🙏बाबा साहेब जयंती की शुभकामना🙏


शिक्षा को समर्पित बाबासाहेब के जन्मदिवस पर बांसवाड़ा की शिक्षा पर एक सूक्ष्म दृष्टि....


संवाद


"कहां बाबा साहेब और कहां बांसवाड़ा"


'शिक्षित बनो,संगठित रहो और संघर्ष करो' का मंत्र देने वाले बाबा साहेब की आधारभूत बात 'शिक्षित बनो' को यदि भुला दिया जाए तो संगठन और संघर्ष की दिशा भटक जाती है। 'शिक्षित बनो' बाबा साहेब के मंत्र की नींव है जिसे बांसवाड़ा भुला रहा है। गहरी नींव के बिना ऊंची इमारत खड़ी नहीं हो सकती।


बाबा साहेब के पास भारत की सबसे बड़ी निजी लाइब्रेरी थी जिसमें लगभग 35000 पुस्तकें थीं जबकि बांसवाड़ा के अधिकांश विद्यार्थियों के पास पासबुक के अलावा और कुछ नहीं होता। पासबुक भी वे परीक्षा के समय खरीदते हैं ताकि उसे सरसरी निगाह से देखकर परीक्षा में बैठ जाएं। एक तरफ बाबा साहेब के ज्ञान की प्यास इतनी तीव्र थी कि वे उसके लिए विदेश तक गए क्योंकि उस समय उच्च- शिक्षा-संस्थान भारत में नहीं थे जबकि आज बांसवाड़ा में हर जगह स्कूल-कॉलेज खोल दिए गए हैं, यही नहीं करोड़ों की लागत से इंजीनियरिंग कॉलेज और मेडिकल कॉलेज तक की सुविधा दी गई है किंतु यहां के विद्यार्थियों में ज्ञान की ललक इतनी कम है कि उन्होंने क्लास में आना भी छोड़ दिया है।


               बांसवाड़ा शुरू से ऐसा था, ऐसा मैं नहीं कह सकता। क्योंकि 1996 में यहां आने के बाद सारी कक्षाओं में अच्छी संख्या में विद्यार्थियों की उपस्थिति को देखता था। उस समय के विद्यार्थियों में जिज्ञासा भी इतनी थी कि वे मेरे घर पर अपने प्रश्न पूछने आ जाते थे। उन्हीं विद्यार्थियों ने 'शिष्य-गुरु संवाद केंद्र' की शुरुआत की,जहां रविवार को भी सुबह 6:00 से 9:00 बजे तक नियमित चर्चा निःशुल्क नए-नए विषयों पर होती थी। ज्ञान पाने की ललक वाले ऐसे विद्यार्थी उस समय पासबुक की दुकान होने पर भी मौलिक पुस्तकें खरीदते थे और शिक्षक द्वारा बताए जाने पर महापुरुषों की जीवनी भी पढ़ते थे। ऐसे विद्यार्थियों ने मुझ जैसे शिक्षकों को नए-नए विषयों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया ताकि उनके नए-नए प्रश्नों का जवाब दिया जा सके। उस समय उच्च शिक्षा को नियंत्रित करने वाला विभाग निदेशालय (Directorate)कहा जाता था और उसके शीर्ष पर निदेशक (director) कोई शिक्षाविद् होता था। उस समय शिक्षकों का मुख्य काम पढ़ना और पढ़ाना होता था। गैर शैक्षिक गतिविधियां आटे में नमक के बराबर होती थी।


              किंतु जब से आयुक्तालय (commissionarate) बना और उसके शीर्ष पर कोई प्रशासनिक अधिकारी बैठने लगा तब से समितियों की और गैर-शैक्षिक-कार्यों की संख्या बढ़ती गई। धीमे-धीमे कॉलेज की कक्षाओं में विद्यार्थियों की संख्या कम होने लगी और ट्यूशन तथा कोचिंग में भीड़ बढ़ने लगी। तत्पश्चात बांसवाड़ा में निजी कॉलेजों की बाढ़ सी आ गई जिनकी संख्या 50 के ऊपर पहुंच गई। इन नए निजी कॉलेजों ने खासकर सामान्य कोटि के विद्यार्थियों को और अच्छे विद्यार्थियों को अपनी ओर आकर्षित करना शुरू कर दिया। इस बात का ज्यादा दुष्प्रचार किया गया कि सरकारी कॉलेजों में नियमित क्लासेज नहीं होने के कारण पाठ्यक्रम पूर्ण नहीं होता। सरकारी कॉलेजों में नामांकन हेतु मेरिट का प्रतिशत घटता गया और पासबुक वाली पीढ़ी का प्रचलन बढ़ता गया।


                 लेकिन विद्यार्थियों के रुझान में सबसे बड़ी गिरावट कोरोना काल के बाद देखने को मिली। बिना पढ़े हुए सबको अच्छे नंबरों से पास कर दिया गया और इसका परिणाम यह हुआ कि लर्निंग-गैप बहुत ज्यादा बढ़ गया। कोरोना के विपत्ति काल में बिना मेहनत के अच्छे नंबर पाने वाले विद्यार्थियों ने आपद्-धर्म को नहीं समझा। इससे समाज में यह संदेश गया कि बिना पढ़ाई के भी अच्छे नंबर आ जाते हैं तो फिर पढ़ने की जरूरत क्या है? मेरिट वाले विद्यार्थियों के लिए जो स्कॉलरशिप होता था,उसको सभी के लिए सुलभ करा दिया गया। इसका संदेश यह गया कि मेरिट बढ़े या न बढ़े, हमारी सुविधा बढ़ेगी। अब तो विद्यार्थी पढ़ने के लिए दी जाने वाली इन सुविधाओं को अपना हक समझने लगे हैं। पढ़ाई के प्रति उनका दृष्टिकोण यह हो चला है कि विद्यार्थी एक आवेदनपत्र में भी अनेक गलतियां करते हैं तथा वही गलती बार-बार करते हैं,जिनके लिए उनको बार-बार टोका जाता है।


               बाबा साहेब नए-नए विषयों को सीखने के लिए इतने उत्सुक रहते थे कि अपनी पीएचडी भी उन्होंने तीन-तीन विषयों में की। उनके एक शिक्षक ने 'बुद्ध के उपदेश' की एक किताब उन्हें दी तो बाबा साहेब ने बौद्ध धर्म के साथ अन्य धर्मों की भी गहरी जानकारी प्राप्त की। फिर काफी सोच विचार के बाद हिंदू धर्म की कुरीतियों से परेशान होकर उन्होंने बौद्ध धर्म ग्रहण करने का निर्णय लिया। बांसवाड़ा में लोग थोड़े प्रलोभनों में बिना चिंतन- मनन किए हुए अपना धर्म छोड़कर ईसाई बन जाते हैं।


                    बांसवाड़ा में 2016 में विश्वविद्यालय आया,नई शिक्षा नीति आई और सेमेस्टर पद्धति शुरू की गई। लेकिन ज्यों-ज्यों दवा की गई,मर्ज बढ़ता गया। इसके कई कारण हैं किंतु मूल कारण यह है कि विद्यार्थियों में ज्ञान की प्यास और जिज्ञासा का अभाव हो गया है। बाबा साहेब के जमाने में स्कूल भी मुश्किल से उपलब्ध था और कॉलेज तो विदेश में था ; फिर भी अपनी ज्ञान की प्यास बुझाने के लिए वे ज्ञान के सागर तक पहुंच गए। आज गली-मोहल्ले में स्कूल-कॉलेज खोल दिए गए हैं किंतु ज्ञान की प्यास और जिज्ञासा नहीं होने के कारण इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज जैसे संस्थान भी मृत-प्राय है। इसका परिणाम यह देखने को मिल रहा है कि सरकारी शिक्षकों की होने वाली प्रतियोगिता परीक्षा में न्यूनतम अंक लाने की बाध्यता अनिवार्य होते ही 200 में से पांच विद्यार्थी भी उत्तीर्ण नहीं हो रहे हैं। जबकि नकल करने और डमी विद्यार्थियों के मामले में बांसवाड़ा सबसे ज्यादा बदनाम हो गया है।


           बाबा साहेब के जन्मदिवस पर सिर्फ रैलियां निकालने और नारे लगाने से ज्ञान नहीं बढ़ता बल्कि मौलिक पुस्तकें  खरीदकर नियमित क्लास में आने से और स्वाध्याय करने से ज्ञान बढ़ता है। एक तरफ अच्छे शिक्षकों की तलाश में बाबा साहेब विदेश तक गए और दूसरी तरफ बांसवाड़ा में अच्छे शिक्षक अपने क्लास में विद्यार्थियों का इंतजार करते रह जाते हैं और विद्यार्थी दर्शन तक नहीं देते। बाबा साहेब को सम्मान देने का क्या यह तरीका सही है, निर्णय आपको करना है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹