🙏असंतोष की आग को रोशनी में बदलने की गांधी-कला🔥


संवाद


"कॉकरोच की वेदना"


कॉकरोच संबोधन किसी को गाली देने के समान है किंतु 'मैं कॉकरोच हूं' इसको स्वयं ही स्वीकृत करने से गाली भी गीत बन जाती है। वही गीत आज 'कॉकरोच जनता पार्टी' को इतना लोकप्रिय बना दिया कि लोग अपने अन्य मुद्दे को उठाने के लिए सीजेपी (CJP) से अनुरोध करने लगे हैं।


              सत्ता पक्ष सशंकित हो गया है और विपक्ष भ्रमित हो गया है। यह वर्तमान राजनीति के प्रति उठता अविश्वास का भाव है। जनता के द्वारा चुने हुए नेता जब उनके दर्द को नहीं सुन सके तब ऑनलाइन एक प्लेटफॉर्म ने उनके दर्द को अभिव्यक्त करके उनके दिलों को छू लिया। परिणामस्वरूप चंद दिनों में अभिजीत दीपके की कॉकरोच जनता पार्टी ने इतने फॉलोअर बना लिए जितने बरसों की बनी पार्टियां नहीं बना सकीं।


                 दरअसल सोशल मीडिया एक दुधारी तलवार है। जिस सोशल मीडिया के सहारे शीर्ष पर बैठे लोग अपनी छवि चमकाते हैं, उसी सोशल मीडिया के सहारे धरातल की असली समस्या भी उजागर हो जाती है। सत्य की एक ताकत होती है, उसे कितना भी दबाओ और छुपाओ, वह सत्य किसी न किसी रास्ते से प्रकट होकर रहता है।


            आज सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उठ रहा है कि जब ऑनलाइन प्लेटफार्म से विदेश में बैठा कोई शख्स देश के असली मुद्दे को उठाकर लोगों की संवेदना को आकर्षित कर सकता है तो मुद्दे को उठाने के लिए जनप्रतिनिधियों की क्या जरूरत है?


              मेरी राय में जनप्रतिनिधियों की जरूरत इसलिए पड़ती है कि ऑनलाइन लाइक कर देने से समस्या का समाधान नहीं होता। उसके लिए जनता को सड़क पर लाना पड़ता है और उनकी संगठित आवाज को संवैधानिक तरीके से दमदार बनाकर सरकार को सुनाना पड़ता है।


                स्वतंत्रता का प्रथम संग्राम 1857 में हुआ किंतु वह असफल इसलिए हो गया कि जनता को उससे नहीं जोड़ा जा सका और स्वतंत्रता के लिए जाग्रत नहीं किया जा सका। गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम से जनता को जोड़ भी दिया और सत्य, प्रेम,अहिंसा के मंत्र द्वारा स्वतंत्रता के लिए उनको जगा भी दिया।


                आज जेन जी में एक असंतोष की आग है। इस आग से चमन जल भी सकता है और इस आग से भारत रौशन भी हो सकता है। नेपाल,बांग्लादेश की जेन जी ने चमन में आग लगा दी और बरसों की मेहनत से बनाई हुई संपत्ति खाक कर दी, जिसे बनाने में फिर बरसों लग जाएंगे। नेपाल,बांग्लादेश में मूल गलती यह हुई कि सोशल मीडिया पर नफरत की आग को लगातार हवा दी गई।


         ब्रिटिशों के विरुद्ध भी गुलामी के काल में लोगों के दिलों में नफरत की आग थी किंतु उस नफरत की आग को गांधी ने हवा नहीं दिया बल्कि सत्य-प्रेम-अहिंसा की रोशनी में तब्दील किया। इसके लिए स्वयं मोहन को मन,वचन,कर्म की एकता द्वारा लोगों का दिल जीतना पड़ा और सामाजिक सुधारों द्वारा राजनीतिक लड़ाई के लिए सत्याग्रह के रास्ते पर चलने वाले सिपाही तैयार करने पड़े। धर्म और जाति के आधार पर बंटी हुई जनता को उन्होंने एकता के सूत्र में बांधकर अपने जीवन और दर्शन द्वारा स्वतंत्रता का सत्याग्रही-योद्धा बना दिया।


            कॉकरोच जनता पार्टी ने जन सरोकार के मुद्दे को उठाकर जिस प्रकार से अपने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से लोगों को जोड़ा है, वे जुड़े हुए लोग किसी बड़े नेता की प्रतीक्षा में है जो उन्हें सत्याग्रह का रास्ता दिखा सके। सत्याग्रह में किसी प्रकार की हिंसा नहीं होती है। सत्याग्रही सत्य के रास्ते पर प्रेमपूर्वक अहिंसक तरीके से चलता है। लेकिन इसके लिए शिक्षा ही सबसे सशक्त माध्यम है जिसके द्वारा गांधी के सत्याग्रह को जन-जन तक पहुंचाया जा सकता है।


            आज सबसे बड़ी चुनौती यही है कि प्रदर्शन वाली राजनीति ने शिक्षा को व्यावसायिक बना दिया जिसमें प्रतिभा और परिश्रम पर पैसा भारी पड़ रहा है। राष्ट्र निर्माण वाली शिक्षा तो आध्यात्मिक और वैज्ञानिक शिक्षा होती है जिसके लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 बनाई गई।ऐसे में आध्यात्मिक और वैज्ञानिक शिक्षकों को नेतृत्व के लिए आगे आना होगा और युवाओं की आग को रोशनी में तब्दील करने का रास्ता दिखाना होगा।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹