परीक्षा फूल,शिक्षा मूल
May 30, 2026🙏पेपर लीक और गलत मार्किंग के कारण विद्यार्थी अवसाद में है और आत्महत्या कर रहे हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा कहती है कि यदि शिक्षा सही होती तो परीक्षा ऐसी न होती-एक शैक्षिक विश्लेषण 😭
संवाद
'परीक्षा फूल,शिक्षा मूल'
परीक्षा के लिए पेपर प्लेन से आएंगे और सेना की मदद ली जाएगी। इस खबर से पता चलता है कि सरकार के लिए परीक्षा आज कितनी महत्वपूर्ण हो गई है।
पहले परीक्षा के बाद एक विश्राम का और आशा का माहौल हुआ करता था। वर्षों तक दिन-रात परिश्रम करते हुए तनाव का समय काटकर विद्यार्थी परीक्षा देने के बाद अच्छे परिणाम की आशा से भरे होते थे। घर में भी शांति और सुकून का माहौल होता था।
परीक्षा परिणाम आता था तो खुशियों का माहौल होता था और समाचारपत्र मेधावी विद्यार्थियों की सफलता की खबरों से भरे होते थे। विद्यार्थियों को समाज में नई पहचान मिलती थी, माता-पिता और शिक्षकों को अपनी तपस्या का संतोष मिलता था। मिठाई की दुकानों और मंदिरों तक खुशियों का पैगाम पहुंच जाता था।
लेकिन इस बार परीक्षा के बाद अनिश्चितता और आशंकाओं का बाजार गर्म है। अवसाद में विद्यार्थी जा रहे हैं और कुछ आत्महत्या तक कर रहे हैं। घरों में सन्नाटा पसरा हुआ है और सड़कों पर उबाल है।
सब जगह परीक्षा पर चर्चा चल रही है। लेकिन एक शिक्षक होने के नाते मैं शिक्षा पर चर्चा करना चाह रहा हूं। शिक्षा मूल है। मूल में पानी देने से बीज अंकुरित होता है, पत्तियां आती हैं, फूल खिलते हैं और अंत में फल भी मिलते हैं।
परीक्षा पर जितनी उच्च स्तरीय मीटिंग हो रही है, उतनी ही उच्च स्तरीय मीटिंग शिक्षा पर भी होनी चाहिए। आखिर कैसी शिक्षा दी गई जिसमें पेपर सेटर प्रोफेसर ही पेपर लीक कर देता है, संस्कार देने वाले मां-बाप ही पेपर खरीदने लगते हैं,विद्यार्थी बिना योग्यता अर्जित किए हुए पदों पर पहुंचना चाहते हैं।
शिक्षालयों से शिक्षा कोचिंग क्लास में पहुंच गई। शिक्षालय डमी हो गए और कोचिंग गुरु पथ-प्रदर्शक हो गए। सफलता की गारंटी दी जाने लगी और कोटा,सीकर, पुणे जैसे कोचिंग चलाने वाले शहर शिक्षा के केंद्र बन गए।
विद्यार्थियों के जीवन से विश्राम खो गया,शिक्षालयों से आकर कोचिंग क्लास में मन को जबरदस्ती लगाने के कारण वह विद्यार्थी मानव कम, मशीन ज्यादा हो गया। प्राकृतिक वातावरण में न खेलने का समय , न बड़ों के संग सत्संगति में बैठने का समय,न महापुरुषों की जीवनी पढ़ने का समय और न जीवन के मूल्यों पर विचार करने का समय उसके पास रहा। समझ से ज्यादा ध्यान अंकों पर आ गया। पवित्र साधन गौण हो गए,किसी भी कीमत पर सफलता साध्य हो गई।
30 वर्षों से उच्च शिक्षा में अध्यापन कार्य कर रहा हूं। क्लास के अतिरिक्त घर पर भी विद्यार्थियों का आना-जाना रहता है। विषय के साथ-साथ वे विद्यार्थी जीवन के प्रश्नों को भी मेरे सामने में रखते हैं। उनकी जिज्ञासा के कारण 'शिष्य-गुरु संवाद केंद्र' नित नए-नए विषयों पर निःशुल्क और निःस्वार्थ भाव से 28 वर्षों से चर्चा आयोजित कर रहा है। ट्यूशन और कोचिंग ने कभी भी आकर्षित नहीं किया।सोशल मीडिया पर लेख के द्वारा और वीडियो के द्वारा कोरोना काल में शुरू हुआ शिक्षा और संवाद का अभियान अपनी गति से आनंदपूर्ण ढंग से आगे बढ़ रहा है।
बहुत लोग आश्चर्य करते हैं कि इस व्यावसायिक जमाने में कोई अपना समय नि:शुल्क कैसे दे सकता है? जीवन में जो कुछ मिलता है,वही अपनी आगे की पीढ़ी को व्यक्ति देता है। मेरे शिक्षकों और सीनियर्स ने नि:शुल्क मुझे पढ़ाया और निःस्वार्थ अपना प्रेम मुझ पर लुटाया। बांसवाड़ा में 30 वर्ष यही करते हुए गुजर गए। गंगा किनारे जो कुछ पाया,माही किनारे आकर वही लुटाया।
मैं ऐसा अकेला नहीं हूं। हर शिक्षण संस्थान में मुझे ऋषि-ऋण को चुकाने की मंशा वाले शिक्षक आज भी दिखाई दे रहे हैं। खासकर सरकारी शिक्षक जो अच्छी योग्यता के बाद कठिन प्रतियोगिता की परीक्षा से गुजर कर अपना मुकाम पाए हैं, उनकी सबसे बड़ी पीड़ा आज यही है कि पढ़ने और पढ़ाने का इस व्यवस्था में अवसर ही नहीं मिलता। प्रतिभाशाली और परिश्रमी शिक्षक जो व्यवस्था को बदलना चाहते हैं,उनके मुख से आज की सरकारी शिक्षा व्यवस्था में यही निकल रहा है कि 'आए थे हरि भजन को,ओटन लगे कपास'.
भारत विश्व गुरु बना था शिक्षा की गुणवत्ता के कारण। आज भारत से प्रतिभा पलायन हो रहा है और भारत में प्रतिभा कराह रही है शिक्षा की दुर्दशा के कारण।
परीक्षा पर चर्चा जरूरी है किंतु उससे भी ज्यादा शिक्षा पर चर्चा जरूरी है अन्यथा मेरे हृदय से निकली ये पंक्तियां 'नक्कारखाने में तूती की आवाज' बनकर रह जाएगी-
"विश्वविद्यालय का गोल्डमेडलिस्ट सड़क पर खड़ा था
उपाधियों के ढेर तले उसका अरमान पड़ा था
परीक्षा जिंदगी की आज वह फेल हो गया था
अनमोल सा हीरा बेमोल सेल हो गया था।"
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹