🙏रामनवमी की शुभकामना🙏


काम,क्रोध,लोभ,मोह और अहंकार से ग्रस्त राष्ट्रध्यक्षों के आज के युग में प्रजा-वत्सल राजाराम का जन्म क्या मायने रखता है-एक विश्लेषण 🙏


संवाद


'मर्यादा ही पुरुषोत्तम बनाती है'


चैत्र शुक्ल की नवमी तिथि को राम का जन्म हुआ था जो 'रामनवमी' के रूप में मनाई जाती है। लेकिन भारतीय संस्कृति राम को एक व्यक्ति कम, एक सद्गुण की अभिव्यक्ति ज्यादा मानती है।मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम उसी सद्गुण की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति हैं। युद्ध से त्रस्त हो रहे विश्व के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम को स्वयं के अंदर जन्म देना शांति के लिए बहुत जरूरी है।


                अस्त्र-शस्त्र की शक्ति का प्रदर्शन आज इतना भयावह रूप में सामने आ रहा है कि समस्त अस्तित्व खतरे में है। जगत को बर्बाद करने के लिए हथियारों का जखीरा इतना ज्यादा हो चुका है कि यह धरती कई बार खत्म की जा सकती है। किंतु इस धरती को आबाद करने के लिए सिर्फ एक ही शक्ति है, वह है- रामत्व की शक्ति। यह शक्ति आंतरिक है,बाहरी नहीं और इसका जन्म स्वयं ही अपने अंदर देना पड़ता है।रामनवमी इसी की याद दिलाता है कि काम,क्रोध,लोभ,मोह और अहंकार को मर्यादित करके कोई भी व्यक्ति पुरुषोत्तम बन सकता है।


           आज सबसे बड़ी समस्या यही है कि काम,क्रोध, लोभ,मोह और अहंकार अमर्यादित हो गया है।विश्व के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप का नाम एपस्टीन फाइल में है और ईरान का कहना है कि एपस्टीन गिरोह के सामने हम नहीं झुकेंगे। श्री राम का जीवन संदेश यही है कि मर्यादा का अतिक्रमण करने वाला शासक अपनी नैतिक शक्ति खो देता है। आज भी इस नैतिक शक्ति का महत्व इतना ज्यादा है कि विश्व के कई महत्वपूर्ण शक्तियों को एपस्टीन जैसे चरित्रहीन व्यक्तियों के फाइल में नाम आने के कारण अपना पद त्याग करना पड़ा। राम ने एक पत्नीव्रत की नींव रखकर अनेक पत्नी रखने वाले शासकों को मर्यादा का पाठ पढ़ाया और एक आम जनता के प्रश्न उठाने पर अपनी धर्मपत्नी सीता की भी अग्निपरीक्षा ली।


         श्री राम का क्रोध भी इतना मर्यादित था कि तीन दिवस तक समुद्र से पंथ मांगते रहे किंतु जब कोई जवाब नहीं मिला तो उन्होंने अपने पराक्रम को दिखाया। फिर समुद्र ने क्षमा मांगी और रास्ता देने को तैयार हो गया। एक राजनीतिक विचारक का कहना है कि शक्ति प्रयोग करने की क्षमता का नाम है,प्रयोग करने का नहीं। राम समुद्र को सुखा सकते थे किंतु उन्होंने सिर्फ सुखाने की धमकी दी और उनका उद्देश्य पूरा हो गया। ट्रंप की तरह उन्होंने ईरान में अंधाधुंध मिसाइलें दागकर निर्दोष बच्चियों को नहीं मारा, इसी ने तो उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम बनाया।


              सत्ता का लोभ श्री राम को एकदम नहीं था। तभी तो पिताजी के वचन को पूरा करने हेतु वे 14 वर्ष के लिए वन को प्रस्थान कर गए। बाली को मारकर सुग्रीव को वहां का राजा बना दिया और रावण का वध कर लंका को जीत कर विभीषण को वहां की सत्ता सौंप दी। क्योंकि सत्ता उनके लिए सेवा का माध्यम था, अपने लोभ को पूरा करने का माध्यम नहीं। आज के युद्ध के मूल में तेल भंडारों का लोभ है जो सत्ता के माध्यम से पूरा किया जा रहा है।


            मोहग्रस्त आज का सत्ताधीश संसाधनों पर कब्जा सबसे पहले अपने परिवार का चाह रहा है,अपनी प्रजा का नहीं। जबकि श्री राम ने मोह की जगह त्याग का रास्ता अपनाया और अपनी प्राणप्रिया सीता का भी त्याग अपवाद के कारण कर दिया। इसीलिए तो राजतंत्र के प्रतिनिधि राम लोकतंत्र में भी आदर्श बने हुए हैं। तभी तो महात्मा गांधी राम-राज्य की कल्पना किया करते थे। इस रामराज्य का मूलमंत्र आज की राजनीतिक परिभाषा में था- 'सर्वोदय'


'दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥


सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥'


अर्थात् रामराज्य में किसी को भी शारीरिक, प्राकृतिक या भौतिक कष्ट नहीं थे। सभी मनुष्य आपस में प्रेम करते थे और वेदों में बताई गई नीति के अनुसार अपने-अपने धर्म का पालन करते थे। 


            'यथा राजा,तथा प्रजा' कहावत यही कहती है कि राजा यदि धर्मनिष्ठ हो तो प्रजा भी धार्मिक होगी। चूंकि राम के व्यक्तित्व का केंद्र आत्मा था,अहंकार नहीं ; अतः वे धर्मनिष्ठ थे तथा दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करते थे,जैसा वे स्वयं अपने साथ चाहते थे। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि कहे जाने वाले आज के राष्ट्राध्यक्षों के व्यक्तित्व का केंद्र अहंकार है, आत्मा नहीं। इसी अहंकार के कारण रावण मारा गया और सोने की लंका जलकर खाक हो गई। आज अहंकारी राष्ट्राध्यक्षों के मिसाइल एक दूसरे को जलाकर खाक कर रहे हैं। अहंकार के कारण उन्हें यह नहीं दिखाई पड़ रहा है कि वे संसार को सर्वविनाश के रास्ते पर ले जा रहे हैं।


               श्री राम का जीवन इस बात का उदाहरण है कि अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित अहंकारी शक्ति को भी अपनी आंतरिक आत्मशक्ति के द्वारा पराजित किया जा सकता है। जब विभीषण युद्ध भूमि में श्री राम को बिना रथ के और रावण को अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित रथ पर देखता है तो उनसे पूछता है कि आप इस बलवान रावण को कैसे जीतेंगे? तब श्री राम शौर्य,धैर्य,सत्य,शील इत्यादि उन आंतरिक आत्मशक्तियों को गिनाते हैं जिससे जीत का उनको पूर्ण विश्वास है। रामनवमी उन्हीं आंतरिक शक्तियों का स्मरण कराती है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹