महिला आरक्षण और संसदीय संवाद
April 18, 2026🙏महिला आरक्षण और संसदीय संवाद पर एक विहंगम दृष्टि🙏
संवाद
'महिला आरक्षण और संसदीय संवाद'
महिला आरक्षण के मुद्दे पर बुलाया गया विशेष संसद सत्र बेनतीजा रहा। दरअसल सदियों की पितृसत्तात्मक सोच इतनी जल्दी बदल भी नहीं सकती। इसलिए एक ने महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ दिया तो दूसरे ने परिसीमन पर भंडा फोड़ दिया। इसी का नाम है राजनीति। माता सीता ने तो अपने विरुद्ध हो रहे अन्याय पर मुंह नहीं खोला लेकिन द्रौपदी ने खोला भी तो उसका जवाब नहीं मिला-
'पुरुषों की दुनिया में मुनिया अपने सपने बुनती है
अपने वजूद की तलाश में नए ख्यालात चुनती है।'
विज्ञान के आविष्कारों ने नारी मुक्ति की परिस्थिति को पैदा किया और आधुनिक शिक्षा ने सवालों को। भारतीय संस्कृति की मूल अवधारणा है कि नर और नारी का भेद सतही है,दोनों के मूल में चेतना है। चेतना स्वभाव से ही स्वतंत्र होना चाहती है। इसलिए नर और नारी एक दूसरे से जितना स्वतंत्र होंगे और एक दूसरे का जितना सम्मान करेंगे उतनी ही दुनिया खूबसूरत होगी। इसलिए नारी सशक्तिकरण की दिशा में सोच में परिवर्तन महिला आरक्षण से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है; क्योंकि नारी पक्ष का कहना है कि मैं पुराने अत्याचारों की बात नहीं करती किंतु नए ख्वाबों की बात तो करूंगी-
'कहां सवालों के तुमसे जवाब मांगते हैं
हम तो अपने आंखों के हिस्से का ख्वाब मांगते हैं।'
अहिल्या पत्थर बना दी गई एक पुरुष के द्वारा और दूसरे पुरुष के द्वारा मुक्त करा दी गई-
'गौतम नारी श्रापवश उपल देह धरि धीर
चरण कमल रज चाहति कृपा करहुं रघुवीर।'
पितृसत्ता बनाए रखने के मूल में यही सोच है। जब तक चेतना को आधार मानकर खुला संवाद और एक दूसरे की स्वीकृति नहीं होती तब तक लोकतांत्रिक चेतना का जन्म नहीं हो सकता।
महिला आरक्षण बिल पर बहस होते समय एलओपी श्री राहुल गांधी और लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला के बीच जो रस्साकसी तथा तीखी नोंकझोंक हुई वह भी पितृसत्तात्मक सोच का ही एक दूसरा आयाम है।
संसद विचारों की यज्ञस्थली है। आप किसी के विचारों से सहमत हों या नहीं हों किंतु उसके विचारों को अभिव्यक्त करने से नहीं रोक सकते। भारतीय संस्कृति का पहला विषय दर्शन इतनी गहराई और इतनी ऊंचाई इसलिए ले पाया कि यहां वाद विवाद से लेकर संवाद तक की गहरी परंपरा रही है चाहे वह शिष्य-गुरु संवाद हो या याज्ञवल्क्य-मैत्रेई संवाद हो।
विपक्षी पार्टी का आरोप है कि यह नहीं बोल सकते,वह नहीं बोल सकते अध्यक्ष द्वारा बार-बार ऐसा नहीं कहा जा सकता क्योंकि इससे अभिव्यक्ति की स्वाभाविकता बाधित होती है। किंतु अध्यक्ष का कहना है कि संसदीय गरिमा के अनुसार दिए गए विषय पर ही आप बोल सकते हैं।
लोकतांत्रिक चेतना के मूल में वाक् स्वतंत्रता है। लेकिन जब सुनने की शक्ति कम होने लगती है तो बोलने की शक्ति में कटौती की जाने लगती है। अध्यक्ष को तो बोलने वाले और सुनने वाले दोनों ही गुण सांसदों में विकसित करने होते हैं क्योंकि उनका पद किसी पार्टी से ऊपर होता है। सांसदों की भी यह जिम्मेवारी है कि विवाद से संवाद की ओर बढ़ें। यहां महात्मा गांधी का एक कथन महत्वपूर्ण हो जाता है कि बहस करते समय हमें नरम शब्दों और अकाट्य तर्कों का सहारा लेना चाहिए।
लेकिन देखने में यह आ रहा है कि शब्द कठोर होते जा रहे हैं और तर्क कुतर्क होते जा रहे हैं। तभी तो असंसदीय शब्दों की डिक्शनरी तक प्रकाशित हो गई है। ऐसे में अध्यक्ष की भूमिका और महत्वपूर्ण होती जा रही है क्योंकि उन्हें एक तरफ अनुशासन को बनाए रखना है तो दूसरी तरफ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी बचाए रखना है।
खासकर महिला आरक्षण जैसे नाजुक मुद्दे पर जब वाद विवाद हो रहा है तो यह समझना चाहिए कि महिला आरक्षण सिर्फ महिलाओं की संख्या बढ़ाने का मसला नहीं है बल्कि संवेदनशीलता बढ़ाने का भी माध्यम है जिसकी नारी प्रतीक है क्योंकि उसकी मंजिल संवाद होती है।
लेकिन यदि राजनीति संवाद-उन्मुख होने की जगह सत्ता-उन्मुख होने लगे तो हम भारत के लोगों को सजग और सतर्क हो जाना चाहिए-
'अगर मस्जिद से वाएज आ रहे हैं
लोगों के कदम क्यों डगमगाए जा रहे हैं
किसी की बेवफाई का गिला था
न जाने आप क्यों शरमाए जा रहे हैं?'
अटल बिहारी वाजपेयी जी ने एलओपी के रूप में भी अपने बोलने की कला से दिल जीता और प्रधानमंत्री के रूप में भी अपने सुनने की कला से दिल जीता। एक साफ दिल इंसान के रूप में एक वोट से अपनी सत्ता गंवाकर तो उन्होंने पक्ष विपक्ष सभी का दिल जीत लिया। ऐसे अटल मूल्यों से लोकतांत्रिक चेतना विकसित होती है और महिला सशक्तिकरण की दिशा में कदम आगे बढ़ता है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹