सम्यक्-बोध का अभाव
April 12, 2026🙏जल जीवन मिशन घोटाले में आईएएस अधिकारी सुबोध अग्रवाल जी का नाम भगोड़ा के रूप में आने पर और उनके लुकाछिपी का समाचार बार-बार दिखाए जाने पर एक प्रश्न मुझे परेशान कर रहा है कि आखिर इतने बड़े पद पर पहुंचा हुआ संस्कारी खानदान का इतना शिक्षित व्यक्ति भ्रष्ट कैसे हो सकता है?-एक विश्लेषण 🙏
संवाद
'सम्यक्-बोध का अभाव'
आर्थिक घोटाले के आरोप में आईएएस अधिकारी सुबोध अग्रवाल भगोड़ा घोषित किए जाने के 51 दिन के बाद अंततः पकड़े गए। जयपुर में आयोजित प्राचार्यों की मीटिंग में शिक्षा सचिव के रूप में मूल्य और ज्ञान के प्रति निष्ठावाले उनके भाषण से मैं जितना प्रभावित हुआ था, उतना ही मैं लुकाछिपी के उनके खेल को समाचारपत्रों के प्रथम पृष्ठ पर बार-बार देखकर विस्मित हो रहा था। ऊंची शिक्षा,ऊंचा खानदान,ऊंचा पद.... आखिर सब कुछ था उनके पास फिर भी भ्रष्टाचार का ऐसा संगीन आरोप सुनकर ऐसा लगता है कि सम्यक्-बोध का अभाव था। सम्यक बोध इस सत्य को ध्यान में रखने से होता है कि-
'नित्य बदलती दुनिया में मानव तू कितना धन कमाएगा
कितनी भी दौलत जुटा,मगर तू खाली हाथ ही जाएगा।'
फिर भी दुनिया अर्थ के पीछे पागल है क्योंकि दुनिया के ख्याल में यह बात है कि 'पैसा खुदा तो नहीं लेकिन खुदा की कसम,खुदा से कम भी नहीं।'
व्यक्ति का मूल्यांकन जब आत्मा के आधार पर नहीं बल्कि अर्थ के आधार पर होने लगे तो अर्थ की महिमा बहुत ज्यादा हो जाती है। अर्थ की खूबी यह है कि इसे गलत रास्ते से बहुत जल्दी और बहुत ज्यादा कमाया जा सकता है किंतु सत्य यह है कि गलत रास्ते से कमाया गया अर्थ सुकून और शांति नहीं दे सकता जिसकी आत्मा को सबसे ज्यादा जरूरत है। 'सत्यानुसारिणी लक्ष्मी:' मंत्र कहता है कि सत्य के रास्ते से अर्जित की गई लक्ष्मी ही हमें आत्मवान बनाती है।
लेकिन आत्मा की तरफ आजकल कौन देखता है, आत्मप्रतिष्ठा के बारे में कौन सोचता है ; सबका ध्यान सामाजिक-प्रतिष्ठा की ओर चला गया है। मानव एक सामाजिक प्राणी है,इसलिए समाज द्वारा निर्धारित किया गया मूल्य उसे बहुत प्रभावित करता है। इस समाज ने कभी बुद्ध और महावीर को प्रतिष्ठा दी थी तो समाज में भिक्खु और श्रमण बनने के लिए अनगिनत लोगों ने त्याग का रास्ता अपनाया। आज के समाज ने धन,पद,प्रतिष्ठा को जरूरत से ज्यादा मूल्य दिया है, इसलिए अनगिनत लोग अपनी आत्मा को बेचकर भी उसे अर्जित करना चाह रहे हैं। आज के समाज ने साधन की पवित्रता को पूर्ण रूप से विस्मृत कर दिया है और साध्य को सब कुछ मान लिया है। जबकि गांधी साधन और साध्य दोनों की पवित्रता पर सर्वाधिक जोर देते थे।भारतीय संस्कृति ने घोषणा की थी कि अमृत आत्मा की प्राप्ति एकमात्र त्याग से ही होती है-
त्यागेनैकेन अमृतत्वमानशुः।
भोग के इस जमाने में त्याग की बात हास्यास्पद लगती है लेकिन सम्यक्-बोध कहता है कि भोग व्यक्ति की आत्मा को खा जाता है और त्याग व्यक्ति को आत्मा से मिला देता है। भोग का साधन जितना बढ़ता जा रहा है उतना ही ज्यादा अवसाद और आत्महत्या की घटना बढ़ती जा रही है ; यह इस बात का प्रमाण है कि भोगवाद ने व्यक्ति को आत्मविस्मृत कर दिया है-
'महफ़िलें ज्यों-ज्यों हंसी,तनहाइयां बढ़ती गईं
आप ज्यों-ज्यों पास आए खाईयां बढ़ती गईं।
यह कौन सी धूप है इस महानगर में दोस्तों
हम तो छोटे हो गए , परछाइयां बढ़ती गई।।'
आखिर असीमित अर्थ के पीछे व्यक्ति क्यों भाग रहा है? क्योंकि उसकी कामनाएं असीमित हो गई हैं और असीमित कामनाओं की पूर्ति असीमित अर्थ के द्वारा ही हो सकती हैं। लेकिन कोई नहीं सोच रहा है कि वासनाएं दुष्पुर है जैसा कि बुद्ध बताते थे।धर्म-अर्थ-काम-मोक्षरुपी पुरुषार्थ-चतुष्टय का मंत्र बुद्धों का सबसे बड़ा दान है। यह कहता है कि धर्मानुकूल अर्थ से धर्मानुकूल काम की पूर्ति करके व्यक्ति मोक्ष प्राप्त कर लेता है। अधर्म से अर्थ की प्राप्ति व्यक्ति को अधार्मिक कामनाओं की पूर्ति के लिए प्रेरित करती है जिसके कारण वह बंधन में फंस जाता है।
महात्मा बुद्ध ने मध्यम-मार्ग का उपदेश देकर यही बताया कि हर मामले में सम्यकत्व का बोध रखो। सुबोध नाम की सार्थकता अपने बोध को जगाए रखने में है,न कि उसे खो देने में।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹