आकांक्षा की खुदकुशी
June 5, 2026/start
🙏जहां आकांक्षाएं कोख में ही मार दी जाती थीं,वहां आकांक्षाओं को अब बड़ी करके मरने पर मजबूर कर दिया जाता है-अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि😭
संवाद
"आकांक्षा की खुदकुशी"
आकांक्षा की खुदकुशी ने हिला कर रख दिया। इस शिक्षा व्यवस्था ने सारी आकांक्षाओं पर पानी फेर दिया। भारत रत्न कलाम साहब कहते हैं-'छोटा लक्ष्य एक अपराध है।' किंतु बड़े लक्ष्य बनाकर उसकी ओर बढ़ती हुई आकांक्षा को मंजिल मिले,इसके लिए व्यवस्था भी तो चाहिए। व्यवस्था तो ऐसी है कि-
'इक परिंद अभी आसमान में है
तीर हर शख्स की कमान में है।'
मां-बाप खून पसीने की गाढ़ी कमाई अपनी संतानों के सपनों को पूरा करने के लिए न्योछावर कर देते हैं।मेहनत मजदूरी करके एक एक पाई जोड़ते हैं ताकि बच्चों के पढ़ाई के खर्च की राशि पूरी की जा सके। बच्चा भी अपने मां-बाप के इस त्याग-तपस्या को देखता है तो नींद में भी अपने सपनों का पीछा करने लगता है।
'सपने वे नहीं होते जो नींद में आते हैं,सपने तो वे होते हैं जो नींद ही नहीं आने देते'-यह कलाम-आकांक्षा सपने रखने वाले की आंखों में दिन-रात तैरती रहती हैं। जैसे अर्जुन को सिर्फ चिड़िया की आंख दिखाई दे रही थी वैसे ही हर आकांक्षा को सिर्फ अपना लक्ष्य दिखाई देता है। वे अपने पाठ्यक्रम का सोते-जागते उठते-बैठते इतना अभ्यास कर लेती हैं कि उनको अपनी आकांक्षा पूर्ण होने का भरोसा आ जाता है। जब परीक्षा भी अपनी आकांक्षा के अनुकूल ही चली जाती है तो उनको परीक्षा परिणाम में अपनी आकांक्षा साकार होती हुई दिखाई देती है।
लेकिन जब उन्हें पता चलता है कि पेपर लीक हो गया है, पेपर सेट करने वाले प्रोफेसरों ने ही करोड़पति होने की आकांक्षा से पेपर को बेच दिया है और कई अमीर अभिभावकों ने उस पेपर को खरीद कर अपनी महत्वाकांक्षा को पूर्ण करने के लिए अपनी अयोग्य और आकांक्षाहीन संतानों को उपलब्ध करा दिया है तो इस व्यवस्था पर से उनका विश्वास उठ जाता है।
इस व्यवस्था पर से विश्वास उठ जाए और परम व्यवस्था का कोई दर्शन नहीं कराए तो आकांक्षा को खुदकुशी के अलावा अन्य कोई रास्ता दिखाई नहीं देता। मिसाइल मैन कलाम को भी भारतीय वायु सेना के पायलट बनने की अपनी बरसों की आकांक्षा टूटने पर खुदकुशी का विचार आया किंतु स्वामी शिवानंद की प्रेरणा ने उस परम व्यवस्था का दर्शन करा दिया जहां हर एक के साथ न्याय होता है। आकांक्षा टूटने का दर्द मैं भी जानता हूं किंतु मेरा सौभाग्य था कि क्रिकेट स्टार बनने की जब आकांक्षा टूटी तो रामकृष्ण मिशन आश्रम के संन्यासी ने समझाया कि इस जगत की व्यवस्था में भले ही अन्याय दिखता हो किंतु ऊपर वाले की परम व्यवस्था में न्याय ही न्याय है। बस अपना कर्म करते जाओ और अपनी आकांक्षा को एक नई दिशा दो। मुझे मालूम ही नहीं था कि ऊपरवाला इतना न्यायप्रिय और करुणावान है कि एक आकांक्षा टूटने पर दूसरी उससे बड़ी आकांक्षा को पूर्ण कर देता है।
आज की कोचिंग प्रधान शिक्षा व्यवस्था में सिर्फ महत्वाकांक्षा को हवा दी जाती है और कुछ महत्वाकांक्षाएं सफल भी हो जाती हैं। किंतु अपनी महत्वाकांक्षाओं के टूटने पर परमात्मा की ओर आंखें उठाने की आकांक्षा जगाने वाला दर्शन नहीं दिया जाता। क्यों कृष्ण ने अर्जुन को कहा कि कर्म में ही तेरा अधिकार है,फल में कभी नहीं? क्योंकि कर्म और फल के बीच में पेपर लीक वाली व्यवस्था भी है और भाग्य भी है जिस पर अपना अधिकार नहीं रहता। जब अपनी आकांक्षा पूरी नहीं हो रही हो तो समझो कि परमात्मा की आकांक्षा पूरी हो रही है। सारा भार अपने माथे पर लेने वाला टूट जाएगा-
'रामचंदु पति सो वैदेही,
सोवत मही विधि बाम न केहि'
अर्थात् राजा जनक की पुत्री सीता जिसके पति रामचंद्र थे उनको भी जंगल में जमीन पर सोना पड़ा, आखिर विधि या भाग्य किसके प्रतिकूल नहीं होता?
लेकिन हमारा वातावरण इतना प्रतियोगी रूप से विषाक्त बना दिया गया है कि चंद सफल महत्वाकांक्षा वालों का सब जगह फोटो छापा जाएगा, उन्हीं की चर्चा की जाएगी क्योंकि बाजार के लिए यही लाभ का सौदा है। ऐसे में जिसकी आकांक्षा टूट गई हो उसको जीने का सहारा देने के लिए अपना परिवार भी नहीं बचता। लेकिन बाजार से भी बड़ा और व्यापक परिवार है,समाज है। परिवार और समाज को सफलता के साथ सुफलता के मंत्र को भी महत्व देना होगा अन्यथा कुछ आकांक्षाएं खुदकुशी कर जाएंगी और बाकी आकांक्षाएं घुट घुट कर प्रतिपल मरती रहेंगी।
लाखों अभ्यर्थी बिठा दो और सीटें चंद हजार हों तो यह व्यवस्था जीने का इंतजाम कर रही है या मरने का? जब भारत में इतने डॉक्टरों की कमी है तो हमें मालूम ही नहीं चलता कि डॉक्टरी की पढ़ाई कराने वाले संस्थान इतने कम क्यों हैं और डॉक्टरी की फीस इतनी ज्यादा क्यों है? जो लाखों की कोचिंग फीस देकर और करोड़ों की कोर्स-फीस देकर डॉक्टर बन भी रहे हैं,क्या उनमें डॉक्टर का एक धड़कता हुआ
दिल होगा?
आकांक्षा ने तो खुदकुशी कर ली किंतु इस खुदकुशी के जिम्मेवार हम सभी हैं जो अमृतकाल की बातें तो करते हैं किंतु चारों ओर मरने के लिए विष की व्यवस्था कर रखी हैं-
'सुधा कल्पनामात्र, गरल का दावा सोलह आने सच है
कभी किसी ने चखा न देखा, केवल नाम चला आता है
पर विष बिकता चौराहे पर जो खाता है मर जाता है।'
आकांक्षा को सच्ची श्रद्धांजलि तो यह होगी कि भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुकूल एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था का निर्माण हो जिसमें हर किसी को जीने की आकांक्षा पैदा हो। ऐसा परिवार और समाज का वातावरण बने जो सफलता ही नहीं,सुफलता को भी महत्व दे। जीवन ऐसा बनाया जाए जिसमें सिर्फ प्रतियोगिता ही नहीं हो, प्रेम भी हो। अन्यथा कुछ आकांक्षाएं तो खुदकुशी करके मर जाएंगी किंतु बाकी आकांक्षाएं तिल तिल कर प्रतिपल मरती रहेंगी।
🙏ओम् शांति:शांति:शांति:🙏
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏😭