अहिंसक चित्त से ही विकास और शांति संभव
March 30, 2026🙏महावीर जयंती की शुभकामना🙏
युद्ध में दूसरे को जीतने वाले को वीर कहा जाता है किंतु भारतीय संस्कृति स्वयं को जीतने वाले को महावीर कहती हैं। हिंसा के इस युग में महावीर को और उनके अहिंसा को समझने की जरूरत है-एक विश्लेषण 🙏
संवाद
'अहिंसक चित्त से ही विकास और शांति संभव'
भारत विचारकों का नहीं बल्कि आचार्यों का देश रहा है। महावीर स्वामी ने अहिंसा का विचार ही नहीं दिया बल्कि अहिंसा का जीवन जी कर दिखाया। आचार्य उसे कहते हैं जो अपने आचरण से किसी बात की शिक्षा देता है। अहिंसा परमो धर्म: का उनका उपदेश इस हिंसा के युग में अव्यावहारिक ही नहीं असंभव लगता है। क्योंकि आज के तथाकथित राजा या राष्ट्राध्यक्ष या तो युद्ध करने की मानसिकता में है या युद्ध की तैयारी करने की मानसिकता में है। अहिंसा तो उनकी मानसिकता में है ही नहीं।
वर्धमान भी राजा के लड़के थे और क्षत्रिय कुल से थे फिर भी अहिंसा उनके भाव,विचार और कर्म में प्रकट हुआ। क्योंकि जीवन के प्रति उनकी दृष्टि मित्रवत् थी, अरिवत् नहीं। वे 'अरिहंत' कहलाए जिसका अर्थ होता है जिसने अपने सारे शत्रुओं को मार दिया। उनकी दृष्टि में शत्रु बाहर नहीं,आंतरिक हैं। हृदय में उठे हुए नकारात्मक भाव काम, क्रोध,लोभ,मोह,अहंकार इत्यादि हमारे शत्रु हैं ; इनको मारने से या जीतने से अहिंसा का जन्म होने लगता है।
पश्चिम की दृष्टि में बाहर के शत्रुओं को जीतने वाला वीर या महावीर है किंतु पूर्व की दृष्टि अद्भुत है जो स्वयं को जीतने वाले को महावीर कहती हैं। 'जिन' का अर्थ होता है विजेता किंतु जैन धर्म दूसरों का विजय करने में विश्वास नहीं रखता, वह तो स्वयं का ही विजय करने में विश्वास रखता है। इसके लिए सम्यक दर्शन,सम्यक ज्ञान, और सम्यक आचरण पर जोर दिया जाता है।
भारतीय संस्कृति का पहला विषय दर्शन था और जैन धर्म भी अपने त्रिरत्न में सबसे पहले सम्यक दर्शन को रखता है। जैन धर्म से प्रभावित होकर गांधी ने अहिंसा को केवल अपने जीवन में ही नहीं उतारा बल्कि अहिंसा के रास्ते से ही स्वतंत्रता प्राप्ति के अपने लक्ष्य को प्राप्त किया। आज भी तिब्बती बौद्ध दलाई लामा चीन जैसे हिंसक राष्ट्र से अपनी स्वतंत्रता के लिए अहिंसा के रास्ते से वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं। इन सभी के मूल में सम्यक दर्शन है।
महावीर ने अनुभव किया कि एक ही चेतना सब जगह है चाहे वह पाषाण हो या भगवान। पाषाण में वह चेतना सुषुप्तावस्था में है और भगवान में वह चेतना जाग्रतावस्था में है। यदि एक ही चेतना सर्वत्र है तो हम सभी एक हैं,कोई दूसरा है ही नहीं।अरिवत् दृष्टि पैदा होती है किसी को दूसरा मानने से जबकि मित्रवत् दृष्टि पैदा होती हैं सबको अपने समान मानने से। सत्य यही है कि सबमें एक ही चेतना है,फिर सबके प्रति प्रेम की अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं बचता और इसी से अहिंसा का जन्म होता है। गांधी के सत्य,प्रेम,अहिंसा का सिद्धांत यहीं से निकला।
महावीर के अहिंसक चित्त से ही स्यादवाद् या अनेकांतवाद् का सिद्धांत निकला जो मानता है कि सत्य एक है किंतु हमारी सीमित दृष्टि के कारण उसकी अभिव्यक्ति अलग-अलग हो सकती हैं,जैसे पांच अंधों ने हाथी के अलग-अलग अंगों को पकड़कर अलग-अलग बताया और वे आपस में लड़ने लगे। किंतु सम्यक् और समग्र दृष्टि वाले के लिए सभी अपने-अपने अनुसार सही थे किंतु आंशिक थे। आज हिंसा के मूल में यही आंशिक दृष्टि है। जब दृष्टि सम्यक् और समग्र हो जाएगी तो अहिंसा स्थापित हो जाएगी।
उस अहिंसा की स्थापना के लिए महावीर ने कठोर साधना का मार्ग अपनाया। अपने मन के अंदर की नकारात्मक वृत्तियों को जो कठोर साधना से जीत लेगा वह आज भी महावीर होगा। क्योंकि हिंसा से जगत विनाश की ओर बढ़ा है। विकास और शांति की ओर ले जाने के लिए महावीर का अहिंसा ही एकमात्र उपाय है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹