नियम की दरकार और करुणा की गुहार
June 28, 2026/start
🙏री-नीट में बाप-बेटी पर क्यूं भारी पड़ा 2 मिनट का विलंब-एक विश्लेषण 😭
संवाद
'नियम की दरकार और करुणा की गुहार'
री-नीट परीक्षा में दो मिनट देरी से पहुंचने वाले बाप और बेटी की मिन्नतें व गुहार को संतरी ने समय का हवाला देकर अनसुना कर दिया। गरीब-बाप का बेटी को डॉक्टर बनाने का अमीर-ख्वाब प्रवेश नहीं मिलने से टूट गया। हताश-निराश बाप जमीन पर गिर गया और बेटी उससे लिपट कर रोने लगी। शिक्षा-संस्थान के प्रवेश द्वार पर खड़े संतरी को सिर्फ समय की सुई दिखाई दे रही थी।काश!वहां कोई शिक्षक होता तो उस असाधारण-परिस्थिति और अदृश्य-मन:स्थिति को भी देख लेता जिससे संवेदनहीनता का सवाल खड़ा नहीं होता।
एक ऐसे विशेष समय में जब पेपर लीक के कारण परीक्षार्थी आत्महत्या कर रहें हों, तब समय का पाठ पढ़ाने की जरूरत थी कि संवेदनशीलता दिखाने की? जब सरकार से नियम पालन में चूक हो सकती है तो असाधारण स्थिति में परीक्षार्थी से समय पालन में क्या चूक नहीं हो सकती? क्या नियम इतने महत्वपूर्ण हैं कि किसी की जिंदगी को ताक पर रख दिया जाए?
ऐसे कई प्रश्न मेरे दिलोदिमाग में घूमने लगे जब प्रवेश द्वार के सामने ही जमीन पर गिरे हुए बाप से लिपट कर रोती हुई बेटी का भावुक वीडियो मैंने देखा। रोजाना ₹300 कमाने वाले पिता ने बेटी को डॉक्टर बनाने का एक बड़ा सपना देखा।वे दोनों 70 किलोमीटर की यात्रा कर परीक्षा केंद्र पर पहुंच भी गए किंतु गेट पर पहुंचने में दो मिनट देर हो गई। ऐसे ही नाजुक क्षण में संतरी और शिक्षक की सोच का अंतर पता चलता है।
परीक्षा में कोई कदाचार नहीं हो, इसके लिए नियम बहुत सख्त बनाए जाते हैं किंतु परीक्षाकेंद्र पर केंद्राधीक्षक को अपने विवेक का प्रयोग करते हुए नियमों के दायरे में सुव्यवस्थित परीक्षा कराने की जिम्मेदारी भी दी जाती है।
केंद्राधीक्षक के रूप में मेरा अनुभव रहा है कि किसी बंद कमरे में किसी बोर्ड द्वारा बनाए गए नियमों को परीक्षा केंद्र पर व्यवहार में लाते समय केंद्राधीक्षक को कुछ नियमों में ढील देनी पड़ती है और कुछ नियमों में विशेष सख्ती बरतनी पड़ती है तब जाकर परीक्षा आयोजन सफल होता है।
उदाहरण के तौर पर ठीक समय पर गेट लगाने का निर्देश गेट पर खड़े संतरी को केंद्राधीक्षक के रूप में मैं अवश्य देता हूं किंतु यह भी समझा देता हूं कि कोई भी विद्यार्थी यदि लेट होता है तो उसको बिना मुझसे पूछे लौटाया नहीं जाए।अधिकांश मौके पर समय की सख्ती बताने के बावजूद संवेदनशीलता दिखाते हुए परीक्षार्थी को समय सीमा के बाद भी विशेष जांच से गुजारकर प्रवेश देना पड़ता है। दो-चार मिनट के समय की पाबंदी से ज्यादा संवेदनशीलता महत्वपूर्ण है जिसके कारण परीक्षार्थी का साल बर्बाद होने से और जीवन को अंधेरे में जाने से रोका जा सके।
नियम महत्वपूर्ण है किंतु नियम से भी ज्यादा महत्वपूर्ण वह नीयत है जो परीक्षा को पारदर्शितापूर्ण और संवेदनापूर्ण दोनों बनाती हैं। तभी तो कुछ नियमों का विरोध किए जाने पर बाद में उन नियमों में बदलाव कर दिए जाते हैं। नियमों का आखिर उद्देश्य तो यही है कि निष्पक्ष, साफ-सुथरे और संवेदनशील तरीके से परीक्षा करा ली जाए।
नियम को जब धरातल पर लागू किया जाता है तब पता चलता है कि उसकी सीमाएं क्या है,तब विवेक महत्वपूर्ण हो जाता है। एक दो उदाहरण से इसे समझें। नई शादीशुदा एक लड़की मंगलसूत्र हटाने को तैयार नहीं थी और पुलिस टीम मंगलसूत्र हटाने पर अड़ी थी। केंद्राधीक्षक के रूप में निर्णय की जिम्मेदारी मेरी थी और मैंने परीक्षार्थी की दृढ़ धारणा और भावना को देखते हुए मंगलसूत्र पहनकर परीक्षा देने की इजाजत दी। आखिर जनेऊ जैसे मामले में भी तो नियम में संशोधन करना पड़ा।
इसी प्रकार से ठंड के दिनों में ड्रेस कोड के पालन में शिथिलता बरतनी पड़ती है क्योंकि नियम का अक्षरशः पालन कराने पर परीक्षार्थी की शारीरिक और मानसिक स्थिति प्रभावित होती है और यदि नियमों की अनदेखी की जाए तो कदाचार का खतरा रहता है।
परीक्षार्थियों पर परीक्षा का तनाव रहता है और उसके ऊपर से जांच की कड़ाई से तनाव और बढ़ जाता है। परीक्षा में हो रही धांधली को देखते हुए नियम और अनुशासन का कड़ाई से पालन जरूरी है, किंतु कई परीक्षा केंद्रों पर प्रवेश करने के बाद उनके बैठने की समुचित व्यवस्था तक नहीं होती। ऐसे में परीक्षार्थियों के साथ पुलिसिया-व्यवहार नहीं बल्कि शिक्षकीय-व्यवहार चाहिए जो उनको सहज और तनावमुक्त बना सके ताकि वे अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकें।
इस संदर्भ में बुद्ध का मध्यममार्ग हमारा मार्गदर्शक बन सकता है जो बताता है कि वीणा के तार को इतना भी मत कसो कि वह टूट ही जाए और इतना भी ढीला मत छोड़ो कि उससे संगीत ही न निकले। नियमों का पालन परीक्षा केंद्रों पर जरूरी है किंतु नियमों के कारण परीक्षार्थी की जिंदगी प्रभावित न हो यह उससे भी ज्यादा जरूरी है। इसके लिए शिक्षकीय विवेक को तरजीह देना ही समस्या का समाधान है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹