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🙏सोमनाथ स्वाभिमान पर्व🙏


मंदिर सनातन संस्कृति का हृदय-स्थान है और सोमनाथ मंदिर उसके प्रति अटूट आस्था का अमरगान है-एक भावपूर्ण विश्लेषण.....


संवाद


"मंदिर:आध्यात्मिक-शिक्षा के केंद्र"


भारतीय संस्कृति में मंदिर आस्था के केंद्र होने के साथ मानव निर्माण के विश्वविद्यालय भी रहे हैं। आज भी मंदिर में प्रवेश के पूर्व आंतरिक और बाह्य शुद्धि का जो ध्यान रखा जाता है, वही भाव यदि आधुनिक शिक्षा केंद्रों में प्रवेश के पूर्व हो तो बहुत बड़ी क्रांति हो सकती है।


              सोमनाथ मंदिर को अनेकों बार तोड़ा गया किंतु मंदिर के प्रति आस्था ने बार-बार उसका पुनर्निर्माण किया। यह बताता है कि इस नश्वर जीवन में एक अनश्वर तत्व है जिसका केंद्र मंदिर रहा है। भारतीय संस्कृति में वह संस्कार इतनी गहरी जड़ जमाए हुए हैं कि हर सनातनी के घर में भी एक मंदिर का स्थान अवश्य नियत किया जाता है।


                हमारे घर में सुबह में उठने से लेकर रात में सोने तक घर के छोटे मंदिर में कोई न कोई पूजा में संलग्न रहता था। वही मेरे पढ़ने का भी स्थान था। लोगों की पूजा के कारण पढ़ने में बाधा जरूर आती थी किंतु शुद्धता के भाव के कारण वहां पढ़ने में जो शक्ति मिलती थी वह अद्भुत थी।


                किशोरावस्था में रामकृष्ण मिशन आश्रम में जाता था,जहां शाम को वहां के मंदिर में काली मां की आरती में शामिल होता था। ऐसा लगता था कि पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से लबरेज हो गया हो। तब मन में ख्याल आता था कि दक्षिणेश्वर मंदिर के पुजारी रामकृष्ण परमहंस ने किस भावना से पाषाण की प्रतिमा को साक्षात् मां काली के रूप में प्रकट होने को बाध्य कर दिया होगा-


'अगुण अरूप अलख अज जोई


भगत प्रेम बस सगुन सो होई‌।'


            जब भी रामकृष्ण जैसी भक्ति होती है तब मंदिर की शक्ति प्रकट होने लगती है। संदेहप्रधान पाश्चात्य शिक्षा के कारण तार्किक और वैज्ञानिक प्रतिभा से युक्त नरेंद्र नाथ दत्त को एक मंदिर के औपचारिक शिक्षा से वंचित पुजारी ने आस्थावान और आध्यात्मिक विवेकानंद बना दिया। क्या आपने भगवान को देखा है, नरेंद्र नाथ के इस प्रश्न का उत्तर रामकृष्ण ने यह कहकर दिया कि मैंने स्वयं भगवान को देखा है और तुम्हें भी दिखा सकता हूं। वस्तुत: इस दुनिया से भगवान गायब नहीं हुए हैं बल्कि भगवान के दर्शन को प्यासी आंखें और भगवान को बुलाने वाली भावना गायब हो गई हैं।


                   मेरी नजर में आज की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि प्यास और भावना की कमी के कारण आध्यात्मिक आस्था के केंद्र मंदिर अंधविश्वास के केंद्र होते जा रहे हैं और वैज्ञानिक चेतना निर्माण के लिए बनाए गए शिक्षा केंद्र सिर्फ डिग्री बांटने वाले केंद्र बनते जा रहे हैं। जबकि तंजावुर और कांचीपुरम के मंदिर जैसे अनेकों मंदिर भगवद्भक्ति के साथ विद्या की शक्ति के भी केंद्र होते थे। वे विश्वविद्यालयों के समान कार्य करते थे। एक तरफ दार्शनिक,वैज्ञानिक, साहित्यिक कृतियों का प्रणयन वहां होता था तो दूसरी तरफ नृत्य,संगीत, चित्रकला और मूर्तिकला का विकास भी वहां होता था।


              मंदिर का वातावरण दीप प्रज्वलन,घंटनाद, मंत्रोच्चार, आध्यात्मिक चर्चा और ध्यान से ऐसा आपूरित होता था कि आया हुआ दर्शनार्थी भी वहां से अलौकिक दर्शन लेकर वापस जाता था। 'मैं' से "हम" की भावना को विकसित करने में मंदिरों में होने वाले सामूहिक भजन और भोजन ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है।


आज मंदिर की खबरों के नाम पर सिर्फ उनकी बाहरी भव्यता और चढ़ावे की खबर आती है जबकि असली बात तो वहां प्राप्त होने वाली आंतरिक दिव्यता और शांति-सुकून है। मंदिरों के प्रति जनमानस फिर से आकर्षित हो इसके लिए रामकृष्ण की आध्यात्मिक चेतना और नरेंद्र नाथ दत्त की वैज्ञानिक चेतना के पुनर्मिलन का केंद्र फिर से मंदिरों को बनाना होगा। हृदय के शब्दों में मेरी कामना यही है कि....


'जीवन का फूल यूं खिलता रहे कि धर्म भी हो विज्ञान भी हो


मंदिर की डगर भी आगे बढ़े और दुनिया का कुछ ज्ञान भी हो।'


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹