🙏एक पत्रकार ने कुछ शिक्षकों को दो कौड़ी का बताया तो कुछ शिक्षकों ने पत्रकार को फूटी कौड़ी का बताना शुरू कर दिया। एक दूसरे की ट्रोलिंग के कारण विषाक्त वातावरण बन रहा है। मेरी नजर में तो शिक्षक और पत्रकार दोनों अमूल्य हैं,यदि उनका लक्ष्य जनजागरण है-एक दृष्टि🔥


संवाद


'कौन कितने कौड़ी का'


शिक्षक और पत्रकार के बीच आजकल एक नई बहस चल रही है कि कौन कितने कौड़ी का है। कोई शिक्षक को दो कौड़ी का बता रहा है तो कोई पत्रकार को फूटी कौड़ी का बता रहा है। दोनों के अपने-अपने तर्क हैं और तर्क के आधार पर निर्णय करना मुश्किल हो जाता है कि कौन कितने कौड़ी का है‌।


        मूल प्रश्न है मूल्यांकन के आधार का। शिक्षक और पत्रकार के मूल्यांकन का आधार क्या है? कालिदास ने शिक्षक के मूल्यांकन के आधार को 'मालविकाग्निमित्र' में बताया है-


'लब्धास्पदोऽस्मीति विवादभीरोस्तितिक्षमाणस्य परेण निन्दाम्।


यस्यागमः केवलजीविकायै तं ज्ञानपण्यं वणिजं वदन्ति।।'


            सरल शब्दों में कहें तो जो व्यक्ति सिर्फ पद का आकांक्षी है और जिसका ज्ञान केवल धन कमाने के लिए है,वह ज्ञान का व्यापारी है।


         दूसरे शब्दों में कहें तो शिक्षक और पत्रकार दोनों कलम के सिपाही हैं, किंतु  कुछ का कलम जागरण के लिए चलता है जबकि कुछ का कलम सिर्फ धन कमाने के लिए।


                  विचार का बिंदु यह है कि अर्थ तो जीवन चलाने के लिए चाहिए चाहे वह शिक्षक हो या पत्रकार। प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा में 'गुरु' अर्थोपार्जन की चिंता से मुक्त होकर सिर्फ ज्ञानार्जन में इसलिए लगा रहता था कि समाज और सरकार उसे सारी सुविधाएं उपलब्ध करा देते थे। इसके बदले में वह अपने ज्ञान के द्वारा समाज और सरकार को इतनी बड़ी शिक्षा-सेवा देता था कि सबसे ऊंचा स्थान उसका था-


'बादशाहों का फकीरों से बड़ा रुतबा न था


उस समय धर्म और सियासत में कोई रिश्ता न था


शख्स वह मामूली लगता था मगर ऐसा न था


सारी दुनिया जेब में थी और हाथ में पैसा न था।'


             गुरु के पास पैसा न था किंतु उसका प्रभाव ऐसा था कि सम्राट भी अपने कुलगुरु की सलाह से ही कोई बड़ा निर्णय लेते थे।


              आज ऐसे गुरु तो बहुत कम बचे हैं किंतु शिक्षक हर जगह दिखाई देते हैं। ज्ञान प्रधान भारतीय संस्कृति में शिक्षक का भी बड़ा आदर रहा है। यद्यपि वे धन लेकर ज्ञान देते हैं किंतु धन उनके लिए साधन मात्र होता है और ज्ञान साध्य होता है।


               पाश्चात्य प्रभाव के कारण ऐसे शिक्षक समाज में बहुत हो गए जिनके लिए धन साध्य हो गया और ज्ञान साधन। बाजारवाद ने उस शिक्षक का और भी अवमूल्यन किया। अब शिक्षार्थी के जीवन से उसे कुछ लेना देना नहीं होता, वह उसे कुछ सूचनाएं देता है जिसके आधार पर परीक्षा पास करने की गारंटी होती है‌ और उसके बदले मोटी फीस वसूलता है। जो भी विद्यार्थी उसके यहां से परीक्षा पास कर जाता है,उसका बहुत ज्यादा प्रचार-प्रसार करके वह अन्य विद्यार्थियों को आकर्षित कर लेता है। इस प्रकार से शिक्षा एक उद्योग का रूप ले लेता है‌। शिक्षा की उद्योग नगरी को चलाने वाला मैनेजर होता है, टीचर नहीं।


          एक तरफ ज्ञान को पूर्ण समर्पित 'गुरु' और दूसरी तरफ शिक्षा को उद्योग बनाने वाले Manager cum teacher के बीच में सरकारी शिक्षक और अन्य प्रकार के शिक्षक आते हैं जो विद्यार्थी को सिर्फ शिक्षा ही प्रदान नहीं करते हैं बल्कि संस्कार देने की भी कोशिश करते हैं।


                जब शिक्षा को पूर्ण रूप से उद्योग बना दिया जाएगा तब शिक्षा जगत प्रतियोगितापूर्ण होने के कारण तनाव से भर जाएगा जिसके परिणामस्वरूप अवसाद और आत्महत्या की घटना घटने लगेगी। एक बच्चे की आत्महत्या से किसी भी शिक्षक की आत्मा कंप जाएगी लेकिन आज देखने में आ रहा है कि आत्महत्या की घटना बढ़ती जा रही है और शिक्षा को उद्योग बनाने वाली नगरी दिन दूना रात चौगुना अपनी आमदनी में इजाफा करती जा रही है।


             सरकारी शिक्षा की दशा बद से बदतर होती जा रही है, निजी शिक्षण संस्थान डमी बनते जा रहे हैं और कोचिंग संस्थान दिन रात फलते-फूलते जा रहे हैं।


             एक तरफ सरकारी शिक्षण संस्थान में सर्वाधिक योग्यता प्राप्त किए हुए प्रतियोगिता परीक्षा से चयनित शिक्षक गैर-शैक्षिक-कार्यों की अधिकता के कारण अपनी सार्थकता नहीं पा रहे हैं,दूसरी तरफ कम योग्यता से भी अच्छे परीक्षा परिणाम देकर निजी शिक्षण संस्थान सबको आकर्षित कर रहे हैं और तीसरी तरफ प्रतियोगिता परीक्षा को पास करने के लिए कोचिंग संस्थान सब की अंतिम मंजिल बनते जा रहे हैं।


                 ध्यान से देखने पर यही तीन स्तर आप पत्रकारिता में भी पा सकते हैं।


तिलक,गांधी,गणेश विद्यार्थी जैसे पत्रकारों ने समाज की चेतना को जगाने के लिए अपना सर्वस्व होम कर दिया।


            इनकी राह पर चलने वाले कुछ पत्रकार आज भी हैं जो अपनी योग्यता से धन तो कमा रहे हैं किंतु जनजागरण उनका साध्य है और धन साधन। वे सत्ता से साहस के साथ तीखे सवाल करते हैं और उसकी जिम्मेदारी सुनिश्चित करते हैं।


         लेकिन कुछ पत्रकार ऐसे भी हैं जिन्होंने साहसिक सवालों से मुख मोड़ लिया है और सत्ता की स्तुति द्वारा पद,पैसा,प्रतिष्ठा को साध्य बना लिया है। व्यवसायिकता के चरम जमाने में आज वस्तुस्थिति यह है कि


'जो बांटता फिरता था दुनिया को उजाले


उसके दामन में आज अंधेरे ही अंधेरे हैं।'


              उजाला फैलाना यदि साध्य है तो शिक्षक और पत्रकार दोनों ही मेरे लिए अमूल्य है। स्वतंत्रता की चेतना जगाने के लिए गुलामी के काल में जिन लोगों ने शिक्षण-संस्थान खोले ,उन्हीं लोगों ने कलम चलाकर अपनी पत्रकारिता द्वारा समाज को जागृत भी किया। अपना तन-मन-धन लगाकर उन लोगों ने शिक्षण संस्थान में पढ़ाया भी और पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखकर लोगों को जगाया भी।


                 आज मूल्यांकन का आधार बाहरी वैभव हो गया है, आंतरिक-मूल्य नहीं। इस कारण पढ़ाने वाले और पत्रकारिता करने वाले की संख्या बढ़ती जा रही है किंतु समाज सोता जा रहा है, मूल्यविहीन होता जा रहा है। हालात इतना गंभीर हो गया है कि सुप्रीम कोर्ट शिक्षा संस्थानों को अवसाद और आत्महत्या की घटना रोकने के लिए विशेष कार्य योजना बनाने का निर्देश दे रहा है।


              आज महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षक और पत्रकार का मूल्यांकन धन-पद-प्रतिष्ठा  के आधार पर होगा कि उसके आंतरिक-मूल्य के आधार पर। यदि धन-पद-प्रतिष्ठा,फॉलोअर्स,लाइक्स,व्यूज ही आधार हैं तो वे कौड़ियों के नहीं बल्कि करोड़ों के हैं किंतु मूल्यविहीन है। यदि मूल्यांकन का आधार आंतरिक-मूल्य और जनजागरण है तो वे दोनों अमूल्य हैं।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹