🙏राम मंदिर में दान की चोरी से आस्था के खंडित होने का प्रश्न-एक दृष्टि🔥


संवाद


'राम नाम की लूट है'


राम मंदिर में दिए गए दान की चोरी से हृदय अवश्य आक्रोशित है किंतु आस्था अडिग है। मेरे बाबूजी के नाम में 'राम' शब्द था यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, मेरे लिए जीवन का यह अनुभव सबसे महत्वपूर्ण है कि राम नाम की शक्ति से उन्होंने जीवन की कठिन से कठिनतम परिस्थितियों में भी भगवान के प्रति अपनी आस्था नहीं खोई। जब कभी परिवार में सुख मिलता तो वे इसको राम-कृपा कहते थे और जब कभी दुख मिलता तो अपने कर्मों का फल मानते थे। मुझे यह बात उस समय समझ में नहीं आती थी कि सुख का श्रेय राम जी को दिया जाए और दुख का भार अपने कर्मों पर डाला जाए। लेकिन एक राम भक्त हिंदू के सोचने का ढंग यही था। बाद में मुझे राम भक्त बनादास की पंक्तियां पढ़ने को मिली-


'सुख होवे सो हरि कृपा, दुख करमन का भोग


बनादास  यों  मारिए  मन  मूरख  का  रोग।'


             तब मेरे समझ में आया कि सफलता का श्रेय राम जी को देने से अहंकार पैदा नहीं होता और असफलता का भार अपने कर्मों पर लेने से उत्तरदायित्वविहीनता नहीं आती। राम का पूरा जीवन अहंकारविहीन और उत्तरदायित्वपूर्ण था।


                 राम मंदिर में चोरी की घटना से दुख इस बात का हो रहा है कि जिस राम दरबार से मुक्ति चुराई जा सकती थी,उस राम दरबार से कुछ लोग ठीकरे चुरा रहे थे-


'जाकी रही भावना जैसी,


प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।'


                 रहस्यदर्शी ओशो कहते हैं कि धन के पीछे व्यक्ति तब तक भागता है जब तक उसे परमधन दिखाई नहीं पड़ जाता।


               आधुनिक शिक्षा ने बुद्धि तो बहुत बढ़ा दी किंतु हृदय बहुत छोटा कर दिया। इसके कारण दिखाई देने वाली चीजें धन,पद,प्रतिष्ठा तो बहुत महत्वपूर्ण हो गई हैं किंतु न दिखाई देने वाली चीज राम-कृपा महत्वहीन हो गई है। राम नाम से धन-पद-प्रतिष्ठा चाहने वाले पढ़े-लिखे बुद्धिप्रधान आज के लोगों से उस जमाने का बेपढ़ालिखा हृदयप्रधान केवट भी मुझे बहुत आगे की सोच रखने वाला दिखाई देता है जिसने राम से नदी पार उतराई में ठीकरे नहीं मांगे बल्कि मुक्ति मांगी-


'केवट ने कहा रघुराई से,उतराई न लूंगा हे भगवन,


मैं नदी नाल का सेवक हूँ,तुम भवसागर के स्वामी हो,


मैं यहाँ पे पार लगाता हूँ,तुम वहाँ पे पार लगा देना,


केवट ने कहा रघुराईं से,उतराई न लूंगा हे भगवन ॥'


                  लौकिक राम अयोध्या के राजा दशरथ के बेटे हैं किंतु अलौकिक राम घट-घट में लेटे हैं। सबके अपने-अपने राम हैं और सबकी अपनी-अपनी मांग है। जिस राम-कृपा से जीवन की सार्थकता पाई जा सकती है उस राम मंदिर से कुछ लोगों ने ठीकरे चुराकर जीवन की निरर्थकता पा ली, उनसे ज्यादा दरिद्र और अभागा कौन?


              रामकृष्ण परमहंस कहते थे कि चील आकाश में उड़ता है लेकिन उसकी नजर एक बिल से निकलने वाले चूहे पर होती है। एक पुजारी रामकृष्ण हुए जिनकी भगवद्भक्ति से जगत को विवेकानंद प्राप्त होते हैं और दूसरे पुजारी दान चुराने वाले हैं जिनके कर्मों से आस्था का केंद्र रामलला का मंदिर भी विवाद का केंद्र बन गया है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹