/start


🙏टैगोर जयंती की शुभकामना🙏


भयग्रस्त दुनिया में टैगोर की भयशून्य चित् की प्रार्थना पूरी करने की चुनौती का विश्लेषण....


संवाद


'जहां चित् भय शून्य हो'


'चित्तो जेठा भयशुन्यो' यह कामना आत्मा के जन्म का मंत्र है जो टैगोर की गीतांजलि में अभिव्यक्त हुई। भयभीत चित् वाला व्यक्ति अपनी अंतरात्मा की आवाज सुन नहीं पाता। भारतीय पुनर्जागरण की धरती बंगाल से चुनाव परिणाम के बाद फिर से इस मंत्र का उद्घोष हो रहा है। भय ने आज चित् को चारों ओर से जकड़ लिया है।बेरोजगारी,असुरक्षा,अकेलेपन इत्यादि के भय ने अवसाद और आत्महत्या की घटना इतनी ज्यादा बढ़ा दी है कि भयशून्य चित् की मांग हर मन कर रहा है।


          टैगोर ने जब यह कविता लिखी थी उस समय भी वातावरण में चारों ओर भय व्याप्त था क्योंकि ब्रिटिश राज की गुलामी में भारत था। जब भारत स्वतंत्र हुआ तो बहुत बड़ी आशा जगी कि कम से कम बंगाल की धरती पर टैगोर का यह सपना साकार हो जाएगा। लेकिन अभी तक के शासनकाल में चित् भयाक्रांत होता गया और राजनीति हिंसक होती गई।


            इसने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक दृष्टिकोण से समृद्ध बंगाल में चित् इतना भयाक्रांत कैसे हो गया और राजनीति इतनी हिंसक कैसे हो गई?


             भारतीय संस्कृति मूल रूप से आध्यात्मिक है। इसकी मान्यता है कि चैतन्य और पदार्थ में जगत नहीं बंटा हुआ है। मूल तत्व दो नहीं है बल्कि अद्वैत है। चेतना की सुषुप्तावस्था पदार्थ है। दक्षिणेश्वर मंदिर की काली जी की मूर्ति रामकृष्ण परमहंस के लिए  ममतामयी मां थी-


'सैकड़ों पाषाण में से तू भी एक पाषाण होता


मैं न होती भावना फिर तू कहां भगवान होता।'


          नरेंद्र नाथ दत्त जैसे संदेहग्रस्त युवा को भी जब उन्होंने मां का दर्शन करा दिया तो नरेंद्र का सारा संदेह गिर गया। विश्वविद्यालय का सबसे तार्किक व्यक्तित्व नरेंद्र औपचारिक शिक्षा से वंचित रामकृष्ण के चरणों में श्रद्धा से झुक गया। रामकृष्ण ने अनेक पंथों की साधना से उसी परम चेतना का दर्शन कर लिया। ऐसे गुरु के आशीर्वाद से विवेकानंद का जन्म हुआ जिन्होंने विश्व धर्म सम्मेलन में 'शिव महिम्न स्तोत्र' के श्लोक द्वारा उस सत्य को अभिव्यक्त किया-


'रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिल नानापथजुषां


नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥ ७॥'


अर्थात् "लोगों की रुचियों की भिन्नता के कारण, सीधे या टेढ़े (विभिन्न) रास्तों को अपनाने वाले सभी मनुष्यों का एकमात्र लक्ष्य (गंतव्य) आप ही हैं, जैसे विभिन्न नदियों का जल अंत में समुद्र में ही मिल जाता है"।


        जब सारे जगत में वही चेतना अलग-अलग रूपों में अभिव्यक्त हुई है और सभी चेतना का अंतिम लक्ष्य वही एक ही परम चेतना है तब हम सब दो या भिन्न-भिन्न कहां हुए? अद्वैत ही परम सत्य है।


          किंतु हिंदू,मुस्लिम,सिख,ईसाई घर में जन्मा हुआ चित् अपने आप को हिंदू,मुस्लिम,सिख,ईसाई मान लेता है। एक दूसरे से भिन्न मानने के कारण एक दूसरे से भयभीत होने लगता है। चित् में भय का जन्म अपने मूल स्वरूप को भूल जाने और राजनीतिक प्रवृत्ति द्वारा दिए गए लेबल से चिपक जाने पर होता है। राजनीति चित् को धर्म,जाति, भाषा,क्षेत्र इत्यादि अनेक आधार पर बांट देती है और एक दूसरे के प्रति भय को उत्पन्न कर देती है।


       भयग्रस्त चित् अनिवार्यरूपेण हिंसक हो जाता है। इसलिए धर्म की राजनीति करने वाले हमेशा अपने संप्रदाय को खतरे में बताने लगते हैं। दूसरे का भय दिखा कर लोगों को अपने पक्ष में करते हैं और चित् को हिंसक बनाकर अपनी राजनीति साधते हैं। जबकि परम सत्य का दर्शन करने वाले सभी आध्यात्मिक व्यक्तित्व एक ही बात कहते हैं-


'सब में तेरा रूप समाया ,कौन है अपना कौन पराया'


इसलिए सच्चा धार्मिक व्यक्ति वही है जो 'आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्' के रास्ते पर चलता है।    


              चित् का निर्माण शिक्षा के द्वारा होता है। टैगोर ने 1921 में शांतिनिकेतन के विश्व भारती विश्वविद्यालय की स्थापना कर आदर्श वाक्य के रूप में 'यत्र विश्वम्भवत्येकनीडम्' का चुनाव किया जिसका अर्थ है जहां सारा संसार एक घोंसला बन जाए।


                राज्य का काम एक ऐसी शिक्षा-व्यवस्था का निर्माण करना है जहां व्यक्ति अपने चैतन्य स्वरूप को पहचान सके जिससे भयशून्य चित् का निर्माण हो सके। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भारतीय ज्ञान परंपरा के द्वारा उसी विद्या को प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है जो मुक्ति प्रदान करती थी। टैगोर की मनोकामना की पूर्ति हमारी शिक्षा व्यवस्था की सफलता पर निर्भर है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹