आत्महत्या नहीं,आत्मरूपांतरण करो
May 17, 2026/start
🙏पेपर लीक होने के कारण परीक्षा रद्द होने पर नीट के अवसादग्रस्त अभ्यर्थियों के नाम एक खुला खत 🙏
संवाद
'आत्महत्या नहीं,आत्मरूपांतरण करो'
नीट पेपर लीक और उसके बाद परीक्षा रद्द होने के कारण विद्यार्थियों की आत्महत्या का सिलसिला बढ़ता देखकर एक शिक्षक की विशेष जिम्मेवारी बनती है कि समाज को कुछ सकारात्मक संदेश दे ताकि ऐसी दर्दनाक घटनाएं रुक सकें। अवसाद से आत्महत्या की ओर बढ़ता क्षण आत्मरूपांतरण का सबसे बड़ा क्षण होता है। जीवन में जब अंधेरा घना हो जाता है तो मन अवसाद की ओर बढ़ जाता है। जब घने अंधेरे में मार्गदर्शन रूपी कोई बिजली नहीं चमकती है तो आत्महत्या घटित हो जाती है।
साक्षात् उदाहरण से और जीवन के अपने अनुभव से मैं इस बात को समझाना चाहूंगा। 2024 की नीट परीक्षा में पेपर लीक के कारण परीक्षा रद्द होने की संभावना थी, तब मेरी भतीजी अच्छा नंबर लाई थी किंतु उस नंबर पर उसको सरकारी सीट नहीं मिल रही थी। इसलिए विचार का मुद्दा था कि फिर से उसे एक और प्रयास करना चाहिए या ज्यादा फीस से किसी प्राइवेट संस्थान से एमबीबीएस कर लेना चाहिए। विद्यार्थी को अपनी प्रतिभा और परिश्रम पर भरोसा था किंतु व्यवस्था पर नहीं। अभिभावक को भी व्यवस्था पर भरोसा नहीं था, अतः निर्णय लिया गया कि प्राइवेट संस्थान से डिग्री ले लेना चाहिए, भले ही फीस भरने के लिए जमीन बेचकर पैसा जुटाना पड़े। आज 2026 के पेपर लीक के बाद लिया गया वह निर्णय सही लगता है, क्योंकि अब पता चल रहा है कि 2025 का भी पेपर लीक था।
अब उस भतीजी के साथ एक और सहपाठी था जिसे 2024 की नीट परीक्षा में 600 से ऊपर नंबर आए थे। लेकिन सरकारी सीट नहीं मिलने के कारण और उसके घर में प्राइवेट मेडिकल कॉलेज के फीस का पैसा नहीं होने के कारण उसने फिर से आगे भी परीक्षा देने का निर्णय लिया। 2026 में उसकी परीक्षा बहुत अच्छी गई थी। 5 वर्षों की तपस्या के बाद वह इस बार सफलता का इंतजार कर रहा था कि सरकारी सीट मिल जाएगा। लेकिन पेपर लीक और परीक्षा रद्द होने के कारण उसकी आशा पर तुषारापात हो गया। अभी उसकी मन:स्थिति निश्चितरूपेण अवसाद में होगी और कोई मार्गदर्शनरूपी बिजली नहीं चमकेगी तो आत्महत्या भी घटित हो सकती है।
लेकिन इस मोड़ पर मैं उस विद्यार्थी को सलाह देना चाहूंगा कि इस घनघोर अंधेरे से गुजरो क्योंकि हो सकता है कि तुम्हारी आशाओं का सूरज आगे उगेगा। यह वह क्षण है जब तुम जिंदगी के रण से भाग भी सकते हो और उसमें टॉप भी कर सकते हो। आज सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि ऐसे विद्यार्थी को इस व्यवस्था में कोई विश्वास नहीं रहा।
तब मैं उसको अपने जीवन का अनुभव सुनाना चाहूंगा जिसमें जीवन की अंधियारी में किसी ने आशा का सूरज अपने शब्दों से दिखाया था। वह सूरज सचमुच नहीं था फिर भी उसमें विश्वास के कारण मेरे जीवन में दोबारा सूरज उग आया। दस वर्षों की मेहनत के बाद क्रिकेट खेलने पर मेरे ऊपर बैन लगाया गया। क्रिकेट से ही मैं सब कुछ प्राप्त करना चाहता था इसलिए यह बैन मुझे अवसाद में धकेल दिया। तब रामकृष्ण मिशन आश्रम के एक साधु ने समझाया कि इस जगत में अव्यवस्था दिखाई देती है किंतु ऊपर के जगत में एक व्यवस्था है जो तुम्हारे परिश्रम की एक-एक बूंद का हिसाब अवश्य करेगी। अतः ऊपर वाले पर भरोसा रखो और अब खेल की जगह पढ़ाई में केरियर (career) बनाने के लिए परिश्रम करो। मुझे जीने का सहारा मिल गया किंतु मुझे नहीं मालूम था कि ऊपर वाले की कृपा होती है तो दिन-रात क्रिकेट खेलने वाला शख्स एक प्रोफेसर भी बन सकता है।
महाभारत के युद्ध में इसी अवसाद में अर्जुन घिर गया था किंतु उसका सौभाग्य था कि मार्गदर्शन देने वाले कृष्ण पास थे। अर्जुन ने कृष्ण से अपने अंदर के द्वंद्व और बढ़ते विषाद को बताया और उनके उत्तर को सुना और महाभारत में विजयी हुआ। आज के अर्जुन के पास कोई कृष्ण नहीं है, अर्जुन अपना विषाद आज किसी से कहता नहीं है, विषाद को अर्जुन कहना भी चाह रहा है तो आज कोई सुनने वाला नहीं है, कोई सुनता भी है तो कृष्ण की क्षमता उसके पास नहीं है जो कह सके कि-'कर्म में ही तेरा अधिकार है,फल में नहीं।'
आज के अर्जुन से मैं कहना चाहूंगा कि इस व्यवस्था में तुम्हारा भरोसा भले ही न हो किंतु परमात्मा की व्यवस्था में भरोसा करो। आज के अर्जुन का अवसाद आत्महत्या तक पहुंचा रहा है जबकि कृष्ण के संपर्क से आत्मरूपांतरण घटित हो सकता है।
भारतीय ज्ञान परंपरा मानती है कि आत्महत्या संभव ही नहीं है,वह तो देह-हत्या है। देह को खत्म कर देने से फिर से जन्म लेना होगा और फिर से परिश्रम करके पढ़ाई का संघर्ष करना होगा। फिर संघर्ष के क्षण में सुसाइड वाला यही मन सक्रिय हो जाएगा। इसलिए देह को मत मारो बल्कि इस मन को मार दो जो सिर्फ सफलता में ही जीना चाहता है। जीवन में सफलता है तो असफलता भी है,दिन है तो रात भी है, फूल है तो कांटे
भी हैं। आत्मवान फूल को ही नहीं, कांटों को भी चूमता है-
'यह कौन चमनपरस्त गुजरा है इन राहों से
मैंने कांटों पर भी होठों के निशान देखे हैं।'
याद करो सुभाष बोस को जिनको सिविल सेवा अधिकारी के पद रूपी फूल मिल भी गए थे फिर भी उन्होंने मातृभूमि की सेवा के लिए कांटों का रास्ता चुना। असफलताओं में जीने का ,अंधेरे में जीने का एक नया मंत्र सीखना होगा क्योंकि भारतीय संस्कृति के अनुसार प्रतिभा की परिभाषा है-'प्रतिकूल परिस्थितियों में जीने की क्षमता का नाम ही प्रतिभा है।'
इसको समझने की जरूरत है कि यदि राम को वनवास नहीं मिलता तो मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं बन पाते, कृष्ण को कई प्रकार की चुनौतियां नहीं मिलती तो पूर्णावतार नहीं कहलाते। मैं मानता हूं कि यह काल हर प्रकार के संकटों से घिरा हुआ है किंतु इन संकटों के बीच से ही महान आत्मा का जन्म भी होगा। उस आत्मा को सदैव अपने स्मरण में रखना ही भारत की अध्यात्म प्रधान विद्या है।
देह का जन्म हुआ है तो मरण भी होगा, मन की इच्छाओं का तो दिन में ही कई बार जन्म और मरण होता है किंतु आत्मा न जन्म लेती है न मरती है, वह तो अपना अनुभव इकट्ठा करते हुए बस आगे बढ़ते हुए परमात्मा में मिल जाती है। इसलिए देह-हत्या मत करो बल्कि आत्म-स्मरण करो जिसे आज की व्यावसायिक शिक्षा ने भूला दिया है किंतु आध्यात्मिक-शिक्षा उसे बार-बार याद दिलाती है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹