🙏कोई भी राष्ट्र नायक की तलाश में रहता है जो उसके सांस्कृतिक मूल्यों पर खरा उतरता हो। शिक्षा और पर्यावरण को भारतीय संस्कृति ने सबसे ज्यादा मूल्य दिया है और उसके सशक्त प्रतिनिधि के रूप में श्री सोनम वांगचुक सबसे आदर्श उदाहरण है-एक विश्लेषण 🙏


संवाद


'नोबेल की राह पर सोनम वांगचुक'


श्री सोनम वांगचुक जी की रिहाई से मेरे दिल को बहुत सुकून और बहुत खुशी मिली-


'मुझे खुशी मिली इतनी कि मन में न समाय


पलक बंद कर लूं , कहीं छलक ही न जाय।'


                  फिर ख्याल आया कि अपनों के संग दुख बांटने से कम हो जाता है और सुख बांटने से बढ़ जाता है। जब सनकी राजनीतिज्ञ मिसाइलों को एक दूसरे पर दागकर दुख बढ़ाने में लगे हुए हैं तो क्यों न श्री सोनम सर जैसे शिक्षक की रिहाई पर उस खुशी को बांटकर सुख बढ़ाने में लगें।


         सच्चाई के रास्ते पर चलने वालों के लिए अस्तित्व का साथ मिलने लगता है।सरकार ने स्वयं ही उस राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम(NSA) को वापस ले लिया जिसे उसने वांगचुक सर पर लगाया था। इसके पीछे कानूनी प्रक्रिया तो काम कर ही रही थी किंतु उससे ज्यादा अनगिनत लोगों की दुआएं काम कर रही थीं। श्री सोनम वांगचुक जब गिरफ्तार किए गए थे तब स्वत:प्रेरणा से मैं नवरात्रि के दिन लगभग 20 किलोमीटर पैदल चलकर मां त्रिपुरा सुंदरी के दरबार में पहुंचा और उनकी रिहाई के लिए प्रार्थना की। कई लोगों ने तो हजारों किलोमीटर की यात्रा उनके लिए की और कई दिनों तक उनकी रिहाई के लिए अभियान चलाया।


             भले ही सरकार इस केस में सतही दृष्टि से देखने पर सोनम वांगचुक की विरोधी लग रही हो किंतु गहरी दृष्टि से देखने पर मुझे लगता है कि सरकार सोनम जी की सहयोगी साबित हुई है। आंदोलन के द्वारा सरकार का ध्यान वे लद्दाख की मांगों की ओर आकर्षित कर रहे थे किंतु हिरासत में लिए जाने पर लद्दाख की मांग पर ही नहीं बल्कि श्री सोनम के सारे कार्यों पर सभी लोगों का ध्यान आकर्षित हो गया। अब तो श्री सोनम नोबेल पुरस्कार पाने की राह पर है क्योंकि जन-जन और कण-कण उनके स्वागत में उमड़ पड़ा है।


                ब्रिटिश सरकार ने जब गांधी को जेल में बंद किया तो गांधी जेल की दीवारों को चूमने लगे क्योंकि उन्हें मालूम था कि दीवारों के भी कान होते हैं। गांधी की जायज मांगों को जो ब्रिटिश सरकार नहीं सुन पाती थी,उसे जेल की दीवारें सुन ही नहीं लेती थीं बल्कि आम जनता तक पहुंचा भी देती थी। तभी तो गांधी की लोकप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ गई। आज 170 दिनों में जोधपुर जेल की दीवारों ने श्री सोनम की बातों को दूर-दूर तक पहुंचा दिया है और कई नए प्रश्न भी व्यवस्था पर उठा दिया है-


'बच्चा जिसकी जिद कर बैठा उन चीजों के दाम बहुत हैं


सच बोलने की आदत जिनको उनके सर इल्जाम बहुत हैं।'


            आंदोलन करने पर सब कुछ नेतृत्व के अनुसार नहीं चलता। नेता की संवेदनशीलता,संवादशीलता और सहनशीलता आमजन में भी आ जाती तो गांधी को चौरीचौरा कांड के बाद उफान पर पहुंचे हुए असहयोग आंदोलन को वापस नहीं लेना पड़ता। सरकारों को भी सोचना चाहिए कि यदि शांतिपूर्ण आंदोलन को यदि वे सफल होने नहीं देती हैं तो आंदोलन हिंसक होने की राह पर बढ़ जाता है। आखिर आमजन कहां तक धैर्य धारण करे और कितना सहे ; यह प्रश्न आज सबसे ज्यादा फिजाओं में गूंज रहा है।


             श्री सोनम जी के संघर्ष में जिस प्रकार से उनकी अर्धांगिनी गीतांजलि जी ने साथ दिया है और खासकर उनके जेल जाने के बाद जिस सहनशीलता और शालीनता के साथ उन्होंने संघर्ष किया है, वह वंदनीय है। रिहाई के बाद पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक तरफ श्री सोनम जी के चेहरे पर चमकता आत्मविश्वास देखकर और दूसरी तरफ गीतांजलि जी का जनमानस की अच्छाई के प्रति आस्था को सुनकर मैं भावविभोर हो गया। 'लोगों का ज़मीर अभी जिंदा है'- गीतांजलि मैम का यह कथन एक तरफ अस्तित्व के प्रति उनकी आस्था को दर्शाता है तो दूसरी तरफ सोई हुई आम जनता के ज़मीर को चुनौती भी देता है।


             शिक्षा और पर्यावरण के प्रति समर्पित श्री सोनम जी और श्रीमती गीतांजलि जी जैसी शख्सियतों के जीवन और संघर्ष को जन-जन तक पहुंचाकर ही हम भारत को महान बना सकते हैं और विश्व को एक नया रास्ता दिखा सकते हैं। अंतिम जन तक की चिंता करने वाले शिक्षाविद् और प्रकृति के कण-कण से प्रेम करने वाले पर्यावरणविद् ही इस जगत को विनाश से बचा सकते हैं और विकास का सही मार्ग दिखा सकते हैं। ‌


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹