🙏अव्यवस्थित राजनीतिक चित्त की असंयमित वाणी का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण 🔥


संवाद


'अव्यवस्थित चित्त और असंयमित वाणी'


राजनेताओं के अव्यवस्थित चित्त और असंयमित वाणी ने वातावरण को नकारात्मक बना दिया है। उनकी बातें उनके अनुयायियों द्वारा दूर तक पहुंचा दी जाती हैं,सोशल मीडिया में प्रमुखता पा लेती हैं और समाचारपत्रों में प्रमुखता से छप जाती हैं; इसी कारण से उसका दूरगामी प्रभाव होता है।


            विश्व के सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप के चित्त और वाणी का विश्लेषण करें तो आसानी से समझ पाएंगे कि उसका प्रभाव कितना भयावह होता है।ट्रंप एक तरफ 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन'(MAGA) का नारा देते हैं और दूसरी तरफ लगातार विवादित बयानों को देते रहते हैं जिसके कारण आज  उनकी छवि अव्यवस्थित चित्त वाले वाचाल नेता की बन गई है। संस्कृत के ऋषि कहते हैं-


'क्षणे रुष्टा, क्षणे तुष्टा, रुष्टा तुष्टा क्षणे-क्षणे।


अव्यवस्थित चित्तानाम्, प्रसादोऽपि भयंकरः॥'


अर्थात् जो लोग पल भर में रूठ जाते हैं और पल भर में मान जाते हैं — जिनका मन लगातार कभी रुष्ट तो कभी तुष्ट होते रहता है — ऐसे अस्थिर और भ्रमित मन वाले लोगों की प्रसन्नता भी भयंकर या नुकसानदायक होती है।


              रहस्यदर्शी ओशो अमेरिकी राष्ट्रपति केल्विन कुलिज (1923-29) के बारे में बताते हैं कि वे बहुत कम बोलते थे, ठीक जिस प्रकार से हमारे प्रधानमंत्री स्व.श्री मनमोहन सिंह थे। बहुत कम बोलने के कारण राष्ट्रपति कुलिज बहुत कम विवादों में फंसे। इसके ठीक विपरीत ट्रंप आक्रामक रूप से बहुत बोलकर विवाद उत्पन्न कर देते हैं और उसके बाद विवाद को अपने प्रचार का साधन बनाकर 'हम बनाम वे' की भावना भड़का देते हैं। वे कभी भारत,भारतीय और इंडियन पीएम के बारे में विवादित बयान देकर करोड़ों भारतीयों की भावना को ठेस पहुंचा देते हैं तो कभी किसी देश के राष्ट्रपति को गिरफ्तार कर और किसी देश के प्रमुखों को मारकर उसकी संप्रभुता का उल्लंघन कर देते हैं। अचानक ईरान पर आक्रमण करके और खासकर बच्चियों के स्कूल पर मिसाइल अटैक से निर्मम हत्या करके एक ऐसे युद्ध को उन्होंने उकसा दिया जो होर्मुज संकट के रूप में पूरे विश्व को महंगाई के जाल में फंसा दिया।


           जहां तक भारत की बात है तो यहां की संसद में इतने असंसदीय शब्द बोले गए हैं कि उनकी एक डिक्शनरी तैयार हो गई है। रैलियों में दिए गए राजनेताओं के सार्वजनिक भाषण और किसी मुद्दे पर दी गई प्रतिक्रिया तो इतनी विभाजनकारी और आक्रमणकारी हो चुकी हैं कि विचार-विमर्श लगभग वाकयुद्ध में तब्दील हो चुका है।


         मनोवैज्ञानिक दृष्टि से इस पर विचार करें तो इसके मूल में अहंकार और भीड़ की मानसिकता मूल कारण है। अंदाज जितना आक्रामक होगा और वाणी जितनी तीखी होगी उतनी ही ज्यादा उसकी जनता में चर्चा होगी जिसके कारण लोगों का ध्यान उस पर उतना ही ज्यादा जाएगा और उनकी लोकप्रियता उतनी ही ज्यादा बढ़ेगी, भले ही नकारात्मक रूप से बढ़े।


         इसके परिणामस्वरूप एक तरफ सामाजिक सौहार्द खत्म होता है तो दूसरी तरफ लोकतंत्र की मर्यादा खत्म होती है। यह समझना होगा कि पक्ष और विपक्ष के बीच उठे विवाद की मंजिल तो संवाद है और यह भी जानना होगा कि पक्ष और विपक्ष एक दूसरे के दुश्मन नहीं बल्कि वैकल्पिक विचारों के प्रतिनिधि हैं।


             भारतीय संस्कृति का दर्शन यह है कि वसुधैव कुटुंबकम की भावना हो और चर-अचर सबके साथ संवाद की संभावना हो। संवेदनशीलता और संवादशीलता के दो पंखों से ही आकाश में उड़ा जा सकता है जिसका मूलमंत्र देते हुए कृष्ण गीता में कहते हैं कि


'अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।' अर्थात् ऐसी वाणी बोलो जो उद्वेग न पैदा करे,सत्य हो और लोकहितकारी हो।


             मानव जीवन के सभी आयामों को सबसे ज्यादा प्रभावित राजनीति करती है,इसलिए राजनेताओं को यह समझना होगा कि व्यवस्थित चित्त और संयमित वाणी के बिना लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा और राजनेताओं से भरोसा उठ जाएगा। ऐसे ही हालात में कॉकरोच जनता पार्टी जैसे वैकल्पिक रास्ते को करोड़ों अनुयायी मिलने लगते हैं।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹