🙏ग्रीष्मावकाश के बीच कॉलेज में सेमेस्टर परीक्षा के प्रथम दिवस का अजीबोगरीब दृश्य 🔥


संवाद


'विद्यार्थी दिशाहीन,शिक्षक आत्महीन'


सेमेस्टर परीक्षा के लिए ग्रीष्मावकाश के बीच में कॉलेज में सभी को बुला लिया गया है। परीक्षा के प्रति जितनी सजगता अधिकारियों और कर्मचारियों की है, उतनी ही उदासीनता विद्यार्थियों की देखकर मैं आश्चर्यचकित हूं। एग्जामिनेशन के साथ एडमिशन के काम को गंभीरता से निपटाने के लिए प्राचार्य व शिक्षक जहां दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, वहां परीक्षार्थी बिना किसी तैयारी के देर-सवेर परीक्षा केंद्रों पर पहुंच रहे हैं।


             छात्राओं से मैंने जानना चाहा कि आधा घंटा बीत जाने के बाद भी परीक्षा-कक्ष में पहुंचने की तुम लोगों में हड़बड़ी क्यों नहीं दिखती? छात्राओं ने हंसते हुए जवाब दिया कि एक घंटे परीक्षा में बैठने के लिए भी हमारी तैयारी नहीं है, फिर हमारी परीक्षा तो तीन घंटे चलेगी। जब बहुत सारी छात्राओं ने परीक्षा रूम से जल्दी निकलने की इजाजत मांगनी शुरू की, तब मुझे वे शिक्षा व्यवस्था का मखौल उड़ाती दिखने लगीं।


           एक शिक्षक की पीड़ा आप समझ सकते हैं जब वह अपने विद्यार्थियों को परीक्षा कक्ष में देर से पहुंचते हुए देख रहा है और जल्दी निकलने की फिराक में उन्हें बेचैन पा रहा है। परीक्षा पुस्तिका में दी हुई प्रविष्टियां भी परीक्षार्थी को ठीक से भरना नहीं आ रहा है। कॉपी के अंदर लिखे हुए प्रश्नों के उत्तर तो पढ़कर परीक्षक भी हैरान-परेशान से हैं।


               कहां राष्ट्रीय शिक्षा नीति विद्यार्थियों में विवेक को जागृत करने और तर्क शक्ति को बढ़ाने के उद्देश्य से लाई गई थी और कहां विद्यार्थियों में अविवेक और अंधविश्वास बढ़ता दिखाई दे रहा है। कुछ परीक्षार्थियों से मैंने पूछा कि अपनी जिंदगी के साथ ऐसा खिलवाड़ क्यों कर रहे हो? परीक्षार्थियों ने कहा कि हमारा जनवरी मास इसके पहले के सेमेस्टर परीक्षा में गुजरा, मार्च महीने में विश्वविद्यालय की कानून परीक्षा कराने में पढ़ानेवाले लगे रहे, बीच-बीच में कॉलेज में प्रतियोगिता परीक्षा होती रही, किसी भी विषय में पाठ्यक्रम पूरा नहीं पढ़ाया गया, बाकी समय आंतरिक मूल्यांकन की परीक्षा देने में और ग्रीष्मावकाश में बीत गया। जिस प्रकार की शिक्षा दी जा रही है, उसी प्रकार की परीक्षा हम लोग दे रहे हैं; इसमें हमारा क्या कसूर है?


          परीक्षार्थियों की बात सुनकर मैं सोच में पड़ गया। उनकी बात में सच्चाई थी। कहां तो हम भारतीय ज्ञान परंपरा की बात करते हैं और कहां हमने पढ़नेवाले और पढ़ानेवाले के संबंध को छिन्न-भिन्न कर दिया है। सेमेस्टर परीक्षा प्रणाली में सतत मूल्यांकन का प्रावधान है किंतु मूल्यांकन तो दी गई शिक्षा का ही होगा न। जब शिक्षा ठीक से नहीं चल रही है तो हमें परीक्षा लेने का क्या अधिकार है? वार्षिक परीक्षा प्रणाली में पाठ्यक्रम बहुत हद तक पूर्ण होता था,सेमेस्टर परीक्षा प्रणाली में तो पढ़ाई ही गायब हो गई है।


         विद्यार्थी ही नहीं शिक्षक भी इस अजीबोगरीब शिक्षा के माहौल में अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। शिक्षक की सारी प्रतिष्ठा अपने ज्ञान और विद्यार्थी के कारण होती है। किंतु अपने ज्ञान को बांटने का उसे समय नहीं मिलता और विद्यार्थी से घनिष्ठ संबंध उसका नहीं बनता तो शिक्षक आत्महीन होता जाता है और विद्यार्थी दिशाहीन।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹