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🙏भारतीय पुनर्जागरण का केंद्र बंगाल सत्य के प्रति बहुत जिज्ञासु रहा किंतु स्वतंत्रता के बाद सत्ता में वहां जो आए उन्होंने सत्य पर कम शक्ति पर ज्यादा भरोसा किया।फलत: सत्ता से हटते ही जनप्रतिनिधि वहां जनता से असुरक्षित महसूस करने लगे-एक विश्लेषण 🔥


संवाद


'सत्ता और सत्य'


बंगाल सत्ता और सत्य दोनों का प्रमुख केंद्र रहा है। अंग्रेजों ने बंगाल को राजधानी बनाया। 1772 से लेकर 1911 तक ब्रिटिश भारत की राजधानी के रूप में बंगाल सत्ता का प्रमुख केंद्र बना रहा। किंतु सत्ता से ज्यादा यह भूमि सत्य की प्यासी थी। इस कारण से भारतीय पुनर्जागरण का केंद्र बंगाल बना। आध्यात्मिक, साहित्यिक और राजनीतिक क्षेत्र में अद्भुत विभूतियों को इस धरती ने पैदा किया जिन्होंने पूरे भारत की चेतना को जगाने में और ऊंचा उठाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान दोनों इस धरती से गूंजे क्योंकि ऋषियों द्वारा दी गई राष्ट्र की सर्वश्रेष्ठ कल्पना का बीज यहां अंकुरित हो चुका था।


               किंतु स्वतंत्रता काल के बाद बंगाल की राजनीति में सत्ता का जो स्वभाव रहा, उसका सत्य से  नाता न रहा। सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए हर प्रकार के उपायों का सहारा लिया गया चाहे वे कानूनी हों या गैरकानूनी। राजनीतिक पार्टियों ने लोकतांत्रिक मर्यादा को ताक पर रखकर सत्ता पर अपनी पकड़ तो मजबूत कर ली किंतु जनता से दूर हो गई। सत्ताधारी पार्टी के पदाधिकारियों का एक ऐसा कैडर तैयार हुआ जिसने लोक और तंत्र के बीच एक दीवार खड़ी कर दी।


              सत्ता जब आलोचनाओं को सुनना बंद कर देती है और विपक्ष पर ध्यान नहीं देती तब जमीन पर पनप रहा वास्तविक असंतोष का उसे पता ही नहीं चलता। सत्ता विरोधी लहर जब अवसर पाती है तब सत्ताधीश को भी अनुमान नहीं होता है कि इतना गहरा असंतोष जनता में सुलग रहा था।


                जनता का असंतुष्ट होना तो समझ में आता है किंतु जब अपनी ही पार्टी के चुने हुए जनप्रतिनिधि भी पार्टी से अपना असंतोष प्रकट करने लगें तो किसी को समझ में नहीं आता।


सत्ता बदलना तो लोकतंत्र का स्वभाव है किंतु मूल्य बदलना तो लोकतंत्र का पतन है। जिस विचारधारा और मुद्दे के आधार पर जनता से आपने वोट मांगा था, उस विचारधारा या मुद्दे को छोड़ देना क्या जनमत का अपमान नहीं है? यदि यह जनमत का अपमान है तब आप जनप्रतिनिधि नहीं रहे और यदि यह जनमत का अपमान नहीं है तो फिर लोकतंत्र नहीं रहा।


                  सत्य से दूर होने के कारण जनप्रतिनिधि और लोकतंत्र दोनों खतरे में पड़ रहे हैं। यह बात सही है कि सत्ता रक्त संबंध ही नहीं जानती तो सत्य संबंध क्या जानेगी? किंतु यह भी बात सही है कि सत्य से दूर जाती हुई सत्ता अपनी वैधानिकता खोने लगती है और जाने अनजाने अराजकता को आमंत्रित करने लगती है।


        कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि सत्ता राजनीति का केंद्रबिंदु है जबकि सत्य धर्म का केंद्रबिंदु है। राजनीति और धर्म अलग-अलग रास्ते हैं उन्हें एक दूसरे से मिलाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। लेकिन जीवन में गहराई से देखने पर अनेक पहलू एक दूसरे से मिले हुए हैं। उनके बीच स्पष्ट विभाजन रेखा का खींचा जाना संभव नहीं है। इसलिए गांधी जैसे लोगों ने सत्य-प्रेम-अहिंसा को राजनीति में अपना आधार बनाया। इसके कारण गांधी की राजनीति इतनी प्रभावी हो गई कि किसी पद पर वे हों या न हों, उनकी बात का मूल्य होता था और जनता में उसका अपना प्रभाव होता था।


         आज बंगाल की सत्ता से हटने के बाद सत्ता में बैठे लोगों का जनता में प्रभाव कैसा है,यह दिखाई पड़ रहा है। जनता उन पर आक्रमण कर रही है और जनप्रतिनिधि अपनी जनता से ही असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। लोकतंत्र की परिभाषा लिंकन ने दी थी कि जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा‌  ;  लेकिन यह परिभाषा आज बेमानी हो गई है। आज के हालात के अनुसार एक नई परिभाषा गढ़ी जानी चाहिए। लोकतंत्र का मतलब जनता के लिए तो सिर्फ चुनाव रह गया है। उसके बाद जनता की कोई विशेष भूमिका नजर नहीं आ रही। चुने जाने के बाद जनप्रतिनिधि अपनी तरफ से एकतरफा निर्णय ले रहे हैं।


               सिर्फ सत्ता के लिए जब राजनीति होने लगती है तो सेवा गौण हो जाती है। जनसरोकार से दूर जाता हुआ लोकतंत्र सत्य से दूर होकर सत्ता तो प्राप्त कर लेता है किंतु अपना प्रभाव खो देता है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹