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🙏महिला आरक्षण सिर्फ महिलाओं की संख्या बढ़ाने का मसला नहीं है बल्कि उस संवेदनशीलता और संवादशीलता को बढ़ाने का महत्वपूर्ण माध्यम है जो आज राजनीति से गायब होती जा रही है। ऐसे में एक महिला शिक्षिका की दास्तान घर-घर पहुंचाने लायक है...🙏


संवाद


"आशा का दीप:शिक्षा और शिक्षक"


किसी भी संस्कृति के निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण योगदान शिक्षा का होता है।भारतीय संस्कृति में मन के निर्माण करने वाले शिक्षक को तो परमब्रह्म कहकर सबसे ऊंचा स्थान दिया गया है। राजा से भी ज्यादा महत्वपूर्ण गुरु को मानने वाली सोच के पीछे मूल दर्शन यह है कि राज्य की व्यवस्था मन की व्यवस्था के अनुसार चलती है।


'वे अमीर हैं निजामे जहां बनाते हैं


हम फकीर हैं मिजाजे जहां बदलते हैं।'


               फकीरों के समान जीवन जीने वाले शिक्षकों ने दर-दर की ठोकरें खाकर गुदड़ी के लालों को पहचाना है और उन्हें निखारा है। मात्र राजाओं के उपवन में ही कुसुम नहीं खिलते, अनगिनत बार तो वे राजमहल से दूर जंगल में मिलते हैं और गरीबों की झोपड़ियों में खिलते हैं।शिक्षक की दृष्टि करुणावश उन झोपड़ियों पर जाकर टिक जाती है।


भारतीय शिक्षिका रूबल नागी को ग्लोबल टीचर पुरस्कार से 2026 में सम्मानित किया गया जिसके तहत उन्हें एक मिलियन अमेरिकी डॉलर की राशि प्रदान की गई। पुरस्कार और राशि अपने आप में महत्वपूर्ण तो है ही क्योंकि 139 देशों के 5000 उम्मीदवारों में से वे सर्वश्रेष्ठ चुनी गईं, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है उनकी संवेदनशीलता और सृजनात्मकता जिसके कारण स्कूल छोड़ने वाले बच्चे क्लास की ओर लौटने लगे।


उन्होंने अपनी शिक्षा में कलात्मकता का ऐसा समावेश किया कि विद्यालय की दीवारें जिंदा शिक्षक के समान बोलने लगीं। उपेक्षित दीवारों पर उन्होंने ऐसे शैक्षिक भित्ति चित्र बनाए कि उन्हें 'लिविंग वाल्स ऑफ़ लर्निंग' कहा जाने लगा। संख्या ज्ञान हो या स्वास्थ्य की बात, पर्यावरणीय जागरूकता हो या साक्षरता की बात ; जो बात बच्चों के दिलों-दिमाग में पहुंचती ही नहीं थीं, वे अब आंखों से हटती ही नहीं है।


            रुबल नागी जी को इस बात की प्रेरणा मिली एक झुग्गी झोपड़ी की 5 वर्षीय बच्ची से जिसने पेंसिल देखा ही नहीं था। बच्ची को उस पेंसिल की महत्ता बताने के लिए उन्होंने कागज पर उपयोग की जाने वाली पेंसिल का सदुपयोग सूनी पड़ी दीवारों पर रंगीन जीवंत चित्र बनाने के लिए किया। इसका प्रभाव यह हुआ कि 100 से अधिक निम्न आय वाले समुदायों के एक मिलियन बच्चे उनके 800 शिक्षक केंद्रों से जुड़ गए।


            रुबल नागी कहती हैं कि उन्हें बच्चों से जुड़कर जो खुशी मिलती है वह दूसरी किसी जगह नहीं। उनके अनुसार एआई बहुत काम का है किंतु एआई के पास वह धड़कता हुआ दिल नहीं है जो बच्चों को देखकर प्रेम और संवेदना से भर जाए। इसलिए एआई के जमाने में भी शिक्षक का महत्व कम नहीं होने वाला है। उपेक्षित बच्चों को देखकर मेरे हृदय में कुछ ऐसा हुआ जो दीवारों पर चित्र बनकर प्रकट होने लगा-


'चाहा कितनी बार की कोई अन्य दूसरा चित्र बनाऊं


तेरी आकृति की कारा से अपने मन को मुक्त कराऊं


सीधी तिरछी हर रेखाएं तेरा रूप उभर आता है


हर दर्पण में तेरा ही प्रिय यह प्रतिबिंब उतर आता है।'


            आज शिक्षकों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है किंतु रुबल नागी जैसे शिक्षक हर संस्थान में छिपे हैं। इसका प्रमाण यह है कि जिंदगी में कोई ऊंचा मुकाम व्यक्ति हासिल करता है तो उसे किसी शिक्षक की याद आती है जिसने उसके दिल के बेरंग दीवारों को आशा के रंग से भरा।


शिक्षा जगत के इस निराशा काल में हमें हर संस्थान के ऐसे शिक्षक को याद करना होगा जो अपने मन के रंगों को उपेक्षित विद्यार्थियों के हृदय के आंगन में उड़ेलना चाहते हैं। सरकार और समाज को भी ऐसे शिक्षकों को पहचानना होगा और उन्हें सहयोग करना होगा जो शिक्षा से दूर जा रहे उनके बच्चों को क्लास की ओर लौटाने की कला में पारंगत है। रुबल नागी एक वो शमा है जो अंधेरों को चीरकर रोशन हुई हैं, जो बुझे दिलों में दीया जलाती हैं।अतः-


"एक न एक शमा अंधेरे में जलाए रखिए


सुबह होने को है माहौल बनाए रखिए ;


न जाने वो किस राहगुजर से गुजरे


हर गुजरराह को फूलों से सजाए रखिए।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹