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🙏प्रतियोगी परीक्षा की व्यवस्था सभी की बहुत कड़ी परीक्षा ले रही है लेकिन परीक्षार्थी के लिए तो यह अग्नि परीक्षा साबित हो रही है। एक विद्यार्थी ने पूछा है कि बाहर एक घंटा खड़े होने की अपेक्षा रूम में एक घंटा बैठना इतना कठिन क्यों होता है?🔥


संवाद


"परीक्षार्थी की पीड़ा"


प्रतियोगिता परीक्षा में नकल रोकने के नाम पर परीक्षा से दो घंटा पहले परीक्षार्थियों को बुलाया जाता है। परीक्षा केंद्र पर पहुंचने के बाद कड़ी जांच से गुजरने के पश्चात् एक घंटा परीक्षार्थी परिसर में बाहर खड़े रहते हैं और इसके बाद एक घंटा रूम में उन्हें प्रश्नपत्र पाने के इंतजार में बैठे रहना पड़ता है। परीक्षा का तनाव झेल रहे परीक्षार्थियों के लिए परीक्षा के पूर्व के ये दो घंटे अग्नि परीक्षा साबित हो रहे हैं।


          अधिकांश परीक्षा केंद्रों पर परिसर के अंदर बैठने की समुचित व्यवस्था नहीं होती।परीक्षार्थी असुविधाजनक स्थिति में बातें करते हुए किसी प्रकार से समय काट लेते हैं। लेकिन इसके बाद परीक्षा रूम में वे परीक्षार्थी अपने निश्चित स्थान पर बैठ जाते हैं। वहां कुछ प्रविष्टियां भरने के बाद उन्हें प्रश्नपत्र पाने के लिए घंटे भर इंतजार करना पड़ता है। यह समय उनके लिए मानसिक दृष्टिकोण से बहुत ही ज्यादा परेशान करने वाला साबित होता है।


        परीक्षार्थी जब परिसर में खड़ा होता है तो अपने संगी-साथियों के साथ बातचीत करते हुए बाहरी दुनिया में व्यस्त हो जाता है। शारीरिक दृष्टि से असुविधाजनक स्थिति होने पर भी विचारों का आदान-प्रदान थोड़ी देर के लिए तनाव कम कर देता है। लेकिन यही परीक्षार्थी जब जाकर रूम में अपनी सीट पर बैठता है तो उसे स्वयं का सामना करना होता है। उस समय वह अपने मन के साथ अकेले होता है। सीट पर स्थिर बैठ जाने से और जबरन मौन हो जाने से उसके मन की चंचलता और बढ़ जाती है। मन सोचने लगता है कि यदि प्रश्न कठिन आ गया तो क्या होगा, यदि याद किया हुआ भूल गया तो क्या होगा, यदि परीक्षा में असफल हो गया तो क्या होगा..  इत्यादि अनेक प्रकार के नकारात्मक विचार परीक्षार्थी को परेशान कर देते हैं। इस स्थिति में कुछ परीक्षार्थी अपनी सीट पर आंखें बंद करके सो जाते हैं और कुछ परीक्षार्थी बार-बार बाथरूम के लिए जाते हैं।


              उन्हें नहीं पता होता कि मन उस जीभ के समान होता है जो बतीस दांतों में से एक भी टूट जाए तो टूटे हुए दांत के पास ही जाती है। मन की दो शक्तियां हैं-स्मरण की और कल्पना की। ऐसे क्षण में दोनों शक्तियां इतनी सक्रिय हो जाती हैं कि अतीत की बुरी बातों का स्मरण करती हैं और भविष्य की अनहोनी की कल्पना करती हैं। इससे परीक्षार्थी का परीक्षा में परफॉर्मेंस काफी प्रभावित होता है।


              सम्यक-शिक्षा जीवन में समाज में रहने के साथ अकेले और एकांत में होने का भी ज्ञान प्रदान करती है-


'खुद के साथ सफर में रहे तो अच्छा है


हम बेखबर हैं खबर में रहें तो अच्छा है


नजर के सामने है मंजिल हमसफर लेकिन


ये फासला भी नजर में रहे तो अच्छा है।'


           आत्मज्ञान वाली शिक्षा के अभाव में मन व्यक्ति को बहुत बंधन में डाल देता है क्योंकि मन तुलना में जीता है और फल की आकांक्षा ज्यादा करता है जबकि आत्मा स्वयं के साथ रहना पसंद करती है और कर्म पर अपना ध्यान रखती है। इसीलिए जब मन नहीं रहता है तो 'अमन' की स्थिति होती है जिसका अर्थ "शांति" होता है। शारीरिक स्थिरता के लिए आसन होते है और मानसिक स्थिरता के लिए ध्यान होता है।


              शिक्षालयों में प्रार्थना के साथ ध्यान और खेलकूद का भी प्रशिक्षण होता था किंतु आज की कोचिंग वाली व्यवस्था में प्रार्थना,ध्यान और खेलकूद कहां? वहां तो सिर्फ रटने पर और परिणाम पर ध्यान होता है। नतीजतन अवसाद ज्यादा बढ़ रहा है जो आत्महत्या तक पहुंचा दे रहा है।


           इस पूरी शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा व्यवस्था पर यदि शीघ्रता से पुनर्विचार नहीं किया गया तो स्थितियां और भी भयावह होगी। जिंदगी उतनी भयावह नहीं है जितनी इस शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा व्यवस्था ने बना दी है-


"सादा सरल जीवन था लेकिन


बहुत जटिल अनुवाद हो गया।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹