🙏अहंकार का परिणाम युद्ध है और आत्मा जगने का परिणाम बुद्ध है। युद्ध जितना बढ़ता जा रहा है,बुद्ध उतना ही प्रासंगिक होते जा रहे हैं-एक दार्शनिक विश्लेषण🙏


संवाद


'युद्ध में बुद्ध की याद'


यजुर्वेद का कथन है कि युद्ध मनुष्य के मन में उत्पन्न होता है। जीवों में सबसे शक्तिशाली मन मानव के पास है, इसी कारण से मानव संसार का केंद्र बन गया। लेकिन मन के कारण ही मानव शक्ति की खोज में भटकता रहता है और कभी शांति को उपलब्ध नहीं हो पाता। शांति का दूसरा नाम है- 'अमन'. अर्थात् जहां मन न रहे,वही शांति उपलब्ध होती है। कोई बुद्ध,कोई महावीर अमन की अवस्था में पहुंचते हैं और विश्व को करुणा और अहिंसा का मार्ग दिखा जाते हैं।


                बुद्ध और महावीर भी राजा के लड़के थे लेकिन शक्ति में इन्हें रस नहीं आया। तभी तो राजपाट छोड़कर जीवन की सार्थकता को पाने के लिए शांति की तलाश में निकल गए। भारतीय संस्कृति ने सबसे ज्यादा मूल्य शांति को दिया, इसीलिए तो 'अहिंसा परमो धर्म:' कहने वाले को महावीर कहा।


             बुद्ध और महावीर की धरती पर अशोक जैसा सम्राट पैदा हुआ जिसने कलिंग युद्ध के बाद युद्ध की विभीषिका और निरर्थकता को महसूस किया जिससे उसका हृदय परिवर्तन हो गया। युद्ध का विजेता पश्चाताप से भर गया‌। उसने हिंसा और विजय की नीति छोड़कर धम्म और करुणा की नीति अपना लिया।


              ईरान पर मिसाइल हमले में स्कूल की निर्दोष बच्चियां मारी गईं लेकिन किसी को पश्चाताप नहीं, कोई हृदय परिवर्तन नहीं। सुंदर और मासूम चेहरे सुखद सपनों को साकार करने के लिए किताब के पन्ने पलट रहे थे और युद्धपिपासुओं ने शिक्षालय को कब्रगाह बना दिया। अहंकारकेंद्रित शिक्षा ने यंत्र-मानव पैदा किया है जिसकी तलाश शक्ति की है और वह भी किसी भी कीमत पर। ऐसे अहंकारी राष्ट्राध्यक्ष एक नहीं, अनेक हैं। इनके रहते विश्व में अमन या शांति कैसे संभव है?


               लेकिन अमन या शांति आत्मा की पुकार है। इसीलिए हर युद्ध के गर्भ से शांति का जन्म होने लगता है। क्योंकि युद्ध की मानसिकता में मानव ज्यादा देर तक नहीं रह सकता और शांति की मानसिकता में वह चिरकाल तक आनंद के साथ रहता है। मन शक्ति के पीछे भागता है और आत्मा शांति की तलाश में रहती है। जब तक शासक वर्ग मन से ऊपर उठकर आत्मा को उपलब्ध नहीं होता तब तक शक्ति की दौड़ चलती रहेगी और विश्व छोटे-बड़े युद्धों में उलझता रहेगा।


           अपने शक्ति के संसाधनों को बढ़ाने के लिए अहंकारी राजा पहले भी लड़ा करते थे किंतु हमारी संस्कृति में राजा से भी ज्यादा महत्त्व आत्मवान-गुरुओं को दिया गया है। यहां परंपरा थी कि हर राजा का कोई न कोई गुरु होता था। दूसरे शब्दों में कहें तो शक्ति शांति की छाया में काम करती थी, तब युद्ध की परिस्थिति होने पर भी युद्ध टल जाता था।


          एक बार नदी के दोनों किनारों पर दो राजाओं की सेना लड़ने के लिए खड़ी थी और बुद्ध का वहां से गुजरना हुआ। बुद्ध को देखकर दोनों राजा उनके चरणों में सर झुकाने के लिए आए। बुद्ध ने पूछा कि आप दोनों की सेना यहां क्यों खड़ी है? सकुचाते हुए उन दोनों ने जवाब दिया-युद्ध के लिए। बुद्ध ने पूछा- युद्ध किसके लिए? जवाब मिला- जल के लिए। बुद्ध ने कहा कि जल तो जीवन है,वह जीवन कैसे ले सकता है? सोच कर बताओ युद्ध किसलिए?


          दोनों अहंकारी राजा ने पता किया तो बात यह उभर कर आई कि नदी गर्मी के दिनों में सूख गई थी। उस नदी के अल्प जल को पहले कौन ले, इस बात के लिए युद्ध होने वाला था। बुद्ध ने कहा कि जरा गौर से सोचो युद्ध का मूल कारण जल नहीं है बल्कि युद्ध का मूल कारण अहंकार है। अहंकार सबसे पहले किसी भी चीज पर कब्जा करना चाहता है। दोनों राजा की आत्मा जग गई और उन्होंने युद्ध छोड़कर अल्प जल का शांति से उपयोग कर लिया।


        आज के तथाकथित लोकतंत्र में बुद्ध कहां है और बुद्ध की कौन सुनता है? आज तो सर्वत्र अहंकारी राजा द्वारा शक्ति की आराधना चल रही है जिसमें युद्ध ही एकमात्र विकल्प है। जब तक बुद्ध की याद आएगी तब तक हो सकता है बहुत देर हो चुकी होगी।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹