में सफलता को जितना गौरान्वित किया जाता है, उतना अन्य सेवा की सफलता को नहीं। जबकि एक डॉक्टर,वैज्ञानिक या शिक्षक अपने जीवन भर के विशेष योगदान से जितना प्रतिष्ठित हो जाता है, उतनी प्रतिष्ठा प्राप्त करते बहुत कम सिविल सेवकों को पाया जाता है।
यूपीएससी के टॉपर राजस्थान प्रदेश से डॉ.अनुज अग्निहोत्री मेडिकल साइंस के विद्यार्थी रहे हैं और ग्यारहवें स्थान पर सफलता प्राप्त करने वाले बिहार प्रदेश से यशस्वी राजवर्धन इंजीनियरिंग के कंप्यूटर साइंस ब्रांच के विद्यार्थी रहे हैं। यशस्वी के पिता श्री रजनीश कुमार सिंह मेरे मित्र हैं और बिहार कैडर के आईएएस हैं। वे भी कला संकाय से न होते हुए भी कला संकाय के विषयों को लेकर बिहार लोक सेवा में टॉपर रहे थे। उनके व्यक्तित्व की एक खास विशेषता जिसने मेरा दिल जीत लिया,वह यह था कि यूपीएससी की प्रीलिम्स परीक्षा में असफल होने पर हम मित्रों को उन्होंने एक दावत दी थी। 15 अगस्त 2024 को जब आईएएस में उनका प्रमोशन हुआ तो मैंने 'असफलता की दावत' शीर्षक से लेख लिखा था, आज जब उनके सुपुत्र की सफलता की खबर मिली तो 'सफलता की नफासत' शीर्षक पर लेख लिखने को जी कर रहा है। क्योंकि इस अवसर पर उनसे बात करके जीवन के बहुत सारे सलीकों का पता चल रहा है। लेकिन अभी मेरा ध्यान प्रतिभा पलायन पर है। अपना देश छोड़कर विदेश चला जाना ही प्रतिभा पलायन नहीं है बल्कि अपना क्षेत्र छोड़कर दूसरे क्षेत्र में चला जाना भी मुझे प्रतिभा पलायन ही लगता है।
एक सर्वे किया जाए तो पता चलेगा कि इंजीनियरिंग और डॉक्टरी क्षेत्र की अधिकांश प्रतिभाएं कला संकाय के विषयों को लेकर प्रशासनिक सेवा के क्षेत्र में आ जाती हैं क्योंकि जो पद-प्रतिष्ठा उन्हें इस क्षेत्र में मिलती हैं,अन्य क्षेत्र में नहीं मिलती।
लेकिन उनके जीवन भर के पढ़े विषय ज्ञान का और उनके मौलिक प्रतिभा का क्या सर्वाधिक उपयोग प्रशासनिक क्षेत्र में हो पाता है? सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि उनके विषय विशेषज्ञता का विशेष लाभ प्रशासनिक क्षेत्र में नहीं है, उनके सामान्य ज्ञान से ही प्रशासन का काम चल जाता है।
दूसरे शब्दों में कहें तो अपनी विषय विशेषज्ञता और मौलिक प्रतिभा की बलि चढ़ाने की कीमत पर लोक सेवकों को पद-प्रतिष्ठा मिलती है। वेतन श्रृंखला में इंजीनियरिंग,डॉक्टरी,शिक्षा सेवा के अधिकारी और प्रशासनिक अधिकारी के बीच ज्यादा अंतर नहीं है।
फिर क्यों अधिकांश प्रतिभाएं अपनी मौलिकता को दबाकर प्रशासनिक क्षेत्र की ओर जाती हैं? क्योंकि अन्य क्षेत्र में 75 वर्षों के बाद भी हमने ऐसा ढांचा विकसित नहीं किया कि विषय विशेषज्ञता और मौलिक प्रतिभा को सामाजिक पहचान तथा सम्मान मिल सके। दूसरे शब्दों में कहें तो भारतीय समाज का मानसिक ढांचा अभी भी औपनिवेशिक काल का है, जहां प्रशासक सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। जबकि भारतीय ज्ञान परंपरा में सर्वाधिक महत्त्व शिक्षा-सेवा को, विषय-विशेषज्ञता को और मौलिक प्रतिभा को दिया जाता था। विकसित देशों में प्रोफेसर,वैज्ञानिक,उद्योगपति का प्रशासक से ज्यादा सम्मान है।संस्कृत के ऋषि कहते हैं-
'अन्नदानं महादानं विद्यादानं महत्तरम्
अन्नेन क्षणिका तृप्तिर्यावज्जीवं तु विद्यया।'
अर्थात् अन्नदान महादान है किंतु विद्यादान उससे भी श्रेष्ठतर। क्योंकि अन्नदान से कुछ देर की तृप्ति होती है जबकि विद्यादान से जीवनपर्यंत तृप्ति होती है।
किंतु दुर्भाग्य की बात है कि भारत में शिक्षा सेवा को जितना कम महत्त्व दिया जा रहा है और सरकारी शिक्षा को जितना उपेक्षित किया जा रहा है, उतना विश्व में किसी भी विकसित राष्ट्र में नहीं किया गया है। गौरतलब है कि शिक्षा से ही हर क्षेत्र की प्रतिभाएं पहचानी जाती हैं और तराशी जाती हैं। नालंदा, तक्षशिला विश्वविद्यालय ने कभी भारत को विश्वगुरु बनाया था और आज गलगोटिया विश्वविद्यालय ए आई सम्मिट के बाद हमारी विशेष पहचान बन चुका है।
ज्ञान प्रधान संस्कृति की बदौलत विश्वगुरु बनने वाला भारत जब प्रशासन को सर्वाधिक प्रतिष्ठित सेवा मानता हो और शिक्षण को सर्वाधिक उपेक्षित सेवा मानते हुए गैर शैक्षिक कार्यों में शिक्षकों को नियोजित करता हो तो अवश्य यह राष्ट्रीय चिंता और चिंतन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय बनना चाहिए।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹