बौद्धिक बंगाल की आक्रामक राजनीति
April 26, 2026🙏बंगाल की संस्कृति इतनी समृद्ध किंतु राजनीति इतनी आक्रामक देखकर इस बार के चुनाव में अप्रत्याशित मतदान के बारे में सोचना जरूरी है कि यह जागरूकता का परिणाम है या भयाक्रांतता का?-एक विश्लेषण 🔥
संवाद
"बौद्धिक बंगाल की आक्रामक राजनीति"
राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' और राष्ट्रगान 'जन गण मन' दोनों देने वाली बंगाल की धरती पर चुनाव प्रचार के दौरान आज जिन शब्दों का प्रयोग शीर्ष नेतृत्वों द्वारा किया जा रहा है, वह किसी साहित्यिक उत्कर्ष को नहीं बल्कि वैचारिक दरिद्रता को दर्शा रहा है-
'हजारों खिज्र पैदा कर चुकी हैं नस्ल आदम की
ये सब तस्लीम लेकिन आदमी अब तक भटकता है।'
भारतीय पुनर्जागरण की धरती बंगाल जिसने आध्यात्मिक,साहित्यिक,सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में अद्भुत प्रतिभाओं को जन्म दिया हो ; उस धरती पर राजनीतिक-विमर्श यदि एक दूसरे को धमकाने तथा देख लेने के स्तर पर आ जाए तो यह लोकतंत्र की जीत नहीं है। ऐसे में रिकॉर्ड तोड़ मतदान किसी शुभ लक्षण का संकेत है या किसी संघर्ष के बढ़ने का संकेत।
भारतीय नागरिक बहुत दिनों तक राजनीति निरपेक्ष बने रहे।मतदाता घरों से निकलकर बूथ तक पहुंचने का कष्ट उठाना नहीं चाहते थे , किंतु आज आलम यह है कि दूसरे राज्यों से ही नहीं बल्कि दूसरे देशों से भी लोग बंगाल में मतदान के लिए आ गए हैं और लाए भी जा रहे हैं। यह यदि जागरूक मतदाता का ही मसला होता तो शुभ संकेत होता किंतु यह भयाक्रांत मतदाता का भी मसला लगता है।
जागरूकता और भयाक्रांतता ने पूरे बंगाल को सड़कों पर ला दिया है और मतदान का प्रतिशत अप्रत्याशित ढंग से बढ़ा दिया है। जरूरत से अधिक संख्या में सैन्य बलों की मौजूदगी के कारण प्रथम चरण के चुनाव में हिंसा तो उतनी ज्यादा नहीं हुई है लेकिन विचार जितना आक्रामक होते जा रहे हैं, वे बता रहे हैं कि आग दोनों तरफ लगी हुई हैं। इस आग में एक तरफ बंगाल को झुलसाने की शक्ति है तो दूसरी तरफ बंगाल को बदलने की चमक भी। मेरे इस निष्कर्ष के पीछे कुछ महत्वपूर्ण कारण हैं-
पहला कारण यह है कि सांस्कृतिक समृद्धि ने बंगाल को संवेदनशीलता और तर्कशीलता दी हैं तो राजनीतिक पृष्ठभूमि ने संघर्षशीलता और कट्टरता भी दी है। एक विचारशील समाज की चेतना जब प्रबल होती है तो असहमति का स्वर भी ऊंचा होता है।असहमति लोकतंत्रात्मक हो तो शुभ किंतु प्रतिक्रियात्मक हो तो खतरा है।
दूसरा कारण है कि पुनर्जागरण से लेकर बंग विभाजन तक, स्वतंत्रता संग्राम से लेकर नक्सलवादी आंदोलन तक ने यहां के सामूहिक अवचेतन में एक विद्रोह की भावना भर दी है जिसका प्रतिफलन वर्ग-संघर्ष के रूप में देखने को मिलता है। संघर्ष को सहयोग में सम्यक-लोकतंत्र से बदला जा सकता है किंतु असम्यक-लोकतंत्र तो संघर्ष को और बढ़ा देगा।
तीसरा कारण है कि सांस्कृतिक श्रेष्ठता की भावना को जब राजनीति क्षेत्रीय-अस्मिता से जोड़ देती है तो जनमानस का अहंकार जाग उठता है और विरोध करने पर वह अहंकार घायल होने लगता है। यह घायल अहंकार एक चिंगारी की तरह सुलगता रहता है जो सत्ता की शक्ति मिलते ही दावानल बन जाता है-
'जब किसी जाति का अहं चोट खाता है
पावक प्रचंड होकर वह बाहर आता है।'
बंगाल की सांस्कृतिक समृद्धि गर्व करने लायक है किंतु इसकी राजनीतिक आक्रामकता काफी चिंता के लायक है। इसका मतलब है कि यहां का समाज संस्कृति से कम और राजनीति से ज्यादा प्रभावित हुआ। राजनीति जीवन के सारे आयामों के लिए नीति बनाती है और उसे लागू भी करती है ; अतः वह अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकती। राजनीति यदि सेवा का माध्यम होती है तो समाज की सांस्कृतिक रुचियों का परिष्कार होता है किंतु यदि राजनीति सत्ता प्राप्ति का साधन बन जाती है तो विकृतियों का आविष्कार होता है।
दुर्भाग्य की बात है कि अब राजनीति का ध्यान भारत का नागरिक तैयार करने पर कम और अपना मतदाता बनाने पर ज्यादा हो गया है। देखना यह है कि बंगाल की जनता का भारी मतदान इसकी सांस्कृतिक समृद्धि से ज्यादा प्रभावित है या राजनीतिक प्रवृत्ति से।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹