परीक्षा केंद्र दूर क्यों हो?
June 15, 2026/start
🙏5000 परीक्षार्थी की परीक्षा छूट गई क्योंकि परीक्षा केंद्र तक पहुंचने के लिए साधन उपलब्ध नहीं हुए। आखिर परीक्षा केंद्र निकटतम क्यों नहीं बनाते?-एक विचार 🔥
संवाद
"परीक्षा केंद्र दूर क्यों हो?"
बिहार की राजधानी पटना जंक्शन पर पांच हजार विद्यार्थी ट्रेन नहीं उपलब्ध होने के कारण अपनी सिपाही बहाली की परीक्षा से वंचित रह गए। बरसों की कठिन साधना के बाद परीक्षा के दिन एक ऐसा अवसर आता है जिसमें साधना का फल मिलने की उम्मीद होती है।
परीक्षार्थी किसी भी प्रकार का जोखिम लेकर परीक्षा केंद्र पर पहुंचने में जी जान लगा देते हैं। परीक्षा का एक मौका छूटना उनके लिए किसी सदमे से कम नहीं है। बेरोजगारी की भयावह स्थिति के बीच एक परीक्षा बेरोजगार के लिए ठीक वैसे ही है जैसे तपती दोपहरी में किसी प्यासे को एक बूंद पानी मिल जाए।
रात में जब इन परीक्षार्थियों के हाव-भाव में सपने टूटने का एहसास देखा, उनकी आंखों में नमी देखी तो अपना वह दिन याद आ गया जब इसी पटना जंक्शन से 12 घंटे दूर रांची में 'बिहार लोक सेवा आयोग' की प्राथमिक-परीक्षा(P.T) देने के लिए हम सभी परीक्षार्थी ट्रेन में ऊपर नीचे, यहां तक की इंजन के डिब्बे में भी, सभी जगह लदकर रांची परीक्षा देने पहुंच गए। बड़े कष्ट से जान की बाजी लगाकर परीक्षा देकर हम सभी साथी आ भी गए लेकिन उस यात्रा में कुछ परीक्षार्थी ट्रेन से गिरकर कट गए। जब यह खबर मिली तो हम सभी दहशत में थे और खतरे में भी थे क्योंकि ट्रेन पर जबरदस्ती चढ़ना गैर कानूनी था। लेकिन हम सब भी क्या करते अपना जीवन देखें कि कानून देखें।
उसी यात्रा में मेरे साथ यात्रा कर चुके मेरे एक प्रिय साथी आज टीवी पर बड़े पुलिस अधिकारी के रूप में उसी पटना जंक्शन पर परीक्षार्थियों के लिए कड़े संदेश और चेतावनी देते दिख रहे थे। उनके अनुसार दो ट्रेनों की व्यवस्था की गई थी। लेकिन विचारणीय प्रश्न यह है कि बेरोजगारों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि हमारी हर व्यवस्था फेल हो जा रही है जिसका परिणाम तोड़फोड़ और उपद्रव के रूप में सामने दिखाई पड़ रहा है, ऐसे में परीक्षा केंद्र दूर देने की जरूरत क्या है?
जो विद्यार्थी परीक्षा केंद्र पर पहुंचने के लिए कानून अपने हाथ में ले रहे हैं, अपनी जान की बाजी लगाने को तैयार हैं;क्या उनके दर्द को या मजबूरी को समझने का प्रयास हमें नहीं करना चाहिए। एक शिक्षक के रूप में मेरी अंतरात्मा रोती है क्योंकि उनके दर्द से गुजर कर भाग्य की अनुकूलता के कारण मैंने तो मंजिल पा ली, किंतु बहुत मेरे साथी थे जो ज्यादा प्रतिभा रखकर और ज्यादा परिश्रम करके भी भाग्य की प्रतिकूलता के कारण नौकरी पाने से वंचित रह गए। सरकारी नौकरी के अलावा अन्य विकल्प नहीं होने के कारण उनका जीवन बहुत मुश्किलों से घिर गया।
जिस युवा शक्ति पर भारत गर्व करता था,आज वही युवा शक्ति भारत के लिए सबसे बड़ी समस्या बन गई है। शिक्षा की बदतर स्थिति, रोजगार के विकल्पों का अभाव, दूरदर्शी योजना की कमी जैसे अनेक कारणों ने जीना मुश्किल बना दिया और मरना आसान बना दिया।
चीन की जनसंख्या हमसे भी ज्यादा थी किंतु चीन ने योजनाएं बनाई,विकल्पों को तैयार किया,जनसंख्या रोकने के उपाय किए और दूरदृष्टि का परिचय दिया जिसके परिणामस्वरूप चीन एक महाशक्ति के रूप में आगे बढ़ रहा है।
मैं तो इस लेख के माध्यम से पटना जंक्शन पर घटी घटना के बाद बड़े पुलिस अधिकारी के रूप में चेतावनी देने वाले अपने सहृदय साथी को याद दिलाना चाहता हूं कि अपने कर्तव्य का जरूर पालन करना किंतु उन दिनों को भी याद रखना जब हम सब ने भी अपनी परीक्षा नहीं छोड़ी थी। आज के बेरोजगार उस परवाने के समान हो गए हैं जो जानते हैं कि दीपक की चमक में आग भी है जो हमें जला देगी,फिर भी वे दीपक की लौ के पास जाते हैं-
'दीपक की चमक में आग भी है दुनिया ने कहा परवाने से
परवाने मगर ये कहने लगे दीवाने तो जलकर देखेंगे
तेरी याद में जलकर देख लिया अब आग में जलकर देखेंगे
इस राह में अपनी मौत सही यह राह भी चलकर देखेंगे।'
सरकारी कर्मचारी होने के नाते सरकार की मजबूरियां मैं समझता हूं किंतु एक शिक्षक होने के नाते विद्यार्थियों की या परीक्षार्थियों की बेचैनियां भी महसूस करता हूं।समस्या का समाधान परीक्षा केंद्र दूर रखने में नहीं है क्योंकि इससे अव्यवस्था बढ़ रही है। परीक्षा केंद्र निकटतम हो ताकि परीक्षार्थी सहूलियत से अत्यंत तनाव वाले समय में भी अपनी की गई तैयारी के अनुसार अपना सबसे अच्छा परफॉर्मेंस दे सकें। परीक्षा केंद्र पर पहुंचने में और उसके बाद परीक्षा केंद्र पर कड़ी जांच के नाम पर जो परीक्षार्थियों को झेलना पड़ रहा है ; उस कष्ट से अपने युवाओं को बचाया जा सकता है। पेपर लीक करने वाले चंद लोगों की गलती की सजा सभी परीक्षार्थियों को देना कहां तक न्यायोचित है? मुझे खबर मिली है कि
"एकमात्र नौजवान बेटा था
रोजगार पाने को सारी शक्तियां समेटा था
किंतु उसका परीक्षा केंद्र बहुत दूर था
इसलिए वह आज मरने को मजबूर था।"
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹