🙏21 जून योग,संगीत,नीट दिवस की शुभकामना🙏


'विश्व योग दिवस' और 'विश्व संगीत दिवस' 21 जून को मनाया जाता है और इसी दिन नीट परीक्षा भी है जिसके दबाव में बच्चे टूट रहे हैं। योग और संगीत उनको जीवन से जोड़ सकता है-एक दृष्टि🔥


संवाद


"जीवन में योग भी हो,संगीत भी हो"


भारतीय शिक्षा-व्यवस्था और परीक्षा-व्यवस्था के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर में 'योग' और 'संगीत' सबसे बड़ी आशा के केंद्र हैं।भारतीय संस्कृति की दृष्टि में योग और संगीत सिर्फ पढ़ने के विषय मात्र नहीं है बल्कि जीवन बदलने के आयाम हैं।


                 लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि सारी सुविधाओं के बावजूद इन दोनों महत्वपूर्ण विषयों को पढ़ने वाले छात्र बहुत कम हैं, फिर इनको जीवन में उतारने वाले तो और भी कम। यही कारण है कि आज की शिक्षा और परीक्षा के कारण अवसाद और आत्महत्या की संख्या बढ़ती जा रही है।


                विवेकानंद के शब्दों में मनुष्य में पहले से ही विद्यमान अंतर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति ही शिक्षा है। मेरी नजर में योग और संगीत ये दो माध्यम हैं जिनसे मानव अपने सच्चिदानंद स्वरूप को प्राप्त कर सकता है। आखिर किसी योगी और संगीतज्ञ को ऐसा क्या मिल जाता है कि वह पहाड़ की गुफाओं में अकेले में भी आनंद से भर जाता है जबकि आज सारी सुख-सुविधाओं के बीच अवसाद और आत्महत्या से लोग मर रहे हैं।


            योग आत्मनियंत्रण सिखाता है और संगीत आत्माभिव्यक्ति। मानव के व्यक्तित्व में मन सबसे महत्वपूर्ण है। मन यदि स्वस्थ हो तो अनियंत्रित नहीं हो सकता और उसे अभिव्यक्ति की कला आ जाए तो परमुखापेक्षी नहीं हो सकता। योगियों और संगीत-प्रेमियों ने अपने अंदर ही ऐसा हीरा पा लिया कि झोपड़ी में भी निर्जन स्थान में उनसे आनंद झरे और गीत फूट पड़े। आज की मूल समस्या यही है कि अपने अंदर के हीरे को हम विस्मृत कर बैठे हैं। योग और संगीत सिखाते हैं कि


'अपने मन में डूब कर पा जा सुरागे जिंदगी


तू मेरा नहीं बनता  न बन , अपना तो बन।'


            महर्षि पतंजलि ने चित्तवृत्ति निरोध को योग कहा है। आज मन की चंचल वृत्तियां अनियंत्रित हो गई हैं जिसके कारण तनाव सीमा के पार चला गया है। परीक्षा में पास नहीं होंगे तो क्या होगा,फिर जीवन का क्या होगा-ऐसी नकारात्मक भावनाओं और कल्पनाओं ने जीवन जीना मुश्किल कर दिया है। जावेद अख्तर कहते हैं-


"क्यूं डरें जिंदगी में क्या होगा


  कुछ न होगा तो तजुर्बा होगा।"


'योग' यही कहता है कि साक्षी भाव में प्रतिष्ठित हो जाओ फिर जो भी होगा देखा जाएगा।


         'संगीत' उस नाद ब्रह्म को सुनने और अभिव्यक्त करने की कला है जो हमारे अंदर में गुंजायमान हो रहा है। फिर जीवन की बिखरी हुई कड़ियां जुड़ जाती हैं। अभी तो जीवन बिखरा हुआ है-


"बिखरे हुए पड़े हैं अक्षर,बिखरी हुई पड़ी है कड़ियां


बिखरे हुए पड़े हैं मोती, बिखरी हुई पड़ी है लड़ियां।"


         आज की महत्वाकांक्षापूर्ण और व्यावसायिकतापूर्ण शिक्षा इस बात पर ध्यान ही नहीं दे रही है कि जीवन की बिखरी हुई कड़ियों का और लड़ियों का कैसे चयन किया जाए और उन्हें पिरोकर कैसे एक माला बना दिया जाए।


'इन कड़ियों का इन लड़ियों का कुछ भी चयन नहीं कर पाए


तुम अध्ययन नहीं कर पाए, तुम अध्ययन नहीं कर पाए।'


           21 जून को मनाए जाने वाले 'विश्व योग दिवस' और 'विश्व संगीत दिवस' एक शुभ अवसर है जब हम भारतीय ज्ञान परंपरा की उन गहराइयों और ऊंचाइयों से जुड़ सकते हैं जो योग और संगीत के माध्यम से व्यक्त हुई और जिसके कारण भारत कभी विश्वगुरु बना था।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹