🙏राष्ट्रपति ट्रंप का संबोधन आत्मनिर्भरता की जितनी घोषणा करता चला गया,उतना ही परनिर्भरता का दर्शन होने लगा। भारतीय दर्शन कहता है कि सत्य तो परस्परनिर्भरता है-एक विश्लेषण🙏


संवाद


'परस्परनिर्भरता है सत्य'


अमेरिका ईरान युद्ध का सबसे बड़ा संदेश यह है कि जीवन का सत्य है-परस्परनिर्भरता। विश्व के सबसे शक्तिशाली लोकतांत्रिक देश अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप का राष्ट्र के नाम संबोधन आत्मनिर्भरता की जितनी घोषणा करते चला गया,उतना ही परनिर्भरता स्पष्ट होकर दिखाई देने लगी। नाटो के देशों ने जब सहयोग से मना कर दिया और खाड़ी के देशों ने भी जब दबाव बनाना शुरू किया तब अमेरिका को पता चल गया कि सिर्फ शक्ति नहीं बल्कि सहयोग से जीवन चलता है। खासकर जब अमेरिकी जनता ने युद्ध के विरुद्ध आवाज बुलंद किया तो उन्हें यह आभास हो गया कि जिस शक्ति का उन्हें घमंड हो रहा है,वह शक्ति उन्हें जनता से मिली है-


'जब कभी अहं पर नियति चोट करती है


कुछ चीज अहं से बड़ी जन्म लेती है।'


            अमेरिका ने सोचा था कि ईरान को चींटी की तरह मसल देंगे किंतु चींटी भी जब हाथी के सूंड में प्रवेश कर जाती है तो मुश्किल हो जाती है। राष्ट्र और धर्म के नाम पर जो राजनीति चलती है वह कितनी खोखली है,यह तब पता चला जब पेट्रोल और गैस की किल्लत सभी जगह होने लगी।


            नवोदित राष्ट्र अमेरिका विश्व का सबसे शक्तिशाली लोकतांत्रिक राष्ट्र इसलिए बन सका क्योंकि सारी प्रतिभाओं के लिए उसने अपने दरवाजे खोल दिए थे।अमेरिका को सर्वोच्च बनाने में जितना योगदान वहां के मूल निवासियों का है,उससे कहीं ज्यादा बाहर से आकर बसे हुए लोगों का है। अमेरिका परस्परनिर्भरता (interdependence)का सबसे बड़ा उदाहरण है-


'अपना क्या है इस जीवन में सब कुछ लिया उधार


सारा लोहा उन लोगों का अपनी केवल धार।'


               सम्यक्-दर्शन की आज सबसे ज्यादा जरूरत है। रिपब्लिक में प्लेटो का कथन है- "जब तक दार्शनिक राजा नहीं बन जाते या राजाओं में दर्शन की भावना नहीं आ जाती, तब तक राज्यों को बुराइयों से मुक्ति नहीं मिलेगी"। ईरान के सर्वोच्च नेताओं को मारकर ट्रंप ने सोचा था कि ईरान खत्म हो जाएगा किंतु ईरान की सांस्कृतिक समृद्धि का उन्हें ज्ञान होता तो वे कदापि ऐसा नहीं सोच सकते थे क्योंकि


'जब किसी जाति का अहं चोट खाता है


पावक प्रचंड होकर वह बाहर आता है।'


सर्वोच्च नेताओं के अमेरिका द्वारा मारे जाने पर वहां के सत्ताविरोधी विद्रोही-भाव भी अपनी संस्कृति के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान देने को संकल्पित हो गए।


           इतिहास के इस नाजुक मोड़ पर विश्व को विनाश से बचाने के लिए परस्परनिर्भरता के दर्शन को समझना होगा। जिस हवा में हम सांस लेते हैं, जिस जल से जीवन की प्यास बुझाते हैं और जिस धरती पर रहते हैं ; वे सब परस्पर संयुक्त हैं। इसीलिए भारतीय दर्शन ने 'सर्वे भवंतु सुखिन:' का मंत्र दिया था। किंतु ट्रंप की यह सोच है कि अन्य देश परमाणु शक्तिसंपन्न नहीं हो जाएं,समृद्ध नहीं हो जाएं, शक्तिशाली नहीं हो जाएं ; तो यह नहीं चलने वाला है।


विश्व के पास आज इतनी संपत्ति है कि सभी सुखी हो सकते हैं किंतु उस संपत्ति का उपयोग विनाशक हथियारों के निर्माण में किया जा रहा है। जबकि सम्यक्-दर्शन कहता है कि 'सर्वे भद्राणि पश्यंतु'अर्थात् सभी शुभ देखें। वह शुभ क्या है? वह शुभ है-विविधता।


भिन्न-भिन्न जगह पर भिन्न-भिन्न प्रकार के खनिज भंडार पृथ्वी के गर्भ में छिपे हुए हैं ; उसे प्राप्त करने के लिए परस्परनिर्भरता ही जीवन का सही मंत्र हो सकता है। किंतु इसके लिए 'मा कश्चित् दु:खभाग भवेत्' अर्थात् कोई भी दुखी न हो इस भाव को हृदय में सभी को रखना होगा।


            परनिर्भरता (dependence)सबको बुरी लगती है। इसलिए आत्मनिर्भरता (self dependence/independence)की कोशिश करना अच्छी बात है लेकिन जीवन के इतने विविध आयाम है कि परस्परनिर्भरता (interdependence)के बिना जगत सुखी और संपन्न नहीं हो सकता। भारत का अद्वैत दर्शन परस्परनिर्भरता का संदेश देता है जिसकी जरूरत आज विश्व को है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹