🙏शंकराचार्य जयंती की शुभकामना🙏


शंकर की मूर्ति पर माला चढ़ाने से नहीं बल्कि वैसा विवेक जगाने से अद्वैत दर्शन समझ में आएगा-एक दृष्टि🎉


संवाद


'शंकर सबकी संभावना है'


भारतीय संस्कृति का पहला विषय दर्शन आज अप्रचलित विषय है और दर्शनशास्त्र में शंकर का अद्वैत दर्शन तो अबूझ दर्शन है। अप्रचलित विषय के अबूझ अद्वैत दर्शन को और उसके प्रतिपादक शंकर को प्रचलित और बोधगम्य बनाना आसान नहीं है।


          शिक्षक की सार्थकता इसी में है कि सबसे कमजोर विद्यार्थी के लिए भी सबसे कठिन विषय सरल बना दे। मैं स्वयं कमजोर विद्यार्थी था और मुझे पढ़ने की जगह खेलने में रुचि थी किंतु मुझे ऐसे शिक्षक मिले जिनको कठिनतम विषय को सरलतम बनाने की कला में महारत हासिल थी।


          मेरे शिक्षक कहते थे कि भौतिकतावाद के इस जमाने में लोग बाहर की तरफ चांद-सितारों की ओर भाग रहे हैं,ऐसे में अध्यात्मवाद का पाठ कैसे समझ में आ सकता है जो अपने भीतर जाने की बात करता है। 'ब्रह्म सत्यं,जगन्मिथ्या' के प्रतिपादक शंकर कम उम्र में संन्यासी हो गए और 32 वर्ष की उम्र में कई उपनिषदों पर भाष्य लिखकर और कई पीठों की स्थापना कर 'अहम् ब्रह्मास्मि' की घोषणा करके ब्रह्म में लीन हो गए जबकि हम सभी 30 वर्ष की उम्र में तो अपने केरियर को शुरू करने की चिंता में लगे रहते हैं-


'तुमने चाहे चांद सितारे , हमको मोती लाने थे


हम दोनों की राह अलग थी साथ तुम्हारा करता क्या


टूट गए जब बंधन सारे और किनारे छूट गए


बीच भंवर में मैंने उनका नाम पुकारा करता क्या?'


               भारतीय ज्ञान परंपरा की अद्भुत देन है कि ज्ञान को उसने सबसे ऊपर रखा और कर्म के ऊपर ज्ञान को स्थापित करने में शंकर का सबसे बड़ा योगदान है।


               लेकिन आज का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि भारतीय ज्ञान परंपरा की बात करने वाली नई शिक्षा नीति में बिना समुचित शिक्षा के नियमित परीक्षा ही परीक्षा चल रही है। विश्वविद्यालय सिर्फ डिग्री बांटने का केंद्र बन कर रह गए हैं। ज्ञान का संवाहक ब्राह्मण सिर्फ जाति से नाममात्र का ब्राह्मण रह गया है। जबकि शंकर का कहना है कि जो ब्रह्म को जानता है वही ब्राह्मण है-'ब्रह्मविद ब्रह्मैव भवति।' इस मापदंड के आधार पर तो जाति,धर्म,क्षेत्र,लिंग,वर्ण सब कुछ छूट जाते हैं; सिर्फ एक आधार बचता है-ब्रह्म को जानने की योग्यता का आधार।


              आज तो योग्यता से भारत मुंह मोड़ चुका है। शंकराचार्य जयंती की औपचारिकता निभा दी जाएगी किंतु योग्यता को पैदा करने वाली ज्ञानपरक दृष्टि के निर्माण हेतु कोई वातावरण नहीं बनाया जाएगा। परिणाम में अवसाद और आत्महत्या की घटना बढ़ती जा रही है। क्योंकि नित्य बदलने वाली इस अनित्य दुनिया को हमने सत्य समझ रखा है जबकि शंकर इसे 'मिथ्या' कहते हैं। मिथ्या कहने का उनका अभिप्राय यह है कि पल-पल जगत बदल रहा है उसे शाश्वत समझना सबसे बड़ी भूल है। शंकर की इस बात का आधुनिक विज्ञान और हमारा अनुभव भी समर्थन करता है। बच्चा कब जवान हो जाता है,जवान कब बूढ़ा हो जाता है और बूढ़ा कब मृत्यु को प्राप्त हो जाता है;पता ही नहीं चलता। इस दृष्टि को स्वीकार करने से व्यक्ति वस्तुओं का असीमित परिग्रह नहीं कर सकता और भोगों में आकंठ लिप्त नहीं हो सकता।


'ब्रह्म सत्यं' का मतलब है कि चेतना ही सत्य है। विज्ञान पहले मानता था कि पदार्थ ही सत्य है किंतु परमाणु की खोज करने से पता चला कि उसके अंदर में इलेक्ट्रॉन,प्रोटॉन,न्यूट्रॉन है। काव्यात्मक भाषा में हमारे ऋषियों ने इसे ही ब्रह्मा,विष्णु,महेश कहा है। जिस प्रकार से एक ही विद्युत बल्ब को जलाती है,पंखे को चलाती है, कूलर से ठंडक भी देती है और हीटर से गर्मी भी। बल्ब, पंखा, कूलर,हीटर के नष्ट हो जाने पर भी विद्युत नष्ट नहीं होती। विज्ञान जिसे विद्युत कहता है,शंकर उसे ब्रह्म या चेतना कहते हैं। हम सभी के शरीर को चलाने वाली वह चेतना शरीर के नष्ट होने पर भी कभी नष्ट नहीं होती। इसी दर्शन के आधार पर जगत में एकता और समानता स्थापित की जा सकती है, संघर्ष की जगह शांति को लाया जा सकता है-


'लौटी है साथ ले के समंदर की आदतें


पहुंची है जो भी बूंद तुम्हारे गिलास तक


कैसा है नशा सुबह का उस रात से पूछो


बाधाएं पार करके जो पहुंची उजास तक


कलियों का फूल होना बड़ी बात है मगर


रस्ता बहुत कठिन है सुमन से सुवास तक।'


समंदर के एक बूंद में भी वही गुण रहता है जो समंदर में रहता है। हमारी चेतना में भी वही गुण छुपा है जो परम चेतना में है। सबकी संभावना (possibility) एक है किंतु सबकी वास्तविकता (actuality) एक नहीं है क्योंकि उस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए जो तपस्या और विवेक चाहिए वह सबके पास समान नहीं है।


बीज कली बन सकती है और कली फूल ; किंतु इसके लिए उपजाऊ मिट्टी,खाद-पानी और माली भी तो चाहिए। शंकर में जो बीज था,वह कली से फूल बन गया और सारे चमन को सुवासित कर गया। शंकराचार्य जयंती


हमें हमारी संभावनाओं की याद दिलाता है। किंतु दर्शन के गड़बड़ होने से हमारी वास्तविकता इतनी खराब हो गई है कि हमें विश्वास ही नहीं होता कि शंकर जैसा कोई व्यक्ति इस धरती पर आया होगा और 'ब्रह्म सत्यं,जगन्मिथ्या' को सबको समझाकर 32 वर्ष की छोटी उम्र में ब्रह्म में लीन हो गया होगा।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹