🙏नवसंवत्सर की शुभकामना🙏


संवाद


'नवसंवत्सर आध्यात्मिक और वैज्ञानिक'


चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होने वाला भारतीय नवसंवत्सर आध्यात्मिक और वैज्ञानिक विशेषताओं से युक्त है। मान्यता है कि सृष्टि के सर्जक ब्रह्मा जी ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही सृष्टि का सृजन किया था। कोई भी सृजन शक्ति के बिना संभव नहीं है इसलिए भारतीय संस्कृति में इस अवसर पर देवी की उपासना की जाती है-


'या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता


नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।'


चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही नवरात्रि का प्रारंभ हो जाता है जो सृष्टि की शक्ति की उपासना और प्रकृति के पुनर्जागरण का प्रतीक है। इसमें देवी के विभिन्न रूपों की नवरात्री तक पूजा चलती है जिससे आत्मिक शक्ति का विकास होता है।


भारतीय नवसंवत्सर खगोल,प्रकृति,दर्शन और धर्म के एकीकृत दृष्टिकोण पर आधारित है। भारतीय नववर्ष के प्रारंभ होने का समय ऐसा है कि शीत ऋतु का अंत हो चुका है और वसंत ऋतु अपने चरम पर है। बागों में फूल खिल चुके हैं,खेतों में फसलों ने लहराना शुरू कर दिया है, नवीन कोपलें वृक्षों पर उग आई हैं ,कोयल ने कूकना शुरू कर दिया है और समस्त प्रकृति दुल्हन का रूप धर स्नेह सुधा बरसा रही है। राष्ट्रकवि दिनकर जी ने बहुत ही खूबसूरत अंदाज में वर्णन करते हुए कहा था-


'प्रकृति दुल्हन का रूप धर जब स्नेह सुधा बरसाएगी


शस्य श्यामला धरती माता  घर-घर खुशहाली लाएगी


तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि को नववर्ष मनाया जाएगा


आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर जय गान सुनाया जाएगा।'


          किंतु दुर्भाग्य की बात है कि पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव के कारण हम एक जनवरी को नववर्ष मनाते हैं तथा भौतिकवादी,अवैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसका आयोजन करते हैं-


'धरा ठिठुरती है सर्दी से,आकाश में कुहरा गहरा है


बाग बाजारों की सरहद पर सर्द हवा का पहरा है


सूना है प्रकृति का आंगन कुछ रंग नहीं उमंग नहीं


हर कोई है घर में दुबका नववर्ष का ये कोई ढंग नहीं।'


             वैसे पाश्चात्य संस्कृति में भी पहले नववर्ष मार्च महीने से प्रारंभ होता था किंतु 1752 में ब्रिटिश पार्लियामेंट में पारित एक प्रस्ताव के अनुसार पहली जनवरी से नववर्ष मनाने की परिपाटी शुरू हुई और उपनिवेशवाद के प्रभाव में सारे विश्व में प्रचलित हो गई।


पाश्चात्य नववर्ष के अवसर पर रात में 12:00 बजे होटलों में नाचते गाते हुए मांस,मदिरा के साथ नव वर्ष का प्रारंभ किया जाता है।


भारतीय संस्कृति में नववर्ष तिथि परिवर्तन मात्र नहीं है बल्कि जीवन के नवोदय और चेतना के उत्थान का प्रतीक है। दार्शनिक रूप से यह काल की चक्रीय अवधारणा पर आधारित है। पश्चिम की दृष्टि समय को एक रेखीय मानती है जबकि पूरब की दृष्टि में समय चक्राकार है। सृष्टि,स्थिति और प्रलय का क्रम निरंतर चलता रहता है जो यह संदेश देता है कि अंधकर प्रकाश की ओर और मृत्यु जीवन की ओर गतिशील है। ऋतु चक्र के साथ इसका सामंजस्य यह दर्शाता है कि मानव का प्रकृति के साथ कितना गहरा संबंध भारतीय संस्कृति मानती है।


भारतीय नवसंवत्सर में सूर्य और चंद्रमा दोनों की गति का ध्यान रखा गया है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा वह समय होता है जब चंद्रमा अपनी शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि पर होता है और सूर्य मेष संक्रांति के समीप होता है। यह खगोलीय स्थिति पृथ्वी पर ऋतु परिवर्तन और जैविक संतुलन को प्रभावित करती है।


भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से युक्त नवसंवत्सर जीवन को सत्यम् शिवम् सुंदरम् की ओर प्रेरित करता है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹