गृहस्थाश्रम की दार्शनिकता और मनोवैज्ञानिकता
July 7, 2026/start
🙏एक पत्नीव्रत वाले देश में आमिर की तीसरी शादी का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण 🔥
संवाद
'गृहस्थाश्रम की दार्शनिकता और मनोवैज्ञानिकता'
किसी भी व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन को सार्वजनिक चर्चा का मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए किंतु जब वह व्यक्ति इतना प्रसिद्ध हो कि उसका व्यक्तिगत जीवन भी सार्वजनिक जीवन को प्रभावित करता हो तो उस घटना से सबक अवश्य लेना चाहिए। आमिर खान की तीसरी शादी का समाचार जब सुर्खियों में आया और उस शादी में पूर्व पत्नियों के बच्चों सहित उपस्थित होने का दृश्य दिखाई दिया तो स्वाभाविक कई प्रकार की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं।
समाज के विशिष्ट जनों के बीच 61 वर्ष की उम्र में तीसरी शादी और वह भी पूर्व पत्नियों और उनके बच्चों की उपस्थिति में एक सेलिब्रिटी द्वारा किया जाना एक नए सामाजिक मूल्य को समाज में स्थापित करता है। एक पत्नीव्रत लेने वाले राम को आदर्श मानने वाले समाज में यह घटना आसानी से पचने वाली और स्वीकार होने वाली घटना नहीं है। इसका मूल कारण यह है कि हमने आज तक नायक उन्हीं को बनाया है जिनका व्यक्तिगत जीवन और सार्वजनिक जीवन दोनों ही आदर्श की कसौटियों पर खरा उतरा है।
हमारे महापुरुषों के संबंध में कोई विवाद या अपवाद की घटना होती भी है तो हम उसे अस्वीकार करने या उसका कोई परिष्कृत रूप लाने का प्रयास करते हैं। उदाहरण के तौर पर राम के द्वारा सीता की अग्निपरीक्षा और सीता निर्वासन की घटना हो या महात्मा गांधी द्वारा ब्रह्मचर्य पर किए गए प्रयोग हो ; उनको हम मानवीय कमजोरी के रूप में देखते हैं और अपने आदर्श के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते हैं। आकाश की ओर उठी हुई निग़ाहें धरती पर फैले हुए कीचड़ को स्वीकार नहीं कर पाती किंतु कीचड़ में ही कमल खिलता है। किसी के जीवन में कुछ विवाद या अपवाद होता है तो वह उसे सामान्य मानव बनाता है किंतु उसका विशेष कर्म उसे आदर्श के रूप में स्थापित करता है।
आमिर की घटना का पहले सकारात्मक पक्ष देखें तो विज्ञान ने आयु लंबी कर दी और स्वस्थ जीवन दे दिया है। इस कारण से अब कई शादियां उस उम्र में हो रही हैं,जिस उम्र में प्राचीन काल में लोग मरणासन्न होते थे। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यक्ति कितनी भी ऊंचाई पर पहुंच जाए किंतु संगी साथी की खोज अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए करता ही है। बहुत लोग इसे गुप्त रखते हैं, कुछ लोग इसे सार्वजनिक कर देते हैं।
रहस्यदर्शी ओशो कहते हैं कि अनेकों के साथ संबंधित होना मानव की प्रकृति में है,इस कारण से कभी बहुपत्नी प्रथा प्रचलित थी और आज विवाहेत्तर संबंधों की बाढ़ सी आ गई है। भारत में वृद्धावस्था के अकेलेपन को दूर करने के लिए शादियां भी आयोजित होने लगी हैं जो कभी पश्चिम की बात मानी जाती थी। मूल कारण यह है कि व्यक्ति स्वयं में पर्याप्त नहीं है।
लेकिन दूसरी जगह ओशो कहते हैं कि मानव प्रकृति का अतिक्रमण कर सकता है और संस्कृति को विकसित कर सकता है। राम ने बहुपत्नी प्रथा वाले जमाने में एक पत्नीव्रत लिया और गृहस्थाश्रम को एक नया आयाम दिया। गृहस्थाश्रम हमारी संस्कृति में यौन इच्छाओं की तृप्ति का माध्यम मात्र नहीं है बल्कि आध्यात्मिक ऊंचाई को स्पर्श करने का एक यज्ञ है। माता-पिता से ही किसी का जन्म होता है इसलिए वह लड़का हो या लड़की दोनों में माता-पिता के अंश होते हैं। जब तक स्त्री और पुरुष तत्व का मिलन नहीं होता तब तक एक दूसरे के प्रति आकर्षण की भावना तृप्त नहीं होती। ज्यों ही कोई अपना जीवन साथी पा लेता है तो उसको स्वयं के अंदर भी अपने स्त्री और पुरुष तत्व को मिलाने की कीमिया मिल जाती है। हमारी संस्कृति में अर्धनारीश्वर का रूप इसी बात की गवाही देता है।
अपनी पत्नी या पति से जो संतुष्ट होते हैं, उनका शक्ति और समय बचता है।उम्र बढ़ने के साथ कामवासना से व्यक्ति रामवासना की ओर बढ़ने लगता है। गृहस्थाश्रम के बाद वानप्रस्थ आश्रम काम से राम की ओर जाने की तैयारी का ही आश्रम है।दूसरे शब्दों में कहें तो प्रकृति संस्कृति की ओर उन्मुख होने लगती है। उपनिषद के ऋषियों ने धर्मानुकूल अर्थ और काम के द्वार से मुक्ति की मंजिल पाई।
तन से ऊपर मन की यात्रा है और भारतीय संस्कृति में उसके ऊपर आत्मा की यात्रा है। दांपत्य जीवन में कई पतियों या पत्नियों से संबंधित होने वाले लोग तन और मन से ऊपर नहीं बढ़ पाते। साथ ही संतति पर इसका बहुत नकारात्मक असर होता है।मनुष्य जीवन की गरिमा काम के कर्दम में राम का कमल खिलाने में है।
जिस प्रकार से मर्यादा में बहने वाली नदी क्षेत्र को हरा-भरा कर देती है और मर्यादा को तोड़कर आने वाली बाढ़ से क्षेत्र तबाह हो जाता है, उसी प्रकार से एक पत्नीव्रत की मर्यादा से जीवन को सार्थकता मिलती है और इस मर्यादा के उल्लंघन से जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹