सफलता नहीं सुफलता
June 23, 2026/start
🙏री-नीट में छात्रा अंडरगारमेंट्स में मोबाइल रखकर पहुंच जाती है, ऐसे में मानसिकता और नैतिकता पर एक दृष्टि🔥
संवाद
"सफलता नहीं सुफलता"
सरकार की विशेष निगरानी और सेना की तैनाती के बावजूद कोई छात्रा अंडरगारमेंट्स में मोबाइल लेकर जयपुर जैसे मुख्य केंद्र पर री-नीट परीक्षा में पहुंच जाती हो और परीक्षा खत्म होने से 15 मिनट पहले पकड़ी जाती हो तो शिक्षा-व्यवस्था, युवा-मानसिकता और नैतिक-मूल्य पर गंभीर चिंता एवं चिंतन लाजमी है।
साध्य में यदि आसक्ति इतनी ज्यादा हो जाए कि साधन की कोई परवाह नहीं हो तो पतन निश्चित है। संसद से लेकर सड़क तक यह पतन दिखाई दे रहा है। जिनके पेट भरे हुए हैं और जो समाज का नेतृत्व कर रहे हैं,वे जब मूल्यों की चिंता नहीं कर रहे हैं तो जहां पापी पेट का सवाल है वहां मूल्यों की चिंता क्यों कर होगी।
साधन उतना ही पवित्र होना चाहिए जितना कि साध्य ऐसा गांधी मानते थे। भारतीय संस्कृति की गहरी दृष्टि कहती है कि बोये पेड़ बबूल के आम कहां से होय। लेकिन साध्य को ही सर्वेसर्वा मानने वाले लोगों ने गलत साधनों से बड़े साध्य प्राप्त करके एक भ्रम का वातावरण पैदा कर दिया। ऐसे लोगों की बाहरी सफलता तो सारी दुनिया को दिखाई देती है किंतु उनकी आंतरिक पीड़ा और अंजाम सबको दिखाई नहीं देता।
गलत साधनों से नौकरी प्राप्त करने वाले कई लोग कई वर्षों के बाद अब पकड़े जा रहे हैं। उनकी नौकरी तो छूट ही रही है और लिए गए वेतन की वसूली भी हो रही है, साथ ही जेल भी। उन्होंने गलत तरीके से नौकरी प्राप्त करने में लाखों गंवाए, उसके बाद सत्य कहीं खुल न जाए इस डर में सदैव चिंता और तनाव में रहे। कुछ दिनों के सुख के बाद सत्य खुलने पर मुसीबतों का पहाड़ उन पर टूट पड़ा। शादी हो गई थी,बाल-बच्चे हो गए थे,जिम्मेदारी बढ़ गई थी; ऐसी स्थिति में घर के कर्णधार को यदि जेल हो जाए तो कितनी जिंदगियां प्रभावित होती हैं।
लेकिन आज प्रतिस्पर्धी शिक्षा व्यवस्था में परीक्षा जीवन-मरण का प्रश्न बना दिया गया है। समाज सिर्फ सफलता देखता है और असफलता को एक कलंक बना दिया गया है। परिणामस्वरूप सफलता को किसी भी कीमत पर प्राप्त करने के लिए एक अंधापन छा गया है। कोचिंग संस्कृति और पेपर लीक वाली व्यवस्था ने अंधेपन को इस हद तक पहुंचा दिया है कि प्रतिभा और परिश्रम से भरोसा टूट गया है और जुगाड़ पर विश्वास बढ़ गया है।
विद्यालयों में चरित्र निर्माण वाली शिक्षा को गौण करके सफलता की 100% गारंटी देने वाली कोचिंग संस्कृति ने महत्वाकांक्षाओं को बहुत ज्यादा हवा दे दिया और पैसे के खेल ने वातावरण में ऐसा विष घोल दिया कि मुन्ना भाई एमबीबीएस आज नई पीढ़ी के आदर्श बन गए हैं।इसका परिणाम यह आ रहा है कि जम्मू कश्मीर के अनंतनाग सरकारी मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों ने सरकारी योजना का फायदा उठाने के चक्कर में 27 मरीजों को पेसमेकर लगा दिया जबकि उन मरिजों का दिल ठीक था।
डॉक्टर और शिक्षक को भगवान का दर्जा दिया जाता है किंतु भगवान का साध्य सिर्फ पैसा या सिर्फ सफलता हो तो नैतिक मूल्य समाज में कहां टिकेंगे। भारतीय संस्कृति ने सुफलता को साध्य बनाया था, सफलता को नहीं। सुफलता का मतलब है कि जीवन रूपी वृक्ष पर कैसा भी विषफल नहीं लग जाए बल्कि फल अमृत के समान हो। सुफल कहता है कि गलत रास्तों से स्वर्ग भी मिलता हो तो हमें वहां नहीं जाना है। 'सत्यमेव जयते' को भारत का राष्ट्रीय वाक्य बनाया गया है,इसका मकसद यही है कि असत्य साधनों से सत्य साध्य 'जय' की प्राप्ति नहीं होती। सत्य के रास्ते पर असफल हो जाने पर भी जीवन सुफल और सार्थक हो जाता है और असत्य के रास्ते से सफल हो जाने पर भी जीवन निष्फल और निरर्थक हो जाता है। चुनाव आपका है कि सफलता चाहिए या सुफलता।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹