🙏इस बार राजस्थान के सरकारी स्कूलों में शिक्षा-सत्र 1 जुलाई के बजाय 1 अप्रैल से शुरू हो रहा है। उद्देश्य है निजी स्कूलों की तरफ आकर्षित होते विद्यार्थियों को सरकारी स्कूलों की तरफ आकर्षित करना। क्या यह कदम पर्याप्त है?-एक विश्लेषण 🙏


संवाद


'सरकारी शिक्षालय में विश्वास बहाली'


              राजस्थान के सरकारी स्कूलों में इस बार नया शिक्षा-सत्र 1 जुलाई के बजाय 1 अप्रैल से शुरू किया जा रहा है। उद्देश्य है कि निजी शिक्षण संस्थानों की ओर आकर्षित हो रहे बच्चों को सरकारी स्कूलों की ओर आकर्षित कर लिया जाए। अतः आज का यह सबसे विचारणीय प्रश्न बन गया है कि सरकारी शिक्षा में विश्वास बहाली कैसे हो?'


         इस संबंध में महत्वपूर्ण विचारणीय विषय यह है कि अधिक योग्यता रखने वाले सरकारी शिक्षकों को छोड़कर अपेक्षाकृत कम योग्यता वाले शिक्षकों से युक्त निजी शिक्षण-संस्थानों की ओर जनमानस क्यों आकर्षित हो रहा है?


             यहां महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि साधनसंपन्न वर्ग ही नहीं बल्कि साधनविहीन वर्ग भी सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को अब नहीं भेजना चाहता है। जबकि 21वीं सदी के पूर्व सरकारी शिक्षण संस्थानों में साधन संपन्न वर्ग के लोग भी शिक्षकों की योग्यता और पढ़ाई की गुणवत्ता के कारण अपने बच्चों का एडमिशन करवाते थे और परिणाम भी आशानुकूल पाते थे।


               अब तो सरकारी स्कूलों के सामने में नामांकन का संकट खड़ा हो गया है क्योंकि उसकी विश्वसनीयता पर बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह लग गया है जबकि अनेक प्रकार की सरकारी सुविधाएं बढ़ती जा रही हैं। विश्वसनीयता बहाली के लिए शिक्षा-सत्र को अप्रैल से शुरू कर देना एक प्रारंभिक कदम मात्र है,पर्याप्त नहीं।   


             इस संदर्भ में विश्वसनीयता के आत्मतत्त्व को समझना होगा। शिक्षक और विद्यार्थी के बीच का घनिष्ठ संबंध शिक्षण-संस्थान की आत्मा होती है। शिक्षण-संस्थान में विद्यार्थी पढ़ने जाता है और शिक्षक पढ़ाने आता है। अन्य सारी सुविधाएं पढ़ने और पढ़ाने के संबंध को सुदृढ़ करने हेतु दिया जाता है। किंतु दुर्भाग्य से सरकारी शिक्षण संस्थानों में आत्मतत्त्व 'क्लास' को भुला दिया गया। गैर शैक्षणिक कार्यों में शिक्षकों को इतना उलझा दिया गया कि क्लास खानापूर्ति मात्र रह गया। क्लास को ज्यादा महत्त्व देकर निजी शिक्षण संस्थान कम योग्यता वाले शिक्षकों से भी अच्छा परिणाम दे रहे हैं जबकि सरकारी शिक्षण संस्थान अपने शिक्षकों की अधिक योग्यता के बावजूद समाज का विश्वास खोते जा रहे हैं क्योंकि पढ़ाई गौण होती जा रही है।


           सरकारी खर्च से निजी शिक्षण संस्थानों में गरीब विद्यार्थियों का एडमिशन कराने की अपेक्षा सरकारी शिक्षण संस्थानों में क्लास की गुणवत्ता बढ़ाने पर जोर दिया जाना चाहिए। इससे एक तरफ शिक्षकों की योग्यता का सदुपयोग होगा और दूसरी तरफ आमजन का विश्वास सरकारी शिक्षण संस्थानों के प्रति बढ़ेगा।


               क्योंकि सरकार शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभाग की अनदेखी नहीं कर सकती अन्यथा जनकल्याणकारी राज्य की अवधारणा खंडित हो जाएगी। निजी संस्थान मुनाफा के उद्देश्य से प्रेरित होते हैं जबकि सरकार जनकल्याण के उद्देश्य से।


                  राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लागू होने के बाद भारतीय ज्ञान परंपरा पर सबसे ज्यादा जोर दिया जा रहा है। भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्मा गुरुकुलीय प्रणाली है जहां शिष्य और गुरु अध्ययन-अध्यापन के प्रति पूर्ण समर्पित होते थे। इसके लिए गैर शैक्षिक कार्यों से शिक्षकों की पूर्ण मुक्ति का प्रावधान राष्ट्रीय शिक्षा नीति में किया गया है। लेकिन व्यावहारिक धरातल पर सरकारी शिक्षालय कार्यालय में तब्दील होते जा रहे हैं। सेमेस्टर परीक्षा प्रणाली के कारण कॉलेज में परीक्षाओं के आयोजन में शिक्षकों का बहुत समय जा रहा है और बाकी समय अन्य योजनाओं के क्रियान्वयन में जा रहा है जबकि शिक्षा का काम पूर्णत: उपेक्षित हो गया है। इससे एक ओर शिक्षकों की गौरव-गरिमा धूलधूसरित हो रही है तो दूसरी तरफ विद्यार्थी दिशाहीन होते जा रहे हैं। क्लास की महिमा को स्थापित करने से शिक्षकों को सार्थकता का एहसास होगा और विद्यार्थियों को दिशाबोध भी प्राप्त होगा।


                   वृक्ष की जड़ में पानी देने से वृक्ष हरा-भरा भी होता है और उस पर फल-फूल भी लगता है। शिक्षा रूपी वृक्ष की जड़ क्लास है। राष्ट्र का निर्माण क्लास में होता है। लेकिन आज इसको भुला दिया गया है। जड़ में पानी नहीं डालने से वृक्ष की पत्तियां सूख रही हैं,फूल कुम्हला रहे हैं, फल रसविहीन हो गए हैं। परिणामस्वरुप हमें डिग्रीधारी किंतु अयोग्य युवाओं की फौज देखने को मिल रही है। ऐसे युवा एक तरफ नशे का आदि होकर अपराध की ओर कदम बढ़ा रहे हैं तो दूसरी तरफ रोजगार के अभाव में अंधकारमय भविष्य को देखकर अवसाद और आत्महत्या का शिकार हो रहे हैं।


               इस संदर्भ में भारतीय संस्कृति की एक कथा बहुत ही प्रासंगिक है। बिगड़ी हुई शिक्षा व्यवस्था को देखकर राजा ने गुरु को बुलाया। गुरु ने राजा को लोहे की एक डिबिया में रखे हुए पारस पत्थर को दिखाया। राजा ने पूछा कि आप तो कहते थे कि पारस पत्थर के संपर्क से लोहा सोना हो जाता है किंतु यह लोहे की डिबिया सोना क्यों नहीं हुई? गुरु ने कहा कि हे राजन! डिबिया खोलो इस रहस्य का पता चल जाएगा‌। राजा ने डिबिया खोला तो पारस पत्थर एक पतले कपड़े में लपेटा हुआ था। गुरु ने कहा कि इस पतले कपड़े के कारण पारस पत्थर का संपर्क लोहे से नहीं हो पा रहा है,इस कारण से लोहा सोना नहीं बन पा रहा है। हे राजन!इस राज्य की शिक्षा व्यवस्था इसलिए बर्बादी की ओर बढ़ रही है क्योंकि पारस पत्थर रूपी गुरु और लोहा रूपी शिष्य के बीच आपने पतला कपड़ा ही नहीं बल्कि मोटी दीवार खड़ी कर दी है। कई प्रकार की योजनाओं और आदेशों से आपने पढ़ने वाले और पढ़ाने वाले के निकटतम संपर्क को तोड़ दिया है। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था बर्बादी की ओर जा रही है।


             राजा को बात समझ में आ गई और उसने क्लास की महत्ता को समझकर गैर शैक्षिक कार्यों से शिक्षकों को मुक्त किया और अन्य जनकल्याणकारी योजनाओं से शिक्षालयों को। धीरे-धीरे वातावरण बदलने लगा और शिक्षा जगत में नई क्रांति ने पूरे राज्य में क्रांति ला दी।


            आज तो हर शिक्षालय के हर कमरे में सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं जिनकी मदद से क्लास की मॉनिटरिंग अच्छी प्रकार से की जा सकती हैं और विद्यार्थियों की उपस्थिति के साथ शिक्षक की गुणवत्ता भी जांची परखी जा सकती है। अभी दिल्ली सरकार के कुछ सरकारी विद्यालयों में विद्यार्थी निजी स्कूलों से नाम कटवा कर एडमिशन लेने लगे। क्योंकि सरकार ने मूलभूत सुविधाओं को तो बढाया ही,साथ ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर सबसे ज्यादा जोर दिया।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹