नवीन शिक्षा-सत्र की चुनौती
July 4, 2026🙏नवीन शिक्षा-सत्र की शुभकामना🙏
संवाद
'नवीन शिक्षा-सत्र की चुनौती'
नवीन-सत्र का प्रारंभ विद्यार्थियों और शिक्षकों के विशेष उत्साह के साथ विशेष हो गया है। कॉलेज में विद्यार्थी अपनी क्लास के लिए आने लगे हैं और शिक्षक भी पढ़ाने के लिए मचलने लगे हैं। किंतु 10 जुलाई तक विश्वविद्यालय की परीक्षा संपन्न होनी है। फिर एक सप्ताह के लिए प्रतियोगिता-परीक्षा के आयोजन में कॉलेज व्यस्त हो जाएगा। इसके अतिरिक्त अन्य गैर शैक्षिक कार्य भी प्रमुखता से संपन्न करना होता है।
यदि 30 दिवस में से चार दिवस रविवार का निकाल दिया जाए और लगभग 20 दिवस परीक्षाओं के लिए समर्पित कर दिया जाए तो क्लास के लिए कितने दिवस शेष बचते हैं,यह विचार का विषय है।
आखिर हमारी प्राथमिकता में क्या है? यदि विद्यार्थी का जीवन हमारी प्राथमिकता में है तो क्लास को सर्वाधिक महत्व देना होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कई नए बदलाव विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए किए गए हैं जिसमें नया पाठ्यक्रम,नई सेमेस्टर परीक्षा पद्धति और सतत आंतरिक मूल्यांकन इत्यादि।
हमारा उद्देश्य कितना भी ऊंचा हो किंतु हम व्यवहार में यदि उस तरफ कदम नहीं बढ़ाते हों तो वही उद्देश्य हमारे लिए वरदान की जगह अभिशाप बन जाता है। हमारी प्रार्थना है 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' किंतु हमारा कदम सूरज के विपरीत दिशा में बढ़ रहा है तो प्रकाश हमें उपलब्ध नहीं होगा।
जिस शिक्षा और परीक्षा के कारण भारत कभी विश्वगुरु बना था, उस शिक्षा और परीक्षा का उपयोग हम इस तरह कर रहे हैं कि भारत विद्यार्थियों के अवसाद और आत्महत्या का केंद्र बनता जा रहा है। आखिर वृक्ष अपने फल से जाना जाता है। जिस वृक्ष पर अमृत फल लग रहें हों, वहां तो चारों तरफ जीवन ही जीवन दिखाई देगा। किंतु जहां चारों तरफ अवसाद और आत्महत्या दिखाई दे रही है, क्या यह परिणाम उस शिक्षा रूपी वृक्ष पर गलत फल होने का प्रमाण नहीं है?
अंग्रेजी में एक कहावत है-'Morning shows the day' अर्थात् प्रारंभ बता देता है कि अंत कैसा होगा। नवीन शिक्षा-सत्र का प्रारंभिक मास ही जब विद्यार्थी और शिक्षक के घनिष्ठ संबंध का आधार नहीं दे रहा है तो विद्यार्थियों की जिज्ञासा और शिक्षकों की प्रतिभा का क्या होगा? शुरुआती क्लास में शिक्षक विषय में प्रवेश कराने के लिए कई प्रकार की योजनाएं बनाता है और विद्यार्थियों के उत्साह को ज्ञानार्जन की ओर मोड़ता है। फिर कॉलेज में व्यवस्थाएं सुचारू रूप से चलने लगती हैं क्योंकि जहां पर अध्ययन और अध्यापन का कार्य अच्छी प्रकार से हो रहा हो तो वहां पर समग्र वातावरण सकारात्मक हो जाता है।
प्रारंभ का समय ठीक वैसा ही समय होता है जब माली बीज को उपजाऊ भूमि में बोता है। उस समय बागुड़ लगाकर बीज की सुरक्षा भी करनी होती है और खाद- पानी देकर उसे बढ़ने के लिए व्यवस्था भी करनी होती है। यह वह समय होता है जब माली को सर्वाधिक समय अपने बीज के अंकुरण के लिए देना पड़ता है। क्या यह सर्वाधिक समय नवीन सत्र के प्रारंभिक मास में अध्ययन- अध्यापन के लिए सुरक्षित है?
यदि इस प्रश्न का उत्तर 'हां' है तो नवीन-सत्र जीवनदायी होगा किंतु यदि इस प्रश्न का उत्तर 'ना' है तो दिशाहीन-विद्यार्थी और बढ़ेंगे जिससे अवसाद व आत्महत्या की घटना और ज्यादा होगी, जिसका दोष शिक्षकों के माथे मढ़ दिया जाएगा। फिर 'गुरु पूर्णिमा' पर गुरु कहकर और 'शिक्षक दिवस' पर विशेष आदर देकर शिक्षकों को और शर्मिंदा किया जाएगा।
शिक्षक को स्वर्ग और क्लास में से एक वरदान मांगने को कहा जाए तो वह क्लास मांगेगा क्योंकि क्लास में ही उसका स्वर्ग है जहां विद्यार्थी के जीवन को संवारकर वह गुरु भी बन जाता है और अपने ऋषि-ऋण से मुक्त भी हो जाता है-
"काश! हमारे भारत में शिक्षा भी हो,परीक्षा भी हो
भटकते कदमों को राह पर लाने की इच्छा भी हो।"
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹