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🙏अपने आन-बान-शान के लिए प्रसिद्ध राजस्थान के झालावाड़ से बच्चियों को परिजनों द्वारा गिरवी रखने की घटना ने मानवता को शर्मसार कर दिया है-एक दृष्टि🔥


संवाद


'बच्ची गिरवी रखने की मानसिकता'


राजस्थान के झालावाड़ से बच्चियों को गिरवी रखने की खबर को जब पढ़ा तो एक तरफ 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' का सरकारी संकल्प आंखों में तैरने लगा तो दूसरी तरफ ऐसी सोच और कृत्य पर शर्म से आंखें झुक गईं। दलाल छोटी-छोटी बच्चियों को पीटते थे,नशा कराते थे और उनके साथ दुष्कर्म करते थे-समाचारपत्र के प्रथम पृष्ठ पर यह शीर्षक देखकर ऐसा लगा जैसे किसी ने मानवता के गाल पर थप्पड़ जड़ दिया हो। जब गिरवी रखने के सौदे के स्टांप पेपर और सौदे के दस्तावेज के बारे में जाना तो आईने के सामने जाने की हिम्मत नहीं हुई। एक मानवीय चेहरे के पीछे कितने चेहरे और कैसे विकृत चेहरे छिपे हुए हैं , दिलोदिमाग में घूमने लगा।


               कहां संविधान कहता है कि किसी भी आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा और कहां समाज में बच्ची के जन्म के साथ ही बोझ की भावना और भेदभाव हर जगह दिखाई पड़ जाएगा।आश्चर्य की बात है कि पुरुष प्रधान समाज में बच्ची को बोझ समझने की भावना जितना पुरुषों में है,उतना ही स्त्रियों में भी है।


             एक तरफ परंपरा में कन्या पूजन के प्रति भक्ति भावना को देखकर एक आध्यात्मिक संस्कृति की झलक मिलती है तो दूसरी तरफ व्यवहार में कन्या के प्रति भेदभाव और क्रूरता को देखकर मानसिक विकृति का सर्वत्र दर्शन होता है।


         सेक्स वर्कर के रूप में छोटी बच्चियों को गिरवी रखने की मानसिकता तो संवेदना और नैतिकता के लोप होने का संकेत देता है। जन्म देने की क्षमता तो कामवासना के कारण सभी जीवों को प्रकृति-प्रदत्त है किंतु मां-बाप होने की क्षमता तो उत्तरदायित्व भाव के कारण संस्कृति-प्रदत्त है। भारतीय संस्कृति में गृहस्थाश्रम को सबसे कठिन आश्रम माना गया है क्योंकि शिशु को जन्म देना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसे सुंदर जीवन देने पर ही मां-बाप का जीवन सार्थक माना गया है।


बचपन सुरक्षा,प्रेम और विश्वास की मांग करता है। जन्म देने वाले और सुरक्षा देने वाले लोग ही जब चंद रुपयों के बदले सौदा करने लगें तो यह सिर्फ आर्थिक अभाव का मामला नहीं है बल्कि हृदय के अभाव का और आत्मा के अभाव का भी मामला है। हृदयहीनता और आत्महीनता में ही कोई दरिंदों के हाथों में मासूम बच्चियों को सौंप सकता है। इतनी दरिंदगी झेलने के बाद बच्ची का व्यक्तित्व तो नशा, हिंसा और अनैतिकता का व्यापार फैलाने के काम ही आ सकता है।


ऐसी विकृत मानसिकता का समाधान सिर्फ कठोर कानूनों में तो नहीं है क्योंकि पोक्सो एक्ट जैसा कठोर कानून बनाया गया किंतु व्यभिचार और बलात्कार बढ़ता गया। संस्कृत के ऋषि कहते हैं- 'कामातुराणाम् न भयं न लज्जा' अर्थात् कामातुर व्यक्ति को भय और लज्जा नहीं होती।


फिर समस्या का समाधान किसमें है? समाधान है चेतना जगाने में। आज बच्चियां जीवन के हर क्षेत्र में अपना परचम लहरा रही है। उनकी इस सफलता के पीछे जगी हुई चेतना वाले मां-बाप और परिजनों का हाथ है। लेकिन ऐसी जगी हुई चेतनाएं बहुत कम हैं क्योंकि शिक्षा पर जैसा काम होना चाहिए था, वैसा नहीं हुआ।अशिक्षा,आर्थिक-असमानता और संवेदनहीनता ने समाज में कुछ लोगों को इतना मूल्यविहीन बना दिया है कि उन्हें यह भी नहीं मालूम कि वे क्या कर रहे हैं? कन्याओं का करुण क्रंदन मेरे व्यथित हृदय के शब्दों में कह रहे हैं-


'बाबुल तेरी बगिया में चहचहाना मैं भी चाहती हूं


प्यार के दो मीठे बोल तुतलाना मैं भी चाहती हूं।'


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹