🙏राजस्थान के सरकारी स्कूलों में पासबुक पर लगी रोक हटी। अब विद्यार्थी और शिक्षक 9 साल पुरानी पाबंदी से मुक्त होकर हाईकोर्ट के फैसले के अनुसार स्कूलों में पासबुक का उपयोग कर सकेंगे-एक शैक्षिक विश्लेषण 🙏


संवाद


'पासबुक बनाम मूल पाठ्यपुस्तक'


समय की मांग को देखते हुए कोई एक विशेष आदेश लाया जाता है जिसका उद्देश्य पनप रही किसी चुनौती से निपटने का होता है। 2018 में राजस्थान माध्यमिक शिक्षा परिषद और माध्यमिक शिक्षा निदेशक ने संयुक्त आदेश जारी कर कहा था कि पासबुक से रटंत प्रणाली को बढ़ावा मिलता है और मूल पाठ्य पुस्तकें दूर हो जाती हैं। अत:विद्यार्थी और शिक्षक के पास स्कूलों में पासबुक पाए जाने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी।


             इस आदेश को फरवरी 2026 के फैसले में जयपुर हाईकोर्ट बेंच ने रोक लगा दी और सरकार ने भी आगे अपील न करने का फैसला लिया। अर्थात् सरकारी स्कूलों में पासबुक का अब उपयोग किया जा सकेगा।


इस संदर्भ में कुछ विचारणीय प्रश्न शिक्षा जगत में उठ रहे हैं। उन प्रश्नों को स्पष्ट रूप से उठाना भी चाहिए और उस पर शिक्षा जगत को विचार भी करना चाहिए। आदेश तो सरल होता है किंतु आदेश लाने की और हटाने की पृष्ठभूमि जटिल होती है। उस जटिलता को समझना ही शिक्षा की सार्थकता है।


            प्राकृतिक दृष्टिकोण से संपन्न किंतु शैक्षिक दृष्टिकोण से राजस्थान का सबसे पिछड़ा जिला माना जाने वाला बांसवाड़ा 'लास्ट मिनट पासबुक' की गिरफ्त में है। 30 वर्षों से उच्च शिक्षा विभाग में विद्यार्थियों के साथ क्लास के माध्यम से और घर पर संवाद के माध्यम से निरंतर गहरे संपर्क में होने के कारण मैं पासबुक के बढ़ते प्रचलन को बहुत नजदीक से देख पाया। मेरे कई विद्यार्थी स्कूलों में प्रिंसिपल के रूप में और शिक्षक के रूप में कार्य कर रहे हैं जिनका अनुभव लगातार मुझे मिलता रहता है। अपने निजी अनुभव और परिवेश के अनुभव के आधार पर पासबुक और मूल पाठ्य पुस्तक के बीच चल रहे चुनाव के संघर्ष को मैं एक भिन्न दृष्टिकोण से देखता हूं। पासबुक को मैं अस्पृश्य नहीं मानता हूं और मूल पाठ्य पुस्तक को संपूर्ण नहीं मानता हूं।


              दर्शनशास्त्र की एक प्रोफेसर का उनके स्कूल का अनुभव इस संबंध में विचारणीय लगा। स्कूल में वे पढ़ने में अच्छी थीं। मूल पाठ्य पुस्तकों से पढ़ती थीं,फिर भी दो तीन प्रकार की कुंजी भी रखती थीं। उनकी प्रिंसिपल ने उनके पास कुंजी को देखकर काफी डांट लगाई और समझाया कि तुम्हारी जैसी तेज विद्यार्थी भी यदि कुंजी से पढ़ेंगे तो सामान्य विद्यार्थियों का क्या होगा? प्रिंसिपल की डांट सुनकर वे विचार करने लगीं कि यदि मूल पाठ्य पुस्तक को पढ़ने के बाद जो चीजें गहराई से समझ में नहीं आतीं, उन चीजों को अच्छी प्रकार से समझने में और परीक्षा में अच्छा नंबर लाने में यदि कुंजी मददगार है तो उसका उपयोग करने में क्या हर्ज है?


            उस समय ट्यूशन पर पढ़ने जाना और कुंजी से पढ़ना; कमजोर विद्यार्थी का लक्षण माना जाता था और इसे छुपाया जाता था। इसका मूल कारण था कि शिक्षक अपनी क्लास में पूरा पाठ्यक्रम अच्छी प्रकार से समझाते थे और मूल पाठ्य पुस्तक पढ़कर नोट्स बना कर लाने के लिए विद्यार्थी को कहते थे तथा उसकी जांच कर अच्छाईयां और कमियां बताते थे। उस समय स्कूल में पढ़ने-पढ़ाने के अलावा अन्य गतिविधियां आटे में नमक के बराबर थीं।


            आज शैक्षिकेत्तर गतिविधियां आटे के बराबर हो गई हैं और क्लास नमक के बराबर हो गया है। डमी स्कूलों का प्रचलन और कोचिंग क्लास की क्रेज के साथ मूल पाठ्य पुस्तक को पासबुक ने चलन के बाहर कर दिया है। बांसवाड़ा जैसे जिले में तो स्थिति यह हो गई है कि दुकान पर पासबुक के अलावा मूल पाठ्य पुस्तक मिलना मुश्किल हो गया है। विद्यार्थियों के पास ही नहीं बल्कि अधिकतर शिक्षकों के पास भी पासबुक ही मिलने लगा है,मूल पाठ्य पुस्तक नहीं। ऐसी स्थिति में पासबुक कल्चर की ओर बढ़ती हुई शिक्षा पर पुनर्विचार होना ही चाहिए।


                  इस संबंध में मेरा निजी अनुभव बहुत ही रोचक रहा। मूल पाठ्य पुस्तक को लेकर मैं क्लास में पढ़ाने जाता और सभी विद्यार्थियों को मूल पाठ्य पुस्तक खरीदने को कहता। किंतु एक दो विद्यार्थी के अलावा सभी के पास पासबुक रहती। अंत में मुझे मजबूर होकर स्वयं पासबुक खरीदना पड़ गया ताकि विद्यार्थी को किताब दिखाकर पढ़ाने और समझाने में थोड़ी सफलता मिले। लेकिन पासबुक में पाई जाने वाली अशुद्धियों को देखकर मैं हतप्रभ रह गया। गलत छपने वाले पासबुक में भी विद्यार्थी 'लास्ट मिनट पासबुक' पर आ गए। इसका परिणाम यह हुआ कि विद्यार्थियों की ऐसी स्तरहीन पीढ़ी सामने आ रही हैं जो एक आवेदनपत्र में भी कल्पना से ज्यादा अशुद्धियां लिख रही हैं। अधिकांश विद्यार्थियों को पाठ को शुद्ध पढ़ना तक नहीं आ रहा, किसी भी विषय को समझना और उस पर अपने विचार को अभिव्यक्त करना तो बहुत दूर की बात


है।


        नई शिक्षा नीति आने के बाद तो कहां भारतीय ज्ञान परंपरा की गहराई और ऊंचाई छूने का लक्ष्य था और कहां हम गर्त में गिरते जा रहे हैं? शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिए नित नए सरकारी आदेशों की संख्या बढ़ाई जा रही हैं,कई प्रकार की सुविधाएं और योजनाएं लाई जा रही हैं लेकिन सरकारी शिक्षा की गुणवत्ता गिरती जा रही है।


             आखिर वृक्ष तो अपने फल से ही पहचाना जाता है। सरकारी शिक्षा रूपी वृक्ष पर जो कमजोर विद्यार्थी रूपी फल लग रहे हैं और निजी शिक्षण संस्थानों की तरफ हर कोई रुख कर रहा है ; ऐसे में सरकारी शिक्षा की गिरती  साख के मूल में पासबुक और मूल पाठ्य पुस्तक का द्वंद्व भी एक आवश्यक कारण रहा है किंतु पर्याप्त नहीं।


            वस्तुत: क्लास की संस्कृति और स्वाध्याय की प्रवृत्ति जैसे-जैसे घटने लगी, वैसे-वैसे मूल पाठ्य पुस्तकों से दूरी बढ़ती गई और पासबुक का चलन बढ़ता गया। पासबुक लिखने वाले भी शिक्षा क्षेत्र के लोग होते हैं और उनका दृष्टिकोण व्यावसायिक होता है। जब मौलिक पुस्तकों में रुचि जगाने के लिए शिक्षक क्लास में पर्याप्त समय नहीं दे पाते और विद्यार्थी घर पर स्वाध्याय नहीं कर पाते तो पासबुक सहारा बनता है।


               किंतु ध्यान देने की बात यह है कि मूल पुस्तकें विषय के मूल स्रोत होती हैं जिनमें विचारों की पूर्णता, संदर्भ और विस्तार मिलता है। साथ ही उनमें भाषा का शुद्ध और समृद्ध रूप होता है जिससे विद्यार्थियों की अभिव्यक्ति क्षमता बढ़ती है। पासबुक तो परीक्षा को पास करने के मकसद से तैयार किया जाता है जिससे ज्ञान की गहराई नहीं आती। यदि ज्ञान की गहराई नहीं हो तो जीवन की समस्याओं के समाधान में शिक्षा सार्थक नहीं हो पाती। यदि आप ज्ञान के लिए पढ़ना चाह रहे हैं तो मूल पुस्तक आपको श्रवण,मनन,निदिध्यासन के माध्यम से पूर्णबोध के करीब लाता है-


'श्रवणम् तु गुरो: कार्यम्, मननम् तदनंतरम्


निदिध्यासनमित्येद् पूर्णबोधस्य कारणम् ।'


         आईएएस जैसी बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में जहां प्रश्न नए-नए ढंग से पूछे जाते हैं, वहां पर विषय पर गहरी पकड़ बनाने के लिए मूल पुस्तकों के साथ संदर्भ पुस्तकों से भी जुड़ना आवश्यक होता है।


            कोचिंग प्रणाली से जो विद्यार्थी आईआईटी जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में टॉप भी कर रहे हैं,उनकी भी विषय की समझ गहरी और व्यापक नहीं पाई जा रही है। आईआईटी के प्रोफेसरों ने अपने लेखों में उल्लेख किया हैं कि परीक्षा में सिर्फ ज्यादा से ज्यादा नंबर लाने के लिए बहुविकल्पात्मक प्रश्न पद्धति से पढ़ाई कराए जाने पर विषय की समझ गहरी नहीं होती। इससे आगे जाकर शोध की गुणवत्ता प्रभावित होती है।


               हाईकोर्ट का निर्णय कानूनी दृष्टिकोण से सही है कि पासबुक को प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता किंतु शैक्षिक दृष्टिकोण से सोचने पर मौलिक पुस्तकों की संस्कृति और स्वाध्याय की प्रवृत्ति के द्वारा ही भारत ने ज्ञान की ऊंचाई और गहराई को कभी जाना था। उस समय शिक्षा व्यवसाय का विषय नहीं थी बल्कि अध्यवसाय का विषय थी, मुनाफा कमाने के लिए शिक्षा नहीं होती थी बल्कि जीवन निर्माण के लिए होती थी-


'तिजारत कीजिए यदि चाह हो तुमको मुनाफे की


मोहब्बत के जुनूं में कुछ नफा टोटा नहीं होता


परीक्षा जिंदगी की पास करना है बहुत मुश्किल


कि इसमें एक भी उत्तर रट्टा-घोटा नहीं होता।'


पासबुक से कम से कम मेहनत कर परीक्षा पास करने में तो अवश्य मदद मिलती है किंतु मौलिक पुस्तकों को पढ़कर व स्वयं से समझने का प्रयास कर जो विद्यार्थी अपना नोट्स बनाता है, उनकी ज्ञान की गहराई, चिंतन की क्षमता, समस्याओं के समाधान की सामर्थ्य और रचनात्मकता अद्भुत होती है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹