🙏स्थानांतरण के इस मौसम में अपना इच्छित स्थान सभी चाहते हैं किंतु वह प्रेय स्थान श्रेय है या नहीं, यह विरले जानते हैं-एक दृष्टि🎉


संवाद


'स्थानांतरण की चाह'


मानव का यह स्वभाव है कि वह अपने लिए सही घर की तलाश करता रहता है। जब तक नौकरी नहीं मिलती है तब तक सही नौकरी की तलाश रहती है। जब नौकरी मिल जाती है तो अपने अनुकूल जगह पर जाने का प्रयास रहता है; क्योंकि-


'हम ढूंढ रहे हैं उसे जो आसपास है


जिंदगी अपने लिए घर की तलाश है।'


            अपने घर की तलाश में स्थानांतरण के लिए इतने लोगों ने आवेदन किए हैं कि सरकारों के लिए स्थानांतरण एक धर्मसंकट का समय बन गया है और कुछ लोगों के लिए संकट में एक अवसर का समय। 'एक अनार सौ बीमार' वाली कहावत का सही अर्थ ऐसे समय में समझ में आता है। सभी को संतुष्ट कर पाना संभव नहीं होता।ऐसे में नेताओं पर दबाव इतना ज्यादा रहता है कि उनका अपना संतुलन बिगड़ने लगता है। कारण यह है कि अधिकांश के आवेदनपत्र में स्थानांतरण का एक मुख्य आधार अपने मां-बाप की सेवा करना होता है। एक तरफ मां-बाप वृद्धाश्रम में भेजे जा रहे हैं तो दूसरी तरफ श्रवण कुमार बनने की कामना से लोग भरे जा रहे हैं-


'बहलाकर छोड़ आते हैं लोग वृद्धाश्रम में मां-बाप को


अपने घरों में अब पुराना सामान कौन रखता है?


हर एक चीज मुहैया है मेरे शहर में किस्तों पर


अपनी हसरतों पर अब लगाम कौन रखता है?'


           श्रवण कुमार बनने की खबरों को प्रमुखता से उछालकर स्थानांतरण चाहने वालों पर एक व्यंग्य किया गया है। लेकिन सच्चाई यह है कि मां-बाप अपने पैतृक निवास को छोड़ना नहीं चाहते और बेटे-बेटी मां-बाप से दूर रहकर चैन से जी नहीं पाते। जिस नौकरी की तलाश में व्यक्ति जीवन भर कठिन श्रम करता है,उसी नौकरी के मिल जाने पर उसे लगता है कि अपने घर के आसपास कार्यालय हो तो अपने बढ़े हुए कद का और अपने बड़े पद का कुछ मूल्य पता चले। अन्यथा जंगल में मोर नाचा किसने देखा।


              लेकिन प्रेय क्या है और श्रेय क्या है, हमें पता नहीं चलता। आज से 30 साल पहले 1996 में गंगा किनारे से मैं भी जब माही किनारे आया तो यही सोच कर आया था कि पहली मुराद नौकरी की पूरी हो गई, इसके बाद दूसरी मुराद घर के पास रहने की पूरी करनी है। बांसवाड़ा जैसे अपरिचित जगह में कॉलेज शिक्षा में कार्यभार ग्रहण करते ही मैं अपने घर को तुरंत लौट गया। यह जगह तो बहुत सुंदर थी किंतु यहां अपने घर वालों का संग-साथ नहीं था। मन में एक भावना बार-बार उठती थी-'लाख लुभाए महल पराए,अपना घर तो अपना घर है।'


मां-पिताजी को अपने पास रखने का प्रयास करता था लेकिन वे अपनी जमीन और अपने लोगों के बीच में रहने की कामना से भरे होते थे। यहां पर आकर मां-पिताजी का तन तो ज्यादा स्वस्थ हो जाता था किंतु कुछ ही दिनों में मन उतना ही ज्यादा उदास हो जाता था। फिर मुझे उन्हें घर पहुंचाना पड़ता था।


            इस दूर प्रदेश में मेरे लिए सबसे बड़ा सहारा यहां के विद्यार्थी बने। उनके साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताकर एक तरफ मुझे अपने अकेलेपन का एहसास कम हो जाता था तो दूसरी तरफ शिक्षक होने का आभास ज्यादा से ज्यादा हो जाता था। एक विद्यार्थी जीवन जीकर मैंने जो नौकरी पाई थी, वह नौकरी ऐसी थी कि विद्यार्थियों के साथ ही अधिकांश समय व्यतीत होता था और धीमे-धीमे मैं फिर विद्यार्थी ही बन गया।


           गांव छूट गया ,अपने दूर हो गए लेकिन कुछ लोग यहां पर जुड़ गए और नया घर बन गया। इस आदिवासी बहुल पिछड़े इलाके से लोग जल्दी से अपना स्थानांतरण करवाना चाहते हैं लेकिन मुझे तो अपना आत्मरूपांतरण करना पड़ा। यहां की धरती और लोगों ने मेरा उपयोग शिक्षक के रूप में ही किया।फिर स्थानांतरण के अनुभव ने कुछ ऐसा सिखाया कि विद्यार्थी और पुस्तकों के अतिरिक्त अपना कोई दूसरा सहारा ही नहीं दिखाई देता।


           स्थानांतरण के इस मौसम में कुछ की मुराद पूरी होगी और कुछ की अधूरी रह जाएगी। जिनकी मुराद पूरी हो जाएगी वे अपने घर जाकर सुख-शांति से रहेंगे किंतु जिनकी मुराद अधूरी रह जाएगी उनको मेरा यह अनुभव काम आएगा।गंगा ने मुझे जन्म दिया और उसकी मिट्टी में खेलकर-पढ़कर जीवन इस मुकाम पर पहुंचा कि मैं माही किनारे आ गया और माही ने मुझे विद्यार्थियों के साथ प्रेम करने की और किताबों के साथ रहने की कला सिखाई।गंगा के किनारे आधा जीवन बिता और माही के किनारे शेष आधा जीवन बीत गया। अब मैं इस सोच में पड़ गया हूं कि गंगा और माही में से किसे अपना कहूं और किसे पराया।


व्यक्ति जन्म कहीं और लेता है, बड़ा कहीं और होता है और उसका अन्न-जल कहीं और लिखा रहता है। स्थानांतरण व्यक्ति के जीवन को कई नए अनुभवों से भर देता है किंतु यदि व्यक्ति का स्वयं का वश चले तो वह सारी जिंदगी एक ही स्थान पर गुजार दे। एक ही स्थान पर जीवन गुजार देने वाले व्यक्ति का जीवन  स्थिर तो है किंतु ऊबा हुआ भी है और घर से दूर रहने


वाले का जीवन अस्थिर तो है किंतु नए अनुभवों से और घर लौटने के सपने से भरा हुआ भी है। जो घर लौट जाते हैं वे भी कुछ दिनों के बाद कुछ नए की खोज करने लगते हैं। इसलिए जिंदगी का फलसफा यही निकल कर आता है कि व्यक्ति अपने घर की तलाश में तो अवश्य है किंतु वह अपने उस घर का पता नहीं जानता है जहां वह आप्तकाम हो सके।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹