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🙏'क्या आज की रात एक सभ्यता के विनाश की रात है?' कोई नहीं जानता किंतु इस आधुनिक सभ्यता ने विनाश की शक्ति अवश्य अर्जित कर ली है-एक विश्लेषण 🙏


संवाद


"कयामत की रात"


'ईरानी सभ्यता खत्म हो जाएगी, आज की रात कयामत की रात होगी'... अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के इस बयान पर राजनीतिक- विश्लेषकों और युद्ध-विशेषज्ञों की चर्चा सुन रहा था। मेरा तनाव बहुत बढ़ता जा रहा था, वहीं पर मैडम कुतिया के पांच नवजात पिल्लों को आराम से दूध पिला रही थी। बेचैनी में छत पर आकर टहलने लगा तो देखा कि बगल के खेल मैदान में बच्चे मस्ती से फुटबॉल खेल रहे हैं।


थॉमस ग्रे ने 1742 में कहा था-'Ignorance is bliss' अर्थात् अज्ञान में होना आनंदपूर्ण है। लेकिन एक शिक्षक होने के नाते और समाचारपत्र तथा सोशल मीडिया से जुड़े होने के नाते युद्ध की खबरें नहीं चाहते हुए भी कानों में पड़ ही जाती हैं। फिर आंखों के आगे अंधेरा छाने लगता है,भविष्य अंधकारमय दिखने लगता है। एक ही सवाल गूंजने लगता है-


'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में


तुम तरस भी नहीं खाते बस्तियां जलाने में।'


बीस भारतीयों का शव युद्ध क्षेत्र से आया है।वे अपने प्रेम की दुनिया को छोड़कर पैसे कमाने के लिए दूसरे मुल्क में गए ताकि अपने मुल्क में अपने परिवार को अच्छा जीवन जीने के लिए कुछ सहायता भेज सकें। जिनका युद्ध से कोई मतलब नहीं था,वे भी नहीं बच पाते हैं ; ऐसे में जो युद्ध कर रहे हैं उनका क्या हाल होगा? कोई भी रुकने को और झुकने को तैयार नहीं है।


मेरे मन में एक प्रश्न उठने लगा कि क्या जीतने की जिद ही अच्छी बात है , हार मान लेना क्या सचमुच बहुत बुरी बात है? क्या कोई समझाने वाला इन्हें अब नहीं है?


तभी ख्याल आया कि महाभारत युद्ध के पूर्व स्वयं भगवान कृष्ण ने कितना समझाने का प्रयास किया, फिर भी महाभारत नहीं रोका जा सका। सिर्फ पांच गांव पांडवों के लिए उन्होंने दुर्योधन से मांगा किंतु वह तो सूई के नोंक के बराबर भी भूमि देने को तैयार नहीं था। अंततः युद्ध हुआ। किंतु भारतीय संस्कृति का महाभारत इस मायने में विशेष है कि युद्ध के पूर्व युद्ध के लिए नैतिक नियमों को दोनों पक्षों द्वारा बैठकर निश्चित किया गया-


'जहां पर चला करती थीं तलवारें भी ईमानदारी से


वहां पर आज कलम लाचार क्यों है,सोचना होगा


हमारा मर गया किरदार क्यों है, सोचना होगा


इतना उपेक्षित साहित्यकार क्यों है,सोचना होगा।'


लेकिन युद्ध के दौरान क्या उन नैतिक नियमों का पालन किया गया?-यह प्रश्न और भी विशेष महत्त्व का हो जाता है। इस समय युद्ध पर हो रही चर्चा में पश्चिम का एक वाक्य बार-बार दोहराया जा रहा है-'everything is fair in love and war' अर्थात् प्यार और जंग में सब कुछ जायज है। लेकिन पूरब की सोच है कि प्यार के ही सलीके नहीं हैं बल्कि युद्ध के भी तरीके हैं ; मसलन बच्चों और स्त्रियों पर प्रहार नहीं किया जाएगा, सूर्यास्त के बाद युद्ध रोक दिया जाएगा, किसी योद्धा को घेरकर अनेक योद्धाओं के द्वारा नहीं मारा जाएगा, एक पक्ष जिस अस्त्र-शस्त्र से लड़ रहा है उसी अस्त्र-शस्त्र से लड़ना होगा इत्यादि। प्रत्येक दिन के युद्ध के बाद दोनों सेनाओं के महारथी मिलकर विचार-विमर्श भी करते थे। फिर भी युद्ध के बनाए नियम टूटे-अभिमन्यु घेरकर मारा गया, भीष्म,द्रोण,कर्ण छल से मारे गए, यहां तक कि पांडवों के शिविर में सोते हुए उनके पांचों पुत्रों की निर्दयतापूर्वक हत्या अश्वत्थामा द्वारा किया गया और उसने उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर उसे मारने का घोर पाप किया। इन सब के बावजूद नैतिकता और मानवीय मूल्यों के साथ युद्ध लड़ने वाले कर्ण का सम्मान स्वयं भगवान कृष्ण ने किया है और आज भी युद्ध जीतने वाले अर्जुन से ज्यादा युद्ध हारने वाले कर्ण का नाम अधिक आदर से लिया जाता है। जबकि अश्वत्थामा आज भी अपने पापों का दंड भुगत रहा है। क्या हिरोशिमा पर बम गिराने का आदेश देने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमैन को कभी अपने पापों से मुक्ति मिल पाएगी?


आधुनिक काल में जेनेवा कन्वेंशन 1949 द्वारा युद्ध के दौरान मानवीय व्यवहार के नियम निर्धारित किए गए जो अमानवीय व्यवहार पर रोक लगाते हैं और उन्हें युद्ध अपराध की श्रेणी में रखते हैं। लेकिन आज नैतिकता और मानवता की बलि चढ़ा दी गई है। जिसकी लाठी,उसकी भैंस के जमाने में हम जी रहे हैं,जहां शक्ति ही अंतिम सत्य है।


ट्रंप की अंतिम चेतावनी की समय सीमा खत्म होने के बाद क्या होगा मैं नहीं जानता। लेकिन इतना जरुर जानता हूं कि शक्ति के ऊपर यदि शांति की छाया नहीं पड़ती है तो विनाश होता है। क्योंकि


'जब नाश मनुज पर छाता है,


पहले विवेक मर जाता है।'


युद्ध रुकवाना तो वश में नहीं है किंतु भारतीय संस्कृति के शांति मंत्र का जाप करना तो अपने वश में अवश्य है-


ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः,


पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः।


वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः,


सर्वं शान्तिः, शान्तिरेव शान्तिः, सा मा शान्तिरेधि॥


ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹