मूल्य-चेतना की पुकार
June 2, 2026🙏सीबीएसई के ध्येय वाक्य 'असतो मा सद्गमय'और भारत के राष्ट्रीय वाक्य 'सत्यमेव जयते' पर एक विचार 🔥
संवाद
'मूल्य-चेतना की पुकार'
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड(CBSE) के एक निर्णय ऑनलाइन स्क्रीन मार्किंग (OSM)से लाखों विद्यार्थी प्रभावित हुए हैं। अतः इसका ध्येय वाक्य 'असतो मा सद्गमय'आज विशेष रूप से विचारणीय है। भारत की आत्मा की पुकार है- हे प्रभु! मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो। शिक्षा का उद्देश्य इस एक प्रार्थना में अभिव्यक्त हो गया है।
"भारत"- 'भा' (ज्ञान)+'रत' (लीन) से बना है। इसका अर्थ होता है-'ज्ञान में लीन'। ज्ञान में लीन लोगों का अनुभव था कि सत्य ही जीतता है।इसीलिए हमने भारत का राष्ट्रीय वाक्य चुना है-'सत्यमेव जयते'। मुंडकोपनिषद् में ऋषि कहते हैं-'सत्यमेव जयते,नानृतम्'अर्थात् सत्य की ही जीत होती है, असत्य की नहीं।
जब हम जीवन में चारों ओर सच को हारते देखते हैं और झूठ को ही जीतते देखते हैं तो हमें ऐसे ध्येय वाक्य और राष्ट्रीय वाक्य का अर्थ समझ में नहीं आता। शब्द का अर्थ तो अनुभव से आता है।
इस बार 12th बोर्ड की परीक्षा के बाद बच्चों के जो नंबर आए और कापियों का जो सत्य सामने आ रहा है, उसको लेकर देश आंदोलित है। नीट परीक्षा का पेपर लीक होने के कारण सत्य की राह पर चलने वाले आंसू बहा रहे हैं, अवसाद में जा रहे हैं और आत्महत्या तक कर रहे हैं। परीक्षाओं में जुगाड़ अर्थात् असत्य जीत रहा है। असली शिक्षालय की जगह डमी शिक्षालय बढ़ते जा रहे हैं। सरकारी शिक्षालयों में क्लास सूने पड़े हैं और कोचिंग क्लास गुलजार होते जा रहे हैं।
राजनीति में हम देखते हैं कि सत्य की राह पर चलकर चुनाव लड़ने वाले अच्छे खासे शिक्षित लोग चुनाव हार जाते हैं और झूठ की राह पर चलने वाले भ्रष्टाचारी और व्यभिचारी चुनाव जीत जाते हैं।
विश्व राजनीति में हम देखते हैं कि सत्य नहीं,शक्ति जीतती है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उठा लिया,ग्रीनलैंड पर अपना दावा ठोक दिया और ईरान पर अचानक मिसाइल अटैक कर दिया। ऐसे उदाहरणों को देखकर क्या हम कह सकते हैं कि सत्य की ही जीत होती है और हे प्रभु!मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो।
जीवन और जगत का अनुभव तो यही कहता है कि ऐसी बड़ी-बड़ी बातें तो बातें ही हैं। लोग किसी भी उपाय से जीत जाते हैं और अपने आपको सत्य बताने लगते हैं क्योंकि किताबों में लिखा है-सत्य की ही जीत होती है।
वेदांत और सार्थक जैसे आज के प्रतिभाशाली बच्चों की आंखों के सामने में सच हारता हुआ दिखाई दे रहा है और झूठ जीत रहा है। वे देख रहे हैं कि किस प्रकार से हमारे राजनेता बड़े-बड़े मंचों से झूठ बोल रहे हैं और बार-बार बोल रहे हैं,इसके बावजूद बार-बार जीत भी रहे हैं। पेपर सेटर प्रोफेसर पेपर बेच रहे हैं ,अभिभावक पेपर खरीद रहे हैं और मुन्ना भाई एमबीबीएस बन रहे हैं। इससे नई पीढ़ी की मूल्य चेतना को गहरा आघात लगा है।
ऐसे में हमारी प्रार्थना और हमारे राष्ट्रीय वाक्य का क्या औचित्य है?
यहां पर इस बात को गहराई से समझना होगा कि एक बाहरी जगत है जो राजनीति का है और दूसरा आंतरिक जगत है जो धर्म का है। राजनीति के बाहरी जगत में चाणक्य नीति और मैकियावेली की कूटनीति ही चलती है जहां साम,दाम,दंड,भेद किसी भी उपाय से जीत ही लक्ष्य है,सत्य नहीं। असत्य के रास्ते पर चलते जाओ, जीतते जाओ और अपने भाषणों में 'सत्यमेव जयते' बोलते जाओ। हिटलर यही करता था लेकिन हिटलर ने अंत में स्वयं को गोली मार ली। इसका कारण था कि अंतरात्मा की नजरों में वह अंततः हार गया था।
असत्य से सत्य की ओर ले चलने की प्रार्थना इसलिए की गई क्योंकि सत्य प्रामाणिक होता है,पाखंडी नहीं। सत्य-हृदय में जो शांति और सुकून के फूल खिलते हैं उसकी सुवास के कारण वातावरण सुगंध से भर जाता है। असत्य कितने भी बड़े सिंहासन पर बैठा हो किंतु उसके हृदय में क्षुद्रता के जो शूल चूभते हैं, उसे कभी चैन से सोने नहीं देते।
एक दो सरल उदाहरणों को हम देखें। डमी परीक्षार्थियों को बिठाकर जिन लोगों ने नौकरी पा ली, वे अंततः पकड़े गए। पहला कदम जब उन्होंने असत्य का उठाया था, उस समय से वे अपने हृदय में नरक को भोग रहे थे क्योंकि सत्य तो उन्हें मालूम था और वह सत्य दुनिया के सामने उनकी कारगुजारी पकड़े जाने पर आया, अब वे जेल भोगेंगे।
दूसरी तरफ कोई मेहनत करके परीक्षा देता है और ईमानदारी से नौकरी करता है तो उसके जीवन में जो निश्चिंतता और निर्भीकता होती है, वह सत्य के रास्ते पर चलने के कारण होती है।
मेरे बहुत सारे साथी और परिचित बहुत ही अभाव में बहुत कठिन मेहनत करके बहुत बड़े पदों पर पहुंचे और आज भी ईमानदारी से अपने कर्त्तव्य का निर्वहन कर रहे हैं। उनके जीवन में जो सत्य का प्रकाश और संतोष का सुख है, वह अमूल्य है। करोड़ों-अरबों रुपए के भ्रष्टाचार करने वालों की कोठियां और गाड़ियां दिखाई दे जाती हैं किंतु उन पैसों से ईमानदार जीवन के वह सत्य का प्रकाश और संतोष का सुख खरीदा नहीं जा सकता जो विशेष आंखों से ही दिखाई देता है।
ईमानदारी के रास्ते पर चलने वालों की संतानों को मैंने संस्कारी और चरित्रवान देखा और उनके घरों में शांति-सुकून देखा जबकि बेईमानी के रास्ते पर चलने वालों की संतानों को संस्कारहीन और चरित्रहीन पाया और उनके घरों में अशांति-उपद्रव पाया। बोए पेड़ बबूल के आम कहां से होय?
अतः असत्य से सत्य की ओर ले चलने की प्रार्थना और सत्य की ही जीत हो इसकी कामना जीवन की गहरी से गहरी समझ का परिचायक है। सत्य का रास्ता साधना से ही तय होता है और उसी साधना से व्यक्ति महान बनता है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹