🙏परीक्षा केंद्र पर समय पर गेट बंद कर दिया जाता है किंतु गेट पर खड़ा इंसान एक दो मिनट देर से पहुंचने वाले परीक्षार्थी को देखकर धर्मसंकट में पड़ जाता है। कोई समय का हवाला देकर परीक्षार्थी को लौटाने के पक्ष में होता है तो कोई विवेक के आधार पर प्रवेश कराने के पक्ष में।इस मानसिक द्वंद्व का दार्शनिक विश्लेषण 🔥


संवाद


'प्राथमिक कौन:समय या विवेक?'


पेपर लीक का नहीं बल्कि सही कहा जाए तो चरित्र लीक का यह जमाना है। पेपर सेट करने वाले प्रोफेसर जब पेपर बेचने लगें,संस्कार देने वाले अभिभावक जब पेपर खरीदने लगें और अपने सपनों को टूटता देखकर प्रतिभाशाली विद्यार्थी जब आत्महत्या करने लगें तो ऐसे जमाने में समय की पाबंदी पर बहस बहुत मायने नहीं रखती‌। किंतु समय की पाबंदी और विवेक की महत्ता पर यह बहस बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है जब चंद मिनट की देरी होने पर परीक्षार्थी की जिंदगी खतरे में पड़ती हो। ऐसे समय में दिल और दिमाग के बीच एक संघर्ष होता है जिसे समझने का प्रयास होना चाहिए।


            किसी व्यक्तित्व में दिमाग की प्रधानता होती है तो किसी व्यक्तित्व में दिल की। जब कभी भी दिमाग हावी होगा तो वह हानि लाभ के दृष्टिकोण से किसी मसले पर विचार करेगा‌।वह परीक्षार्थी की जिंदगी के बारे में कम और समय के बारे में ज्यादा सोचेगा। इसलिए वह परीक्षार्थी को केंद्र से लौटा देगा।लेकिन जब दिल हावी होगा तो वह करुणा के दृष्टिकोण से किसी मसले पर निर्णय लेगा। उसके लिए मुश्किल होगा कि चंद मिनट की देरी के कारण किसी की बरसों की मेहनत पर पानी कैसे फेर दिया जाए।


              वस्तुत:परीक्षा सिर्फ विद्यार्थी के ज्ञान की ही नहीं होती बल्कि व्यवस्था के अनुशासन की भी होती है। विद्यार्थी और व्यवस्था दोनों के लिए समय-बोध इतना महत्वपूर्ण तत्व होता है कि इसका सख्ती से पालन किए बिना न्याय सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। इस कारण से परीक्षा केंद्रों पर समय सीमा का पालन अनिवार्य बनाया जाता है किंतु जब कोई भी परीक्षार्थी चंद मिनट की देरी से परीक्षा केंद्र से लौटा दिया जाता है तो प्रश्न केवल नियम का नहीं बल्कि संवेदना का भी हो जाता है।


          मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो चंद मिनट की देरी से परीक्षा से वंचित हुआ परीक्षार्थी अपनी वर्षों की मेहनत पर पानी फिर जाने से निराशा के गर्त में जा सकता है जो उसके भविष्य को बहुत ज्यादा प्रभावित कर सकता है। दूसरी ओर नियमों में ढील दिए जाने पर नियम पालन करने वाले के साथ अन्याय हो जाता है।


            पश्चिम के नैतिकतावादी दार्शनिक कांट का कहना है कि नियम सबके लिए समान होना चाहिए, यदि अपवाद बनने लगें तो व्यवस्था प्रश्नों के घेरे में आ जाती है। किंतु पूरब की सोच यह है कि नियम का पालन विवेकसम्मत ढंग से किया जाना चाहिए ताकि मानवीय संवेदना को बचाया जा सके।


            एक तरफ जर्मन दर्शनिक कांट अपने जीवन में समय के इतने पाबंद थे कि उन्हें देखकर लोग अपनी घड़ियां मिला लिया करते थे। उनके अनुसार सार्वभौमिक नियम भावना के आधार पर नहीं बनाया जा सकता। दूसरी तरफ भारतीय दर्शन में सत्य की साधना करने वाले एक ऋषि का दृष्टांत है। ऋषि के सामने से एक लड़की भागते हुए उनकी कुटिया में घुस गई और थोड़ी देर में ही तीन हथियारबंद लोग उसका पीछा करते हुए आए।उन लोगों ने ऋषि से पूछा कि क्या आपने एक लड़की को इधर आते  देखा हैं? अब ऋषि धर्मसंकट में पड़ गए। यदि वह सत्य बोलें तो लड़की की जान खतरे में थी और झूठ बोलें तो उनकी सत्य की साधना टूट जाती। ऐसे धर्मसंकट के क्षण में उन्होंने लड़की की जान बचाने हेतु अपने विवेक से झूठ बोलने का निर्णय लिया।


           यदि परीक्षा केंद्र पर पहुंचने में देरी असाधारण कारणों से हुई हो और परीक्षा की गोपनीयता प्रभावित न होती हो तो सीमित विवेकाधिकार को महत्त्व दिया जाना चाहिए। लेकिन देरी का कारण लापरवाही हो तो विवेक को समय के पक्ष में खड़ा होना चाहिए, परीक्षार्थी के पक्ष में नहीं। ऐसे में विद्यार्थियों के लिए समय पालन का संस्कार जितना महत्वपूर्ण है,उतना ही प्रशासन को संवेदनशील निर्णय लेने का प्रशिक्षण भी महत्वपूर्ण है।


            केवल नियम कठोरता पैदा करता है और केवल विवेक पक्षपात का खतरा बढ़ा सकता है। आदर्श व्यवस्था तो वही है जहां नियम किसी के साथ भेदभाव नहीं करता हो किंतु विवेक मानवीय संवेदना को खोता नहीं हो। सम्यक-शिक्षा उस आदर्श-व्यवस्था की खोज करती है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹