जगत सब सपना
May 29, 2026🙏अहमदाबाद प्लेन क्रैश में 12 जून 2025 को अपने बेटे,बहू और तीन पोते-पोती को गंवाने वाले शख्स कल बैंक में मुझे मिले।वक्त और जीवन की अबूझ पहेली पर एक चिंतन 😭
संवाद
'जगत सब सपना'
12 जून 2025 को अहमदाबाद प्लेन क्रैश ने देश को हिलाकर रख दिया था और उसमें बांसवाड़ा के एक पिता के साथ घटी घटना ने तो सबको वक्त की क्रूरता पर सोचने पर मजबूर कर दिया था। वह पिता अपने इकलौते पुत्र को प्लेन में बिठा कर आया था। पुत्र के साथ उसकी पत्नी और तीन बच्चे लंदन में बसने को जा रहे थे। बच्चों में एक प्यारी सी बिटिया और दो सुंदर जुड़वा बेटे थे।
घटना की पिछली रात तीनों बच्चे दादा जी के साथ खूब प्यार से खेले थे और उनके सीने पर अपना सर रखकर सोए थे। सारे बच्चों को उन्होंने अपनी तरफ से स्कूल बैग, टोफियां आदि खरीद कर दी थीं। बड़े प्यार से उन्होंने अपने बेटे,बहू और पोते-पोती को टाटा,बाय-बाय किया और प्लेन के उड़ते ही अपनी कार से बांसवाड़ा की तरफ रवाना हो गए। प्लेन में बैठकर मोबाइल से लिया गया उस सुंदर सी फैमिली का खुशनुमा फोटो दादा जी को अपने मोबाइल पर दिखा और वे निश्चिंत होकर खुशी- खुशी घर की ओर लौटने लगे। तभी कुछ लम्हों के बाद प्लेन क्रैश की खबर आने लगी।
खुशी की उस रात के बाद गम का जो दिन आया वह इतना अंधकारपूर्ण था कि वैसा अंधकार रात में भी नहीं होता। बांसवाड़ा की यह खबर विश्व की सबसे बड़ी सुर्खियां बनीं। अपने बेटे के पूरे परिवार को प्लेन क्रैश में खोने वाला पिता का इंटरव्यू खूब देखा गया और मैंने भी देखा। मेरे जेहन में एक ही बात उठती थी कि यह पिता अब कितने दिन जिएगा और कैसे जिएगा? जीने के सारे आधार जब खत्म हो गए तो फिर क्यूंकर जिएगा?
उसी पिता से कल अकस्मात् बैंक में आमना-सामना हुआ। बैंक मैनेजर के रूम में उनके बगल में मैं बैठा। चेहरा देखते ही मैं पहचान गया, उन्हें नमस्ते भी किया, यह भी पूछा कि सर आपका स्वास्थ्य कैसा है? लेकिन उसके बाद सिर्फ उन्हें देखता रहा। बार-बार उनसे कुछ बात करने का विचार मन में उठ रहा था किंतु बार-बार मेरा हृदय चुप करा देता था। देखने से वे बाहर से ठीक-ठाक लग रहे थे लेकिन मन के अंदर क्या चल रहा था, यह जानने का कोई उपाय नहीं था। बस मैं पंद्रह मिनट तक बगल की कुर्सी पर बैठकर उनको महसूस करता रहा और मोबाइल पर टिकी उनकी निगाहों को और स्क्रॉल करने वाली उंगलियों को और वीडियो को देखता रहा।
बैंक से आने के बाद न तो उनका चेहरा नजरों से हट रहा और न प्लेन क्रैश के पहले उनके बेटे द्वारा भेजा गया हंसता हुआ परिवार का फोटो लुप्त हो रहा। कैसे क्षण भर में उनके सारे सपने प्लेन क्रैश की आग में जल गए-
'आग क्या चीज है ये तब समझे
जब आंच हमारे मकान में आई
मुझसे लिखा गया न कोई जवाब
जब जिंदगी इम्तिहान में आई।'
जब वक्त बदलता है और जिंदगी इम्तिहान लेती है तो उस परीक्षा की क्या कोई तैयारी हो सकती है?-
'परीक्षा जिंदगी की पास करना है बहुत मुश्किल
कि उसमें एक भी उत्तर रट्टा-घोटा नहीं होता
जमाने में भले दिखता हो अंतर आपमें हममें
ये मंदिर है यहां कोई खरा खोटा नहीं होता।'
एक ही सवाल इस मिलन के लम्हे के बाद मेरे मन में गूंज रहा है कि व्यक्ति जीवन की कितनी तैयारी करता है, कितना धन-पद-प्रतिष्ठा अर्जित करता है, कितनी सुरक्षा का इंतजाम कर लेता है; किंतु एक वक्त आता है जब मनुष्य की सारी योजना धरी की धरी रह जाती है। वक्त इतना बलवान साबित होता है कि इंसान उसके हाथ का खिलौना बन जाता है-
'वक्त से दिन और रात,वक्त से कल और आज
वक्त है फूलों की सेज, वक्त है कांटो का ताज
आदमी को चाहिए वक्त से डर कर रहे
कौन जाने किस घड़ी वक्त का बदले मिजाज।'
उम्र बढ़ने के साथ याददाश्त कम होने लगती है। मेरे को इल्म था कि बढ़ती उम्र की यह सबसे बड़ी चुनौती होती है। कुछ चीज़ें मैं भी भूलने लगा हूं और चिंता भी इसको लेकर बढ़ने लगी है। लेकिन कल बैंक में उस पिता के साथ मुलाकात ने मुझे सिखाया कि भूलना अभिशाप नहीं, वरदान भी हो सकता है।
मन की एक बहुत बड़ी शक्ति होती है अतीत की स्मृतियों को संजोकर रखने की। यदि परमात्मा इस शक्ति को सदैव बनाए रखे तो प्लेन क्रैश वाली दुर्घटना के बाद कोई पिता जी नहीं सकता क्योंकि-
'आते रहे वे याद भुलाने के बाद भी
जलता रहा चराग बुझाने के बाद भी।'
मैंने सुना है कि एक राजा असाध्य रोग से ग्रस्त अपने इकलौते पुत्र की शय्या के पास बैठा हुआ था। बहुत अंधेरी रात थी और रानी चिंता में पड़ी थी कि पुत्र के प्राण निकलते ही मोहग्रस्त पिता के भी प्राण निकल जाएंगे। तभी राजा को नींद आ गई। इधर पुत्र ने अंतिम सांस ली। रानी रोने लगी और राजा की नींद टूट गई। पर राजा चुपचाप मरे हुए बेटे को और रोती हुई रानी को देख रहा था।
रानी को ऐसा लगा कि राजा को कठ्या मार गया,शून्यवत सिर्फ देख रहा है। अंत में रानी ने कहा कि आप रोते क्यों नहीं है? राजा ने कहा कि अभी सपने में मैं देख रहा था कि मेरे बारह बेटे एक साथ नौका विहार पर निकले और सभी बारह एक साथ गंगा में डूब गए। अब निर्णय करना मुश्किल हो रहा है कि एक बेटे के लिए रोऊं कि बारह बेटे के लिए रोऊं। जब 12 बेटे का मरना सपना था तो इस एक बेटे का मरना भी तो सपना हो सकता है। एक सपना आंख बंद की अवस्था में देखा और दूसरा सपना आंख खुले होने की अवस्था में देख रहा हूं ; आखिर दोनों सपनों में से किसे सच मानूं?
'उमा कहहूं निज अनुभव अपना
सत हरि भजन जगत सब सपना।'
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹