🙏पेपर लीक के कारण सिर्फ नीट परीक्षा रद्द होने का यह मामला नहीं है बल्कि नैतिकता के लीक होने के कारण व्यवस्था के रद्द होने का यह मामला है-एक शैक्षिक विश्लेषण 😭


संवाद


'प्रतिभा और परिश्रम पर पैसा भारी'


नीट पेपर लीक के कारण परीक्षा रद्द होने की खबर सुनकर मन अत्यंत खिन्न हो गया है। लगभग 23 लाख परीक्षार्थियों को फिर से परीक्षा के मानसिक तनाव से गुजरना होगा। किशोरावस्था में भावनाओं का वेग इतना प्रबल होता है कि छोटी सी बातों पर वे कुछ भी करने को उतारू हो जाते हैं। बरसों की मेहनत के बाद अग्नि परीक्षा से गुजर कर जिस सुकून को वे महसूस कर रहे थे, उसको व्यवस्था ने क्षण भर में छीन लिया। फिर से उन्हें इस अव्यवस्था के आलम में अपनी पढ़ाई पर एकाग्रचित होना होगा और कड़ी जांच के नाम पर एक प्रकार के विशेष टॉर्चर से गुजरकर परीक्षा में बैठना होगा। गरीब अभिभावकों को अपनी गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा बच्चों को परीक्षा केंद्र तक पहुंचाने में खर्च करना होगा।


बड़े आकर उपदेश दे रहे हैं कि किशोर धैर्य धारण करें, उनकी फिर से परीक्षा ली जाएगी। लेकिन कोई नहीं कह रहा है कि बड़े ईमानदारी बरतें क्योंकि उनको ऊपर जाकर सारा हिसाब-किताब देना होगा-


'यह हश्र है हर बशर का नेकी बदी का ऐ दिल शुमार होगा


वहां न कोई अजीज होगा किसी का न कोई यार होगा।'


                 आपके हर कर्मों का ऊपर कोई हिसाब रखने वाला है, धर्म की इस अवधारणा का बुद्धिवादियों ने विज्ञान के द्वारा खंडन कर दिया। हमें यह बताया गया कि कहीं भी स्वर्ग और नरक नहीं है। स्वर्ग के लोभ और नरक के भय से जनमानस में एक नैतिकता बनी रहती थी। आधुनिक खोजों ने नैतिकता के उस आधार को तो ध्वस्त कर दिया लेकिन नैतिकता का दूसरा आधार नहीं खोजा गया। तब बुद्धि ने हर अवसर का लाभ उठाने के लिए सारी सीमाएं तोड़ दी।


            आज की व्यवस्था का सच क्या है? 'पैसा खुदा तो नहीं,लेकिन खुदा की कसम खुदा से कम भी नहीं' मानने वाले लोग पैसे के बल पर चुनाव जीतते हैं,पैसे के बल पर पद प्राप्त करते हैं और पैसे के बल पर किसी भी अपराध करने के बाद बच निकलते हैं। मैं नहीं मानता कि इसमें शतप्रतिशत सच्चाई है किंतु समाज के सामूहिक मन में यह बात बैठ जाना बहुत ही खतरनाक है। जब गंगोत्री गंदी हो जाएगी तो वहां से निकलने वाली गंगा की कितनी भी सफाई की जाए,वह साफ नहीं हो सकती।


               मैंने भी जीवन में लगभग 50 परीक्षाएं दी हैं तब जाकर नौकरी लगी है। अल्प आय वाले साधारण घर से आए हुए हमारे सारे साथी मेहनत करते जाते थे और उनको व्यवस्था पर विश्वास था कि एक न एक दिन मेहनत का फल मिलेगा। इस जगत की व्यवस्था में कभी कुछ कमी भी दिखाई देती थी तो ऊपर वाले की व्यवस्था पर एक भरोसा था कि वह मेहनत का फल अवश्य देगा। इसलिए बार-बार परीक्षा देने और उसमें असफल होने पर भी आशा की एक लौ जलती रहती थी।


             आज की व्यवस्था ने उस आशा को पूर्णतया निराशा में तब्दील कर दिया है। जब मेहनत हारती हुई दिखाई दे रही है और जुगाड़ जीतता हुआ दिखाई दे रहा है तो अवसाद के अलावा और क्या रास्ता बचता है? परीक्षा कराने के लिए सड़कों पर आने पर युवाओं पर लाठियां बरसाई जाती हैं और पेपर लीक कराने वालों के विरुद्ध कुछ नहीं हो पाता।


            सबसे बड़ा प्रश्न इस समय यही है कि इस प्रकार की व्यवस्था के लिए दोषी कौन हैं? पेपर लीक कराने वाले को मालूम है कि लाखों रुपए देकर पेपर खरीदने वाले अभिभावक बैठे हुए हैं और जुगाड़ में विश्वास करने वाले बच्चे को यह मालूम है कि हम मेहनत करें या न करें पैसे के बल पर हमारे लिए हमारे मां-बाप कुछ भी खरीद लेंगे। इस गलत काम में पकड़े भी गए तो पैसे के बल पर छूट जाएंगे।हमारा सामाजिक और राष्ट्रीय चरित्र यहां तक पहुंचा है।


          एक तरफ पैसे के बल पर कुछ लोग कुछ भी प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं और  दूसरी तरफ अपनी जमीन जायदाद बेचकर अपनी प्रतिभा और मेहनत पर भरोसा करने वाले ठगे के ठगे रह जाते हैं। ऐसे में प्रतिभा और परिश्रम को प्रेरणा देने वाली व्यवस्था कैसे विकसित की जाए,यह सबसे बड़ा प्रश्न है।


             मेरी राय में नैतिकता का एक नया आधार ढूंढना होगा जो कि स्वर्ग के लोभ और नरक के भय पर आधारित नहीं होगी बल्कि आध्यात्मिकता और वैज्ञानिकता पर आधारित होगी। इस जगत में एक व्यवस्था दिखाई देती है जिसको हम नहीं संभाल रहे हैं बल्कि अस्तित्व संभाल रहा है, इसको वेदों में 'ऋत' कहा गया है जिसे हम आज आध्यात्मिकता कह सकते हैं। इसी प्रकार से वैज्ञानिकता का भी दर्शन होता है कि बिना पूजा पाठ किए हुए अपनी नदियों को साफ करके कई देशों के लोग अपनी स्वच्छता से वातावरण को अनुकूल बना रहे हैं।


               यही आध्यात्मिकता और वैज्ञानिकता जब सम्यक्-शिक्षा के द्वारा जनमानस के दिलोदिमाग में बिठाई जाएगी तब हम पेपर लीक वाली व्यवस्था को बदल पाएंगे। आज तो शिक्षा का व्यवसायीकरण हमने कर दिया है जिसका परिणाम है कि एक तरफ प्रतिभा और परिश्रम आंसू बहा रहे हैं और दूसरी तरफ पैसा और जुगाड़ से 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' बनकर लोगों का इलाज कर रहे हैं।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹