संकट का शैक्षिक समाधान
May 16, 2026/start
🙏एक गंभीर संकट काल जिसमें एक तरफ प्रतिभाएं पेपर लीक से परेशान , दूसरी तरफ मुफ्त सौगातों का मुक्तदान और तीसरी तरफ युद्ध के कारण महंगा हर सामान-एक शैक्षिक दृष्टि🔥
संवाद
'संकट का शैक्षिक समाधान'
व्यक्तिगत जीवन हो या जागतिक जीवन हो;कभी न कभी संकट का कोई काल आता है। चारों तरफ अंधेरा दिखाई देता है।क्या करें, क्या न करें का पता ही नहीं चलता। मन उधेड़बुन में पड़ जाता है, कोई निर्णय नहीं हो पाता। ऐसे ही एक संकट से हम सभी गुजर रहे हैं। इसके समाधान के लिए एक तरफ कहा जा रहा है कि घर से बाहर न निकलें ताकि बचत हो, जबकि दूसरी तरफ कहा जा रहा है कि सड़कों पर निकलें ताकि जन-आंदोलन हो।
एक तरफ बेचैन मन के लिए घर के अंदर रहने की अनुकूल परिस्थितियां नहीं हैं तो दूसरी तरफ घर के बाहर वृक्षविहीन धरती और तपते सूरज के कारण सड़क पर निकलने की मन:स्थिति नहीं है-
'जिस तरफ भी गई दृष्टियां दृश्य वे ही पुराने मिले
जिंदगी की कड़ी धूप में कांच के शामियाने मिले।'
अंदर रहने के लिए ध्यान का मार्ग चाहिए और बाहर निकलकर निर्णय करने के लिए ज्ञान का मार्ग चाहिए। अंदर हो या बाहर दोनों जगह रहने की कला शिक्षा बताती है किंतु दुर्भाग्य से शिक्षा पर हमारे देश ने सबसे कम ध्यान दिया है। इसका परिणाम यह हुआ कि अपने हाथों पर भरोसा करने वाली जनता मुफ्त की सौगातों पर भरोसा करने लगी हैं। स्वदेशी की भावना पर विदेशी संभावना हावी है। ऐसे में युद्ध ने संकट को कई गुना और ज्यादा बढ़ा दिया।
फलस्वरुप एक ऐसा संकट उपस्थित हुआ है जिसका समाधान आसानी से मिलता हुआ नहीं दिखता।किंतु मेरी सारी आशा का केंद्र शिक्षा और शिक्षक हैं-
'राजपथ पर जब कभी जयघोष होता है
आदमी फुटपाथ पर बेहोश होता है
भीड़ भटके रास्तों पर दौड़ती है
जब सफर का रहनुमा खामोश होता है।'
इस देश के स्वाभिमान, स्वदेशी भाव और शिक्षा को लौटाना होगा।
1.मुफ्त की सौगातें बंद हों :-शिक्षाविदों की नजर में मुफ्त की सौगातें देकर लोगों को भिखारी बना दिया गया। रेवड़ियां लेने के लिए उन्हें लाइनों में खड़ा कर उनके स्वाभिमान को धाराशायी कर दिया गया। उनके पुरुषार्थ को जगाना था,उन्हें काम में लगाना था और उनके परिश्रम से गिरी हुई बूंदों की कीमत बताना था। महात्मा बुद्ध ने देश में भिक्खु पैदा किए थे, भिखारी नहीं।भिक्खु पहले अपने अर्जित ध्यान-ज्ञान को समाज में बांटते थे और उसके बदले समाज से भिक्षा ग्रहण करते थे। कुछ देकर लेने का भाव परस्पर स्वाभिमान और समादर का संबंध निर्मित करता है।
2.स्वदेशी आंतरिक भाव हो,मात्र एक बाह्य विचार नहीं :-स्वदेशी आंदोलन ने ब्रिटिश काल में भी अपने देश और देश में बनी हुई चीजों के प्रति एक अपनत्व का भाव जगाया था किंतु आज प्रतिदिन लगभग500 भारतीय विदेशी नागरिकता ग्रहण कर लेते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि हमारी प्रतिभा के साथ विदेश में ज्यादा न्याय हो पाएगा। 2022 के बाद से हर साल 2 लाख से अधिक लोगों ने भारतीय पासपोर्ट त्यागे हैं।ऐसे में स्वदेश और स्वदेशी वस्तुओं के प्रति प्रेम को जागृत करने के लिए कुछ विशेष करना होगा। स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं की तरह अपने सुखों का बलिदान करके देश के लिए त्याग,सेवा,समर्पण आज के नेताओं को दिखाना होगा। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने तो अपनी मातृभूमि की सेवा के लिए सर्वाधिक प्रतिष्ठित भारतीय सिविल सेवा को छोड़ दिया था और त्यागपूर्ण साहसिक जीवन जीते हुए संघर्ष का रास्ता अपनाया था।
3.मानव निर्माण वाली शिक्षा की शुरुआत हो :-शिक्षा का हमारे देश में इतना व्यापक प्रचार-प्रसार था कि मैकाले की शिक्षा पद्धति लागू होने के पूर्व दूरदराज के गांव में भी जगह-जगह गुरुकुल थे जिनमें सभी वर्गों के शिक्षकों द्वारा सभी वर्गों के विद्यार्थियों के लिए कई विषयों की शिक्षा का प्रबंध था। अंग्रेज अधिकारियों के दस्तावेज इस बात की पुष्टि करते हैं और विश्व अर्थव्यवस्था में भारत का अद्भूत योगदान इस बात की गवाही देता है कि शिक्षा की माकूल व्यवस्था के कारण अर्थव्यवस्था भी ऊंचाईयों पर थी।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के द्वारा भारतीय ज्ञान परंपरा की ओर बढ़ने की घोषणा तो की गई लेकिन महज खानापूर्ति से भारतीय ज्ञान परंपरा की गहराईयों और ऊंचाईयों का एक अंश भी नहीं लिया जा सकता। भारतीय संस्कृति की गुरुकुल पद्धति में जहां पढ़ने और पढ़ाने पर शिष्य और गुरु का अहर्निश ध्यान होता था, वहां पर आज पढ़नेवाले और पढ़ानेवाले के बीच की दूरी इतनी ज्यादा बढ़ गई कि शिक्षा केंद्रों की क्लासेज सूनी हो गईं। गुरुकुल पद्धति का आग्रह हमारा प्राचीन ज्ञान के प्रति विशेष प्रेम के कारण सिर्फ नहीं है, बल्कि उस प्रतिबद्धता के कारण भी है जिसमें शिष्य गुरु का प्रगाढ़ संबंध ज्ञान की गहराइयों और ऊंचाइयों की खोज में दिन-रात लगा रहता था।
गुरुकुल पद्धति से दूर होने और क्लासेज सूनी होने का परिणाम यह हुआ कि आज शिक्षक सबसे दीनहीन हो गया और समाज पतित हो गया। भारतीय संस्कृति की शिक्षा पद्धति का ध्यान इंसान निर्माण पर था, सामान संग्रहण पर नहीं; त्याग पर था,भोग पर नहीं; आत्मा जगाने पर था,पद बढ़ाने पर नहीं। शिक्षा के व्यवसायीकारण के कारण शिक्षा पैसों की दासी बन गई, प्रतिभा निर्माण की स्वामिनी नहीं। जो जमीन-जायदाद बेचकर किसी कोचिंग से नीट परीक्षा पास कर भी लेता है और करोड़ों की फीस देकर डॉक्टर बन भी जाता है तो वह कैसा डॉक्टर होगा? पेट दर्द से तड़पते रोगी को देखकर भी उसका ध्यान उसकी किडनी पर होगा उसके दर्द पर नहीं।
संस्कृत शिक्षालयों में गुरुकुल पद्धति से पढ़कर आए हुए हमारे सीनियर्स थे जो गांव से आकर पटना जैसे शहर में अपने संस्कार के कारण कम से कम पैसों में इतनी ऊंची प्रतिभा बनाई कि भारत की बड़ी प्रतियोगिता परीक्षाओं में उन्होंने अपनी सफलता के झंडे गाड़ दिए। उनकी सत्संगति से मुझे विषय का ज्ञान ही नहीं मिला बल्कि जीवन की कला भी मिली। व्रत-उपवास करके वे पैसा बचाते थे और उस पैसे से मौलिक-पुस्तकें तथा नई पत्र-पत्रिकाएं खरीदकर अपना ज्ञान बढ़ाते थे। अपने घर के दिए गए संस्कार और अपने सीनियर्स के दिए गए शिक्षा-सरोकार के कारण अपनी प्राप्त शिक्षा से मैंने पैसा नहीं,प्रतिभा बनाना सीखा। शिष्य-गुरु संवाद केंद्र की 28 वर्षों से चल रही अनवरत यात्रा उस ऋषि-ऋण को चुकाने की यात्रा है जो मुझे नि:शुल्क मिला।
हर शिक्षा संस्थान में मुझे शिक्षा को समर्पित ऐसे शिक्षक मिले हैं जो अपना सर्वस्व दान करके मानव निर्माण के यज्ञ में अपनी आहुति देने को तैयार हैं लेकिन शिक्षालय को कार्यालय में बदलने का वातावरण और नई पीढ़ी की शिक्षा से दूर होने के आचरण को देखकर वे हतप्रभ हैं। 'सादा जीवन,उच्च विचार' का मंत्र देने वाली हमारी शिक्षा परंपरा को सिर्फ अच्छी प्रकार से लागू करने की बात है, फिर गंभीर संकट का समाधान सहज ही निकल आएगा।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹