जियो और जीने दो
March 27, 2026/start
🙏युद्ध भीषण से भीषणतर होता जा रहा है। ऐसे में परमाणु युद्ध का भी खतरा मंडराने लगा है। विनाश की ओर बढ़ते कदम को क्या 'जियो और जीने दो' की ओर भी मोड़ा जा सकता है-एक स्वप्निल विश्लेषण 🙏
संवाद
'जियो और जीने दो'
महावीर स्वामी ने 'जियो और जीने दो' का सिद्धांत देते हुए 'अहिंसा परमो धर्म:' का मंत्र दिया था। लेकिन आज चारों तरफ हिंसा का तांडव दिखाई दे रहा है।युद्ध के समय हर पल मन उत्सुक रहता है यह जानने को कि क्या हुआ। जो मन शांति की प्रार्थना कर रहा है, वह मन बढ़ते हुए तनाव को देखकर और ज्यादा चिंतित हो जाता है। उस चिंता को परमाणु युद्ध की आशंका सातवें आसमान पर पहुंचा देती है।
एक टीवी डिबेट शो में एंकर ने एक रक्षा विशेषज्ञ से पूछा कि एक दूसरे के परमाणु ठिकानों पर हमला किया जा रहा है, ऐसे में क्या परमाणु युद्ध की संभावना है?
उस रक्षा विशेषज्ञ ने कहा कि संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। यदि इजरायल को लगता है कि मेरा अस्तित्व ही खतरे में है क्योंकि वह बहुत छोटा मुल्क है तो वह ईरान पर परमाणु बम का उपयोग अंतिम अस्त्र के रूप में कर सकता है।
दूसरे रक्षा विशेषज्ञ ने कहा कि अमेरिका में जैसा विक्षिप्त राष्ट्राध्यक्ष है, वह छोटी शक्ति ईरान से अपनी हार की और अपनी गिरती लोकप्रियता की झुंझलाहट को मिटाने के लिए परमाणु बम का विकल्प चुन सकता है।
तीसरे रक्षा विशेषज्ञ ने कहा कि ईरान 'करो या मरो'(Do or die) की भावदशा में है।ऐसे में यदि अमेरिका अपनी परमाणु शक्ति का इस्तेमाल करता है तो रूस भी अपनी परमाणु शक्ति का इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र हो जाएगा।
चौथे क्रम में एक शिक्षाविद् ने अपना विचार व्यक्त करते हुए कहा कि परमाणु युद्ध की मैं कोई संभावना नहीं देखता। 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध के समय में अमेरिका ने हिरोशिमा पर परमाणु बम जब गिराया था उस समय सिर्फ अमेरिका के पास ही परमाणु बम था। परमाणु बम गिराकर अमेरिका ने स्वयं को विश्व का सबसे शक्तिशाली देश तो साबित कर दिया किंतु साथ ही विश्व का और इतिहास का सबसे संवेदनहीन मुल्क होने का भी उस पर दाग लग गया। क्योंकि क्षण भर में लाखों जिंदगियां जलकर खाक हो गईं और पीढ़ियां रेडिएशन के खतरे से विकलांग हो गईं-
'लम्हों ने खता की, सदियों ने सजा पाई।'
आज परमाणु शक्ति संपन्न कई राष्ट्र हैं और परमाणु बम से भी खतरनाक कई प्रकार के बम बना लिए गए हैं जिनके उपयोग मात्र से सिर्फ मानव का ही नहीं बल्कि पशु-पंक्षी के साथ पेड़-पौधों का भी अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। पानी,मिट्टी,हवा सबमें रेडिएशन फैल जाएगा। इतने बड़े विनाश तक कोई जाने का साहस नहीं करेगा।
शिक्षाविद् के तर्क से मैं थोड़ा सहमत हो गया और थोड़ी राहत की सांस ली। क्योंकि कोई भी अपने को बचाना चाहता है। जीत का मजा भी तभी है जब अहंकार की उद्घोषणा के लिए स्वयं हम बचें। लेकिन जब सबके नष्ट हो जाने की संभावना हो तो ऐसे बम का कोई उपयोग क्योंकर करेगा?
लेकिन तभी भस्मासुर की कथा मेरे ध्यान में आई और मेरी राहत की सांस उड़ गई। यह पौराणिक कथा तथ्य नहीं भी हो लेकिन इसमें सत्य बहुत ज्यादा है। कथा है कि शिव को प्रसन्न करके भस्मासुर ने यह वरदान मांग लिया कि जिसके सर पर वह हाथ रखे वह जलकर भस्म हो जाए। आशुतोष अर्थात् जल्दी प्रसन्न होने वाले शंकर ने उसे वरदान दे दिया। वरदान पाकर भस्मासुर शंकर के माथे पर ही हाथ रखने को दौड़ा। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण करके भस्मासुर का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित कर लिया। मोहिनी की नृत्य मुद्रा में खोए हुए भस्मासुर ने उनका अनुसरण करते हुए अपना हाथ अपने ही सर पर रख लिया और स्वयं जलकर भस्म हो गया। संदेश यह है कि दूसरे को नष्ट करने की भावना वाला अंततः स्वयं ही नष्ट हो जाता है।
लेकिन इस कहानी के अंत की व्याख्या मेरे दृष्टिकोण में यह है कि भस्मासुर मोहिनी के सौंदर्य को देखकर प्रेम में डूब गया और प्रेम में डूबा हुआ व्यक्ति मृत्यु को भी गले लगा लेता है-
'मोहब्बत की और मौत की पसंद तो देखिए
एक को दिल चाहिए और दूसरे को धड़कन।'
सार संदेश यह है कि परस्पर एक दूसरे को नष्ट करने की कामना वालों की जिंदगी में प्रेम की कमी है। उनके पास पद कितना भी बड़ा हो,संपत्ति कितनी भी ज्यादा हो और शक्ति कितनी भी असीमित हो लेकिन वे सभी अंदर से खाली के खाली हैं। तभी विनाश में उनकी इतनी उत्सुकता है अन्यथा प्रेम में सृजन के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता।
एक तरफ है जन्म और दूसरी तरफ है मृत्यु। जन्म और मृत्यु के बीच में प्रेम है,जिसे हम जीवन कहते हैं। मां-बाप के प्रेमपूर्ण मिलन से जन्म होता है और आत्मा का परमात्मा के साथ मिलन से मृत्यु घटित हो जाती है।अर्थात् प्रेम का एक छोर जन्म से जुड़ा हुआ है तो दूसरा छोर मृत्यु से जुड़ा हुआ है। अतः एक विरोधाभासी घटना घटती है। प्रेम हो तो व्यक्ति जीना चाहता है और प्रेम नहीं हो तो मरना चाहता है या मारना चाहता है।
इसीलिए सारे धर्मों का एक मूलभूत संदेश है-प्रेम। राजनीति प्रेम की विरोधी है। इसीलिए मौलिक रूप में धर्म और मौलिक रूप में राजनीति कभी भी मिल नहीं सकते। यदि आज राजनीति विनाश करने पर आतुर है तो धर्म को चाहिए कि सृजन करने में आगे बढ़े। एटम शक्ति से भी ज्यादा शक्तिशाली है आत्मशक्ति। इस आत्मशक्ति को जगाने के अलावा विनाश की ओर बढ़ रहे विश्व को बचाने का अन्य कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा। यह जगत आमजन का भी है जो प्रेम से जीना चाहते हैं, सिर्फ उन राष्ट्राध्यक्षों का ही नहीं जो मरना और मारना चाहते हैं।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹