वस्तुएं कम,इंसानियत ज्यादा
May 28, 2026/start
🙏'सादा जीवन उच्च विचार' पर एक दृष्टि 🙏
संवाद
'वस्तुएं कम,इंसानियत ज्यादा'
युद्धजनित आर्थिक संकट के कारण बढ़ती महंगाई के इस युग में भारतीय ज्ञान परंपरा का 'सादा जीवन,उच्च विचार' का मंत्र बहुत मूल्यवान हो गया है। विदेश मत जाओ, पेट्रोल बचाओ,तेल कम खाओ के उपदेश बहुत बंधनकारी लगते हैं, खासकर तब जब उपदेश देने वालों को इन्हीं बातों का उल्लंघन करते हुए प्रत्यक्ष रूप से देखते हैं। लेकिन जब हम किसी को 'सादा जीवन,उच्च विचार' के मंत्र पर जीते हुए देखते हैं तो बचत की उपदेश वाली बातें मुक्तिकारी लगती है।
'सादा जीवन' का अर्थ गरीबी या अभाव नहीं है बल्कि अनावश्यक उपभोग और दिखावे से मुक्ति है। 'उच्च विचार' का आशय संवेदनशीलता और संवादशीलता से है। मोहनदास ने जब किसी महिला के तन पर गरीबी के कारण कम कपड़े देखे तो उन्होंने भी कम कपड़ों में जीना शुरु कर दिया। बाहरी जीवन में कम से कम सामान का उपयोग करके उन्होंने आंतरिक जीवन में ऊंचे से ऊंचे विचार का सृजन किया जिसने उन्हें मोहन से महात्मा बना दिया।
आज अवसाद की ओर बढ़ते जीवन के मूल में दिखावे का उपभोक्तावादी जीवन और प्रतियोगितापूर्ण विचार है। समाज में इंसान का मूल्यांकन महंगे सामान से होता है क्योंकि बाहर से वही दिखाई देता है लेकिन इंसान का जीवन मन के अंदर में चल रहे विचार से निर्धारित होता है। यदि विचार उच्च नैतिकता और आध्यात्मिकता को लिए हुए हैं तो जीवन ऊंचा होगा किंतु विचार निम्न कोटि का है तो जीवन निम्नस्तरीय होगा।
वस्तुत: व्यक्ति की तन की आवश्यकता बहुत कम है किंतु मन की इच्छाएं अनंत हैं। गरीब हो या अमीर सबके लिए रोटी, कपड़ा और मकान की आवश्यकता समान है किंतु मकान बड़ा से बड़ा चाहिए, कपड़ा महंगा से महंगा चाहिए, ऐसी मन की इच्छाएं असमान है। अमीर महिलाओं के तन करोड़ों रूपयों की साड़ी में भी नहीं ढकता है जबकि गरीब घर की महिलाओं के तन कुछ रूपयों की साड़ी में ढक भी जाता है और ज्यादा गरिमापूर्ण भी लगता है।
'सादा जीवन उच्च विचार' का मंत्र देने वाले ऋषियों ने संतोष को सबसे बड़ा सुख माना-'संतोषं परमं सुखम्।' किंतु उन्होंने व्यक्ति को अपनी पत्नी,भोजन और धन में संतोष करने को कहा जबकि अध्ययन,तप और दान में असंतोष अपनाने का आह्वान किया-
'संतोषस्त्रिषु कर्तव्यः स्वदारे भोजने धने
त्रिषु चैव न कर्तव्योऽध्ययने तपदानयोः।'
ऐसा क्यों ऋषियों ने कहा? क्योंकि उन्हें मालूम था कि स्त्री,भोजन,धन कितना भी बढ़ा दो कभी भी तृप्ति नहीं मिलेगी क्योंकि बुद्ध के अनुसार वासना दुष्पूर है। अनंत वासनाओं के पीछे भागने से प्रकृति नष्ट-भ्रष्ट हो जाएगी। इसी को गांधी ने दूसरे शब्दों में कहा कि प्रकृति के पास व्यक्ति की आवश्यकता पूर्ण करने के लिए पर्याप्त है किंतु इच्छा पूर्ण करने के लिए नहीं।
दूसरी तरफ ऋषियों ने अध्ययन, तप,दान में असंतुष्ट रहने का आह्वान किया क्योंकि आत्मा को जितना बड़ा बनाओ उसका आनंद उतना बढ़ता जाता है-'भूमैव सुखम् ,नाल्पे सुखमस्ति' अर्थात् विराटता में ही सुख है, तुच्छता में नहीं।
जिंदा उदाहरण किसी जटिल बात को भी बहुत सरल करके समझा देते हैं। सबसे शक्तिशाली राष्ट्र के राष्ट्रपति को देखो न तो वे अपनी पत्नी से संतुष्ट है,न भोजन से,न धन से। परिणाम में एक तरफ उनका नाम एपस्टीन फाइल में आ रहा है और दूसरी तरफ अपने असंतोष से वे दूसरे देशों को भी संकट में डाल रहे हैं।
ठीक इनके विपरीत परम संतोषी अधनंगा फकीर महात्मा गांधी का जीवन है जिनका नश्वर देह तो खत्म हो गया किंतु उनकी अनश्वर आत्मा आज भी अपने अमूल्य जीवन संदेश से समस्त विश्व को राह दिखा रही है।
चुनाव हम सबको करना है कि मूल्यविहीन अमीर के रास्ते पर चलना है या अमूल्य अधनंगा फकीर के रास्ते पर-
'आए हो तो दुनिया में कुछ ऐसे निशां छोड़ो
हर आंख में आंसू हो जब तुम ये जहां छोड़ो
कुछ साथ वो ले जाओ जो काम वहां आए
और याद करे दुनिया जब तुम ये जहां छोड़ो।'
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹