पिल्लों का क्षणभंगुर जीवन
April 20, 2026/start
"पिल्लों का क्षणभंगुर जीवन"
अंधेरी सुबह के साथ आज शुरुआत हुई। टहलने को निकला तो दरवाजे पर जिस पिल्ले को कल डॉक्टर से दिखा कर लाया था, उसे मृत पाया। उसे आज फिर से डॉक्टर के पास ले जाना था किंतु बड़े भारी मन से सुबह-सुबह उसे सुपुर्द-ए-खाक किया।
कुत्तिया ने छ: पिल्लों को जन्म दिया था। मैडम कुछ दिनों से उनकी देखरेख में दिन-रात लग रही थीं। वे दूध पीकर सड़क पर निकल जाते थे तो आशंका रहती थी कि कहीं गाड़ी के नीचे न आ जाएं। चुंकि पालतू नहीं थे इसलिए घर के अंदर बंद भी नहीं रखा जा सकता था किंतु सड़क पर आती-जाती गाड़ियों से हमेशा बचाया भी नहीं जा सकता था।
अतः ख्याल आया कि इन पिल्लों का एक वीडियो बनाकर पशु प्रेमियों को भेज दो,जो ले जाना चाहें, एक दो पिल्ले ले जा सकते हैं। हमारे पड़ोसी के बच्चे को ही पिल्ले से प्रेम हो गया और दो पिल्लों को उसने अपने घर में रखना शुरू कर दिया। बच्चों को न पता पिल्लों के साथ इतना आनंद क्यों आता है कि वे सड़क पर खेलते भी हैं और उनकी रखवारी भी करते हैं कि कहीं किसी गाड़ी से टक्कर न लग जाए।
किंतु दो दिन पूर्व तेज रफ्तार एक गाड़ी आई और एक साथ कई पिल्लों को अपने चपेट में ले ली। रात लगभग 9:00 बजे वे बच्चे दरवाजे पर चिल्लाने लगे कि आंटी पिल्लों को कार वाले ने कुचल दिया। दौड़कर हम दोनों गए तो दो पिल्लों ने तो दम तोड़ दिया था और एक के पैर में गहरी चोट लग गई थी। कुछ बच्चे रो रहे थे,कुछ कार वाले को गाली दे रहे थे कि साला इतनी तेज रफ्तार में गली में गाड़ी चलाता है और चिल्लाने पर तेज म्यूजिक सिस्टम के कारण हमारी आवाज भी नहीं सुनी। बड़े तो आंसू भी नहीं बहाते और सदमे को जल्दी भूलाते भी नहीं।
जख्मी पिल्ले की चिंता शुरू हुई, पैरों की मालिश की गई और वह दूध पीने लगा। किंतु दूसरे दिन उसका पेट फूलने लगा तो डॉक्टर के पास ले जाना पड़ा। रविवार होने के कारण डॉक्टर तो नहीं मिला किंतु मेल नर्स ने तीन इंजेक्शन देकर सोमवार को लाने को कहा था। सुधार हो चला था किंतु रात में न जाने क्या हुआ कि सुबह वह दम तोड़ चुका था।
दुख कोई भी व्यक्ति नहीं चाहता है किंतु दुख तो जीवन का सत्य है। मृत्यु का दुख तो ऐसा है कि वह और गहरे सत्य को देखने के लिए विवश कर देता है। एक साथ छह पिल्लों से भरी हुई कुत्तिया की जिंदगी में अब एक पिल्ला मुश्किल से बचा। वह अपना दुख जुबान से कह तो नहीं सकती किंतु उस पर नजर पड़ रही है तो ऐसा लगता है कि मानो वह कह रही है कि मेरी हरी-भरी दुनिया इतनी सूनी क्यों हो गई।
तभी मुझे खयाल आया कि कार की तरह ईरान इत्यादि के इलाके में मिसाइल आता होगा और वहां भी हरी-भरी दुनिया इसी तरह वीरान हो जाती होगी। किंतु कुत्तिया में और मानव में एक फर्क है। कुत्तिया अपने बच्चों को कुचलने का बदला लेने हेतु कार वाले पर मिसाइल नहीं चला सकती। उसने नियति स्वीकार कर ली और चुपचाप उदास होकर पड़ी हुई है।
मैं भी उदास होकर आकाश की तरफ देख रहा था और पूछ रहा था कि आखिर जीवन है क्या और इस जीवन का लक्ष्य क्या है? जन्म लेना और कई प्रकार की मुसीबतों से जूझना और मर जाना, क्या यही जीवन है। कितनी भी सुरक्षा कर लो ,यह जीवन सुरक्षित कहां है? कहीं कार वाला है तो कहीं मिसाइल वाला है। यदि इस जीवन की यात्रा जन्म से लेकर मृत्यु तक में ही पूर्ण हो जाती है तो फिर यह जीवन अर्थहीन हो गया।
तभी बचे हुए एक पिल्ले की तरफ आंख गई तो फिर उसे पुचकारने का मन हो गया। हृदय के भाव उमड़ने लगे तभी बुद्धि ने फिर से प्रवेश किया और पूछा कि क्या फिर कोई कार वाला नहीं आ सकता? फिर हृदय फुसफुसाया-क्या मारनेवालों के डर से बचाना छोड़ दिया जाए,प्यार करना छोड़ दिया जाए। बुद्धि और हृदय का यह संघर्ष बढ़ता गया, कभी तर्क जीतता तो कभी भाव। कभी मृत पिल्लों को याद कर आंखें नम हो जातीं तो कभी इस पिल्ले को पूंछ हिलाते देखकर होठों पर हंसी आ जाती-
'नीर भरे ज्यों नभ आंगन में उमड़े पावस मेघ सजीले
और तृषित ज्यों शत-शत युग के चातक के नवबाल हठीले
क्या बतलाऊं इन आंखों में नीर अधिक या प्यास अधिक है?
पल में अंकित हो जाती हैं होठों पर स्वर्णिम मुस्कानें
और दूसरे क्षण नैनों में सावन की रिमझिम अनजाने
क्या बतलाऊं इस जीवन में रूदन अधिक या हास अधिक है?
मैडम और बच्चों के पशु प्रेम ने इतने पिल्लों के जन्म-मरण के खेल को इतने नजदीक से दिखा दिया कि अपना जीवन भी क्षणभंगुर लगने लगा है और यह निर्णय करना मुश्किल हो गया है कि इन आंखों में नीर अधिक है या प्यास अधिक है, इस जीवन में रूदन अधिक है या हास अधिक है?
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹