तब की सिया और अब की सिया
June 26, 2026/start
🙏आज की सिया ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने मंगेतर की हत्या कर दी। यह सिर्फ उसके लिए ही नहीं बल्कि पूरे परिवार के लिए एक अमिट कलंक दे गया और समाज के लिए एक चिंता एवं चिंतन का विषय: एक दृष्टि😭
संवाद
"तब की सिया और अब की सिया"
सियाराम दांपत्य-जीवन के लिए भारतीय संस्कृति के आदर्श हैं। एक दूसरे के लिए जो प्रेम और समर्पण इनमें देखा गया, उसी के आधार पर गृहस्थाश्रम सफल और सुफल होता है। दोनों की जिंदगी में दूसरा कोई ख्याल में भी नहीं आया। वनवास राम को हुआ था, सिया को नहीं लेकिन सिया ने उनके साथ वन जाना कबूल किया।राम ने बहुपत्नी-प्रथा वाले जमाने में एक पत्नीव्रत लिया था। फिर भी उस प्राणप्रिया सिया की अग्नि-परीक्षा ली गई और निर्वासित भी किया गया। वह निर्वासन किसी और को लाने के लिए नहीं बल्कि राजधर्म के पालन के लिए था।
आज तो राम ही नहीं,सिया भी ऐसी मिलने लगी है जिसे जानकर भारतीय समाज की हिलती हुई नींव जड़ मूल से उखड़ने लगी है। आज की सिया (गोयल) ने अपने प्रेमी चेतन चौधरी के साथ मिलकर अपने होने वाले पति केतन अग्रवाल के साथ जो किया, वह दिल दहलाने वाला तो है ही, उससे ज्यादा मन के एक नए विकृत रूप के बारे में जिज्ञासा जगा देता है। शातिर 'सिया' का मन परिवार द्वारा तय किए गए रिश्ते को एक तरफ आगे बढ़ाता जा रहा था और दूसरी तरफ अपने मंगेतर को खत्म करने की योजना भी बनाता जा रहा था। जब तक सिया की योजना अंतिम अंजाम तक नहीं पहुंच गई तब तक किसी को उस पर शक तक नहीं हुआ।
किसी के प्रेम में पड़ना कोई अपराध नहीं किंतु उस प्रेम को दूसरी जगह शादी की चर्चा किए जाने के वक्त भी परिवार से छुपा कर रखना तो अपराध है, फिर किसी के साथ शादी का कदम बढ़ा देना और मंगेतर को अपने प्रेमी के साथ मिलकर रास्ते से हटाने का संकल्प बना लेना तो बहुत बड़ा अपराध है।
यहां यह समझना आवश्यक है कि प्रेम के नाम से स्वतंत्रता का आभास होता है और शादी के नाम से बंधन का।शादी के कार्ड पर भी छपा रहता है कि वर वधू विवाह बंधन में बंधने जा रहे हैं। स्वतंत्रता सबको पसंद है और बंधन किसी को नहीं। इसलिए प्रेम के रास्ते पर सब बढ़ जाते हैं किंतु शादी के बंधन से कतराते हैं। इस सोच के चलते लिव इन रिलेशनशिप बढ़ते जा रहे हैं और लोग शादी से कतरा रहे हैं।शादी के बंधन भी कमजोर पड़ते जा रहे हैं और विवाहेतर संबंध बढ़ते जा रहे हैं।
भारतीय समाज में जहां शादी कई जन्मों का साथ माना जाता है, वहां पर अब यही बात डराने लगी है क्योंकि लोग इस जन्म में ही एक दूसरे से छुटकारा चाहने लगे हैं जो कि आसानी से नहीं मिलती है। अमेरिकी समाज में जितनी आसानी से शादी होती है, उतनी ही आसानी से तलाक भी हो जाता है, इस कारण से उस व्यवस्था को ज्यादा प्रोग्रेसिव माना जाता है।
लेकिन गहरी दृष्टि वाले भारतीय विवाह व्यवस्था का अनुमोदन करते हैं। ऋषियों की मानें तो विवाह एक ऐसा बंधन है जिसमें प्रेम के कारण दोनों (पति-पत्नी) इससे बाहर नहीं निकलना चाहते। जिस प्रकार से काठ के बक्से को छेद करके बाहर निकल जाने वाला भंवरा (भृंग) रात भर फूल की कोमल पंखुड़ियों में बंद रहता है, इसी प्रकार से प्रेम के कारण लोग परिणय बंधन से मुक्त होना नहीं चाहते हैं।
अमेरिकी समाज के संबंध में जो नए रिसर्च आ रहे हैं,वे बता रहे हैं कि वहां की विवाह व्यवस्था संतति के लिए घातक साबित हुई है। भारतीय संस्कृति की दृष्टि में गृहस्थाश्रम का मूल उद्देश्य यौन-इच्छाओं की तृप्ति नहीं बल्कि सृष्टि-क्रम को आगे बढ़ाना है। इसलिए यहां पर विवाह स्त्री पुरुष के मिलन से ज्यादा दो आत्माओं व दो परिवारों के मिलन के रूप में स्वीकार किया गया है और मरने के बाद भी संतति के रूप में जीवन को अमर बनाने की धारणा से जुड़ा हुआ है।
स्त्री पुरुष के संबंध का आधार यदि सिर्फ शारीरिक हो तो यह पशुता से ज्यादा नहीं है। हमारे सोलह संस्कारों में गर्भाधान संस्कार इत्यादि के द्वारा स्त्री पुरुष के संबंध को दिव्यता प्रदान की गई है ताकि आने वाली संतति दैवीय गुणों से युक्त हो। उन सारे संस्कारों का निर्वाह कर पाना आज संभव नहीं है किंतु उन संस्कारों का महत्व नजरअंदाज कर देना भी शुभ नहीं है। किसी भी कर्म में प्रवेश करने के पहले आपके मन के भावों का बहुत व्यापक असर होता है। गर्भाधान संस्कार की महत्ता इस बात में छिपी है कि सेक्स-संबंध को सृष्टि-प्रक्रिया से जोड़कर देखा गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो एक क्षणिक संबंध को स्थायी संबंध की गौरव गरिमा प्रदान की गई है, क्षुद्र को विराट बनाया गया है।
इसी प्रकार गृहस्थ-आश्रम को चारों आश्रमों में सबसे महत्वपूर्ण आश्रम माना गया है क्योंकि ब्रह्मचर्य,वानप्रस्थ और संन्यास ये तीनों ही आश्रम गृहस्थ-आश्रम से ही भरण-पोषण पाते हैं। हमारे उपनिषद के अधिकांश ऋषि गृहस्थी थे,जिन्होंने प्रेमपूर्ण दांपत्य जीवन में रहकर ज्ञान को सर्वाधिक ऊंचाईयां दी। उनके अनुसार यह जीवन कई प्रकार के ऋणों से मुक्ति के लिए बना है। शिशु को जन्म दिए बिना आप पितृ-ऋण से मुक्त नहीं हो सकते, विद्यादान दिए बिना आप ऋषि-ऋण से मुक्त नहीं हो सकते इत्यादि।
आज की रिलेशनशिप सिचुएशनशिप में तब्दील होती जा रही है। एक दूसरे के साथ में रहकर एक दूसरे का उपयोग कर लो और फिर भूल जाओ। 'यूज एंड थ्रो' की पश्चिमी-मानसिकता मानव को पशुता पर ला रही है। पूरब की मानसिकता यह है कि हर व्यक्ति स्वयं में साध्य है, अतः किसी को भी साधन नहीं बनाना है। जीवन के रास्ते पर जब कभी मिले तो उसके संग साथ रहकर जिम्मेदारियों को निभाना है और अपने रिश्तों को दिव्यता प्रदान करनी है।
आज की सिया (गोयल) ने जीवन की परिभाषा गलत कर ली जो सिर्फ उसके लिए ही नहीं वरन् पूरे परिवार के लिए सदा सदा के लिए एक कलंक दे गया, मंगेतर केतन के परिवार को एक ऐसा दर्द दे गया जो कभी भुलाए नहीं भूला जा सकता और पूरे समाज को ऐसा झकझोर गया कि रिश्तों पर नए सिरे से पुनर्विचार होने लगा है-
'कैसा एहसान कर गए रिश्ते
जिस्म से जान तक उतर गए रिश्ते।'
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹